पांच दिन में 2 करोड़ से अधिक समर्थक। ये चमत्कार है या फिर भविष्य का संकेत ? क्यों सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी का अकाउंट बंद करवाया ? वो भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर । कॉकरोच किसने बनाया और क्यों बनाया या फिर उसके पीछे कोई बड़ी साजिश है, ये बहस पूरी तरह से बेकार है, तर्कहीन और कुंठित है । दुनिया में कोई भी ताकत कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो वो पांच दिन में इतने अधिक समर्थक सोशल मीडिया पर नहीं जुटा सकती । और अगर किसी को बहुत गुमान हो तो वो कोशिश कर के देख सकता है । मेरी नज़र में ये एक “विलक्षण सामाजिक विक्षोभ” का प्रमाण है । और कोई भी सरकार सिर्फ अपने नुक़सान की कीमत पर ही इस विक्षोभ को नज़रअंदाज़ कर सकती है। और मौजूदा सरकार जो हर छोटी से छोटी चीज़ पर नज़र रखती है, वो तो क़तई इस “सामाजिक फिनामिना” को नज़रअंदाज़ नहीं ही करेगी, वो इसका समाधान खोज पायेगी या नहीं, ये अलग तरह का प्रश्न है ।
बहुत लोगों ने मुझसे पूछा कॉकरोच को मैं कैसे परिभाषित करुं ? मैंने साफ़ तौर पर कहा कि समाज में असंतोष है, लोगों को लगता है कि उनकी आकांक्षाओं, इच्छाओं और मुद्दों को सरकारें एड्रेस नहीं कर रही हैं । ये असंतोष किसी एक सरकार से हो या किसी एक पार्टी से हो ये ज़रूरी नहीं है । या फिर किसी एक नेता से हो । ये असंतोष बिलकुल वैसा है जैसा कि 2010 और 2011 में देखने को मिला था। भारत में वो अन्ना आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ तो अरब देशों में जनांदोलन के रूप में जिसने कई तानाशाहों की कुर्सी लील ली । अमेरिका और विकसित देशों में आम जन का असंतोष “अकुपॉय वाल स्ट्रीट” (Occupy Wall Street) आंदोलन के रूप में प्रस्फुटित हुआ था । ये अनायास नहीं है कि लगभग इसी समय विश्व के पटल पर दक्षिणपंथी या फिर ये कहें “स्ट्रांग मैन पालिटिक्स” का उभार देखने को मिला । भारत में अगर नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व की राजनीति को उफान मिला तो हंगरी जैसे देश में विक्टर ओर्बान का उदय हुआ जो खुलेआम अनुदारवादी लोकतंत्र की वकालत करते थे। लंबे समय तक वो सत्ता में रहे और हाल में वो चुनाव हार कर सत्ता से बेदखल हो गये। 
ये एक अलग तरह का “सामाजिक विक्षोभ” था जिसकी शुरुआत ट्यूनीशिया में एक छोटी से घटना से हुई थी। मोहम्मद बाउजीजी नामक ठेले पर सब्ज़ी और फल बेचने वाले एक शख्स ने आग लगाकर आत्महत्या कर ली थी। ये उसने तब किया था जब एक पुलिस वाले ने घूस नहीं देने पर उसके ठेले को पलट दिया, उसको थप्पड़ मारा और उसके पिता को अपमानित किया। उसकी आत्महत्या ने बेरोजगारी से त्रस्त समाज में वो गुस्सा पैदा किया कि तानाशाह राष्ट्रपति जैनुल आबिदीन बेन अली को इस्तीफा देना पड़ा। इस आंदोलन को “जास्मिन आंदोलन” के नाम से जाना जाता है। इसकी आग दूसरे अरब देशों तक भी पंहुची । लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को भी जाना पड़ा था।
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भारत में अन्ना आंदोलन का ही असर था कि 2014 में कांग्रेस को सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा और 2015 में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की भयंकर बहुमत वाली सरकार बनी। जबकि आम आदमी पार्टी का चुनाव लड़ने का कोई इतिहास नहीं था । बाद में पंजाब में भी भारी बहुमत से सरकार बनी । ये एक अलग कहानी है कि बाद में वो अपने रास्ते से भटक गये और दूसरी पार्टियों जैसा ही बर्ताव करने लगे । अभी हाल में तमिलनाडु में सुपर स्टार विजय की पार्टी का डीएमके और एआईएडीएमके जैसी मज़बूत पार्टियों को हरा कर सरकार में आना और खुद मुख्यमंत्री बनना, भारतीय राजनीति का एक अनोखा अध्याय है । दिलचस्प बात ये है कि विजय ‘आप’ की तरह किसी आंदोलन की उपज नहीं हैं। उनके पहले सिर्फ़ आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव की सरकार इस तरह से बनी थी। विजय का उदाहरण इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति की जड़ें इतनी मज़बूत हैं कि 1967 के बाद से वहां कांग्रेस अपनी सरकार नहीं बना पाईं और बीजेपी काफी कोशिश के बावजूद तमिलनाडु के लोगों का भरोसा नहीं जीत पाईं है।

मेरा ये कहने का फ़िलहाल कोई मंतव्य नहीं है कि भारत में 2029 के लोकसभा चुनाव में कोई बड़ा उलटफेर हो सकता है । अभी इस बारे में किसी भी तरह की बात कहना न केवल जल्दबाज़ी होगी बल्कि मूर्खता भी । राजनीति में कब क्या हो जाये, ये कोई नहीं कह सकता।

जैसे विजय मुख्यमंत्री होंगे, ये अप्रैल में कोई नहीं बोल सकता था, लेकिन आज ये हकीकत है । ये ज़रूर कहा जा सकता है कि देश में असंतोष बढ़ता जा रहा है । बेरोज़गारों की फौज बढ़ती जा रही है । महंगाई आसमान पर है । पेट्रोल डीज़ल के दाम दो हफ़्ते में चार बार बढ़ चुके हैं । दूध के दामों में भी बढ़ोतरी हो रही है । गरीब आदमी जो बड़ी मेहनत करके महीने में पंद्रह से बीस हज़ार रुपया कमाता है वो कैसे शहर में अपना परिवार चला सकता है ? जबकि उसे तीन से पांच हज़ार रुपया मकान के किराये के तौर पर देना पड़ता है ।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ईरान युद्ध के पहले से ही भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत ठीक नहीं है । बाज़ार में मांग नही बढ़ रही है । मैन्यूफ़ैक्चरिंग सेक्टर में कोई गति नहीं दिखाई पड़ती । गाँवों में पिछले एक दशक से किसानों की आय नहीं बढ़ी है । मनरेगा को भी खत्म कर दिया गया है । नौकरी की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले बच्चे पेपर लीक से परेशान हैं । नीट के पेपर लीक से बाइस लाख बच्चे बेहाल हैं । और जब ये बच्चे पेपर लीक के विरोध में सड़क पर आंदोलन करते हैं तो उनकी लाठियों से पिटाई होती है । 19 से 29 साल के युवाओं के बीच में बेरोजगारी का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है। 
सरकार के पास इन समस्याओं से निपटने का या तो कोई ख़ाका नहीं है या फिर उसकी दिलचस्पी सिर्फ चुनाव जीतने में है । 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हालत खराब हुई थी । लेकिन उसके बाद के ज्यादातर विधानसभा के चुनाव वो भारी बहुमत से जीती । ताज़ा उदाहरण बंगाल का है। जहां ममता बनर्जी जैसी ताकतवर नेता अपने विधानसभा क्षेत्र में लगातार दूसरी बार चुनाव हार गईं।
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चुनाव जीतना ही लोकतंत्र नहीं है । लोकतंत्र चुनाव से आगे की चीज है । लोकतंत्र का स्पेस भारत में सिकुड़ रहा है। सामाजिक स्तर पर अल्पसंख्यक तबका काफी तकलीफ में है । राजनीति से लेकर नौकरियों तक में उसके साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है । ऐसे में लोगों में असंतोष होना स्वाभाविक है । श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जनांदोलनों ने ताकतवर नेताओं और सरकारों को उखाड़ कर फेंक दिया। शेख हसीना को बांग्लादेश और राजपक्षे परिवार को श्रीलंका छोड़ कर भागना पड़ा था । ऐसे में कॉकरोच फिनामिना को हल्के में लेना सरकार के लिये उचित नहीं होगा । वैसे भी कॉकरोच के बारे में एक मिथ है कि वो न्यूक्लियर विंटर में भी आसानी से नही मरते।