इंडिया गठबंधन की 8 जून की बैठक में कई चेहरे दिखे
ऐसे समय में जब ये सवाल मजबूती से, और कुछ हँसी उड़ाने वाले अंदाज में पूछा जा रहा है, कि क्या इंडिया नाम का गठबंधन आज की तारीख में ज़िंदा भी है, तब इंडिया गठबंधन की बैठक दिल्ली में हुई । इस बैठक में 25 दलों ने हिस्सा लिया । इस बैठक में कोई क्रांतिकारी पहल तो नहीं हुई लेकिन ये समझ बनी कि साथ मिलकर लड़ना होगा, हर दो महीने में एक बार मिलेंगे । वोट चोरी पर सुप्रीम कोर्ट को साझी चिट्ठी लिखी जायेगी । साथ ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा गया । सबसे बड़ी बात ये है कि पांच बिन्दुओं - संविधान की रक्षा, लोकतंत्र का बचाव, बेरोजगारी पर वार, महंगाई पर सरकार का घेराव और क्रोनी कैपिटलइज्म का विरोध - सहमति बना कर भविष्य के संघर्ष का खाका खींचा गया ।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पहली बैठक के हिसाब से खाका तो सही खींचा गया है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या गठबंधन इस लड़ाई को उसकी तार्किक परिणति तक ले जा पायेगा ? ये प्रश्न अहम है क्योंकि ये बैठक तब हुई है जब ममता बनर्जी बंगाल के चुनाव में खेत रहीं और पार्टी का अस्तित्व ख़तरे में पड़ चुका है । तृणमूल का विधायक दल टूट चुका है और संसदीय दल पर टूट के बादल सघनता से मंडरा रहे हैं । ये बादल कभी भी बरस सकते हैं । ऐसे में ममता का इस बैठक का आह्वान करना, अपने को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में ‘रैलिवेंट’ बनाये रखने की कोशिश भी है ।
इंडिया गठबंधन के लिहाज़ से कहें तो ये घाव गहरे है, लेकिन अच्छे हैं । कम से कम क्षेत्रीय दलों और नेताओं को ये अक़्ल तो आई कि बीजेपी और नरेंद्र मोदी का सामना ‘इगो’ से नहीं, मज़बूत रणनीति बना कर ही किया जा सकता है । और अगर इगो से काम लिया गया तो 2029 तक आधे क्षेत्रीय दल के नेता या तो जेल में होंगे और बचे आधे दलों को भतीजे नेता के नीचे से निकाल ले जायेंगे और बीजेपी की गोद में बैठे होंगे ।
इंडिया गठबंधन के लिये ये वक्त अपने अस्तित्व को बचाने का है । 2024 चुनाव के पहले जब नीतीश कुमार की पहल पर विपक्षी दल एकजुट हुये थे तब भी विपक्ष से कोई ज्यादा उम्मीद लोगों को नहीं थी। इंडिया गठबंधन बनने के बाद भी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी विधानसभा चुनाव जीती थी । अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन हुआ था और बीजेपी के नेता ये दावा करने लगे थे कि इस बार एनडीए को 400 से अधिक सीटें मिलेंगी। “अब की बार, चार सौ पार” का नारा इतना जबरदस्त था कि कई पत्रकार, और राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे थे कि बीजेपी को रोकना मुश्किल ही नही नामुमकिन है। लेकिन बीजेपी 240 पर अटक गई। मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं कि अखिल भारतीय स्तर पर एकजुटता के प्रदर्शन ने बीजेपी को बहुमत के आँकड़े तक नही पहुँचने दिया।
लेकिन चुनाव के बाद नजारा पूरी तरह बदल गया हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार जहां विपक्षी मान कर चल रहे कि उनकी जीत होगी वो चुनाव हार गये । इसका सबसे बड़ा कारण था इंडिया गठबंधन में आपसी एकजुटता का अभाव। आप ने लोकसभा चुनाव के बाद ही गठबंधन से अलग होने का ऐलान कर दिया था। ये कहा जाने लगा कि इंडिया गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिये ही था। विपक्ष को ये समझ नहीं आया कि बीजेपी वो पार्टी है जिसे अपनी गलती सुधारने में महारत हासिल है। इस पूरी लड़ाई में SIR की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता लेकिन विपक्षी नेताओं की इगो इतनी बड़ी थी कि SIR तो छोड़िये किसी और मुद्दे पर भी बीजेपी को जिस मजबूती से घेरना था, नहीं घेर पाये। ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन और विपक्षी एकता को कमजोर करने का कोई भी मौक़ा नहीं गँवाया । राहुल गांधी भी ममता के खिलाफ बोले। और मौजूदा विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह से कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़ कर विजय का हाथ पकड़ा, वो विपक्षी अदूरदर्शिता का ताज़ा उदाहरण है।
आज की तारीख में हालत ये है कि विपक्ष के सारे सूरमा जिन्हें ये मुग़ालता था कि वो बीजेपी को अपने बल पर हरा सकते है, वो एक एक कर अपना किला गँवा चुके है । ममता और स्टालिन ने न केवल सरकारें गँवाई बल्कि अपनी विधानसभा सीट भी हार बैठे । यही हाल केजरीवाल का रहा । वो भी दिल्ली हारे और अपनी सीट भी । अब पंजाब बचाने में जुटे हैं । कांग्रेस असम हारी लेकिन केरल जीतकर उसने अपनी इज़्ज़त बचा ली । कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन और तमिलनाडु में त्वरित गति से फैसले कर उसने अपने में बदलाव के संकेत दिये हैं । आज इंडिया गठबंधन में कांग्रेस का पलड़ा भारी है । और क्षेत्रीय दल रक्षण की मुद्रा में हैं ।
कांग्रेस की चार राज्यों में सरकार है तो जम्मू कश्मीर, झारखंड और तमिलनाडु में वो सत्ता पक्ष के साथ है । जबकि ममता केजरीवाल अपनी सरकारें गँवा चुके हैं । उद्धव ठाकरे और शरद पवार अपनी बची खुची पार्टी को बचाने में लगे हैं । लेफ्ट लंबे समय के बाद किसी भी राज्य में सरकार में नहीं है। केरल वो हार चुकी है। उमर अब्दुल्ला और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं । उमर और महबूबा मुफ़्ती के पास ज्यादा ताकत नहीं है।
हेमंत सोरेन के बारे में रह रह कर अफ़वाहें फैलती रहती हैं कि वो बीजेपी से हाथ मिला सकते हैं । तेजस्वी यादव की भी हालत खराब है । चुनाव बुरी तरह हारे, परिवार में कलह है और जाँच एजेंसियों ने लालू परिवार का जीना हराम कर रखा है। अखिलेश यादव मज़बूत स्थिति में दिखते हैं। संसद में 37 सांसद हैं लेकिन वो भी जानते हैं कि यूपी में विधानसभा चुनाव उनकी सभी बड़ी अग्निपरीक्षा हैं। उन्हें पता है कि कांग्रेस के बग़ैर वो चुनाव में कामयाब नहीं होंगे । मुस्लिम वोटर का झुकाव राहुल की ओर बढ़ रहा है । ऐसे में कांग्रेस उनकी मजबूरी है।
कांग्रेस को विपक्षी एकता की धुरी बनना होगा । उसे पहल करनी होगी । विपक्षी दलों में ये भरोसा पैदा करना होगा कि बड़ी पार्टी होने के बावजूद वो गठबंधन के साथियों के लिये त्याग करने को तैयार है । राहुल को मोदी से सीखना होगा कि वो कैसे गठबंधन के दलों को साथ लेकर चलते हैं और अगर ज़रूरत पड़े तो चुनाव में उनके लिये सीट भी छोड़ते हैं । राहुल को ये भी समझना होगा कि विधानसभा चुनावों में बीजेपी की धुआंधार जीत के बाद 2024 की तुलना में चुनौती कई गुना बढ़ गई है । ऐसे में पहले की तुलना में और कमर कसनी होगी । ये ड्रामा नहीं चलेगा कि गठबंधन सिर्फ लोकसभा चुनावों के लिये होगा । ये दोस्ती लोकल चुनावों से लेकर लोकसभा तक करना होगी । एक आवाज में बात करनी होगी । एक दूसरे पर टीका टिप्पणी से बचना होगा । गठबंधन को संस्थागत रूप देना होगा और बेहतर भारत का एक नया सपना देश को बेचना होगा।
इंडिया गठबंधन के लिये अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। अवसर है । देश में बेचैनी बढ़ रही है । ऐसे ढेरों मुद्दे हैं जिस पर सरकार कठघरे में है । युवा पीढ़ी नीट और सीबीएसई में गड़बड़ियों के कारण बेहाल है । आर्थिक मोर्चे पर ढेरों सवाल हैं । महंगाई आसमान पर है । बेरोजगारी बढ़ रही है । ऐसे में अगर विपक्ष एकजुट होकर काम करे तो अपनी कमज़ोरियों के बावजूद वो लड़ाई लड़ सकता है और सरकार को रोक सकता है । लेकिन ऐसा तब होगा जब वो ठोकर लगने के बाद सँभलने के लिये खुद में सुधार करे। और वातानुकूलित कमरे से निकल कर सड़क पर लड़ने पिटने के लिये तैयार हो।