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आख़िर अब कांग्रेस करे तो क्या करे?

कांग्रेस की लुटिया फिर डूब गई! और ऐसी डूबी, ऐसी डूबी कि राहुल गाँधी अमेठी तक में मुँह दिखाने लायक नहीं रह गए। बीजेपी उम्मीदवार स्मृति ईरानी से वह चुनाव हार गए। कांग्रेस के लिए इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी कि वह अपने पुश्तैनी गढ़ में ही मात खा जाए। जैसा बीजेपी पहले आरोप लगा रही थी कि हार के डर के मारे ही राहुल वायनाड से भी लड़ने जा रहे हैं, शायद यह बात सही ही थी।
न तो ‘चौकीदार चोर है’ का तीर चला, न रफ़ाल की तलवार और न ही ‘न्याय योजना’ का ढिंढोरा कुछ काम आया। और तो और चुनाव से ठीक पहले प्रियंका गाँधी को मैदान में उतारने का तथाकथित मास्टर स्ट्रोक भी कांग्रेस की हालत नहीं सुधार सका।
2014 में कांग्रेस सिर्फ़ 44 सीटें जीत सकी थी। तब सोनिया गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष थीं और उपाध्यक्ष के तौर पर राहुल गाँधी पार्टी का लगभग पूरा कामकाज संभाल रहे थे। अब 5 बरस बाद राहुल गाँधी ख़ुद कांग्रेस अध्यक्ष हैं, लेकिन उनका प्रमोशन कांग्रेस को बमुश्किल बस 52-53 सीटें ही दिलवा पाया है। यानी, 5 साल के बाद कांग्रेस अपनी पिछली सीटों में बस 8-9 सीटों का ही इज़ाफ़ा करती नज़र आ रही है। वैसे, एग्ज़िट पोल आने के पहले तक राहुल गाँधी बहुत आत्मविश्वास से भरे नज़र आ रहे थे। कांग्रेस के अंदरुनी सूत्रों के मुताबिक़, पार्टी को उम्मीद थी कि वह सौ-सवा सौ सीटें तो जीत ही लेगी। राहुल गाँधी लगातार दावे कर रहे थे कि एनडीए किसी हाल में बहुमत के पास नहीं पहुँच पाएगा। लेकिन नतीजों ने बता दिया कि कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनका आकलन ज़मीनी हक़ीक़त से कितनी दूर था।
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सर्जिकल स्ट्राइक ने दिलाई जीत!

ज़ाहिर है कि नरेंद्र मोदी के रथ को रोकने की कांग्रेस की रणनीति सही नहीं थी। ख़ासकर इसलिए कि चुनाव के कुछ महीने पहले से ही बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था की ख़राब स्थिति, बैंकों का बढ़ता एनपीए, घटता निवेश और निर्यात, जीएसटी से छोटे उद्योगों की मुसीबत, किसानों पर छाया संकट, गोरक्षा अभियान के चलते आवारा पशुओं का गाँवों में आतंक, मॉब लिंचिंग, दलित उत्पीड़न जैसे तमाम मुद्दे काफ़ी मुखर थे। लेकिन बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कांग्रेस और समूचा विपक्ष लगभग सकते में आ गया। और अंत तक वह इससे उबर नहीं सका। इतने सारे मुद्दों के बावजूद जनता मोदी को ‘नेगेटिव नंबर’ देने का मन क्यों नहीं बना रही है,  यह बात न कांग्रेस भाँप पाई और न ही विपक्ष। दूसरी बात यह कि 2014 की हार के बाद भी कांग्रेस ने पाँच सालों में अपनी कार्यशैली और रणनीति में कोई बदलाव नहीं किया। मोदी, बीजेपी और संघ के महाकाय प्रचार तंत्र से कैसे निपटा जाए, यह उन्हें सूझ ही नहीं पाया।
हिंदुत्व के मुद्दे का मुक़ाबला करने के लिए राहुल ने ‘मंदिर पर्यटन’ ज़रूर शुरू किया लेकिन वोटरों पर इसका असर नहीं पड़ा। जबकि संघ परिवार धीरे-धीरे मुसलिम विरोधी ध्रुवीकरण को उभारकर एक नए क़िस्म के हिंदुत्व का बीज लोगों के मन में सफलतापूर्वक बो रहा था।
इस बात को बीजेपी, संघ और मोदी-शाह लगातार प्रचारित करते रहे कि कांग्रेस मुसलिम परस्त, पाकिस्तान परस्त और आतंकवादियों की समर्थक पार्टी है। इसकी कोई काट राहुल गाँधी या कांग्रेस के पास नहीं थी। यहाँ तक कि बीजेपी ने समझौता ब्लास्ट की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से उम्मीदवार बना दिया, तब भी कांग्रेस इसके ख़िलाफ़ बीजेपी को बिलकुल भी घेर नहीं सकी।
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यही बड़ा कारण था कि ‘अच्छे दिन’ के बजाय काफ़ी ख़राब दौर से गुज़र रहे देश और मोदी सरकार की तमाम विफलताओं के बावजूद वोटर मोदी के साथ खड़ा था और सतह पर भले ही कोई लहर नहीं दिखाई दे रही हो, लेकिन 2019 में बीजेपी को 2014 से भी कहीं बड़ी सफलता मिली जबकि माना जा रहा था कि 2014 में मोदी की लहर नहीं, आँधी थी।
तो अब कांग्रेस के सामने यह सवाल फिर मुँह बाये खड़ा है कि वह अब क्या करे? क्या कांग्रेस को नया नेतृत्व चाहिए? या उसे नये सिरे से अपने आप को पुनर्गठित करना चाहिए? इन सवालों का जवाब अब कांग्रेस को ही ढूँढना है।
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