महिला आरक्षण में मुस्लिम कोटे की मांग भारत की लोकतांत्रिक बहस का एक अहम मोड़ बन गई है। महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। इसका क्रियान्वयन अगली जनगणना के बाद परिसीमन के बाद होगा। 16 अप्रैल को संसद के विशेष सत्र में इस प्रक्रिया को तेज़ करने वाले विधेयक पेश किए गए तो समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों ने ओबीसी के साथ मुस्लिम महिलाओं के लिए स्पष्ट कोटे की मांग की। सवाल उठता है कि यह मुस्लिम कोटे का मुद्दा इतना अहम क्यों है? यह सिर्फ आँकड़ों का नहीं, बल्कि अंतर्संबंधी न्याय का मुद्दा है—लिंग, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन और धार्मिक अल्पसंख्यक स्थिति के त्रिपक्षीय बोझ को झेल रही 9-10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं का मुद्दा। लक्षित सुरक्षा के बिना महिला कोटा अपेक्षाकृत सुविधाप्राप्त समूहों को तो लाभ पहुंचा सकता है, जबकि सबसे कमज़ोर वर्गों की महिलाओं को हाशिए पर धकेल सकता है।

मौजूदा लोकसभा में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति

मौजूदा 18वीं लोकसभा में करीब 75 महिला सांसद हैं, लेकिन उनमें सिर्फ एक मुस्लिम महिला सांसद हैं। समाजवादी पार्टी की इक़रा हसन चौधरी। वो उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट से चुनी गई हैं। यह एकाकी प्रतिनिधित्व चौंकाने वाला है। 1952 से 18 लोकसभाओं में कुल क़रीब 690 महिला सांसदों में सिर्फ 18 मुस्लिम महिलाएं चुनी गईं। इनमें से 13 राजनीतिक परिवारों से आईं, जबकि पांच लोकसभाओं में कोई मुस्लिम महिला सांसद नहीं थी। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश या तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों से कभी कोई मुस्लिम महिला सांसद नहीं चुनी गई। भारत की जनसंख्या में मुस्लिम 14.2% (2011 जनगणना, अनुमानित 14-15%) हैं और मुस्लिम महिलाएं उसका आधा हैं। फिर भी उनका संसदीय प्रतिनिधित्व लगभग शून्य है। 543 सदस्यीय सदन में मुस्लिम महिलाओं का हिस्सा 0.2% से भी कम है। यही कारण है कि उप-कोटा को जरूरी माना जा रहा है: सामान्य महिला आरक्षण बिना सुरक्षा के ऐतिहासिक बहिष्कार को सुधार नहीं पाएगा।

विधानसभाओं में मुस्लिम महिलाएँ

राज्य की विधानसभाओं में ये तस्वीर और भी निराशाजनक है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार 28 राज्यों और चुनिंदा केंद्रशासित प्रदेशों में कुल 4092 विधायक हैं, जिनमें महिलाएं करीब 10% लगभग 400 हैं। मुस्लिम विधायकों की कुल संख्या ऐतिहासिक रूप से बहुत कम है। आज़ादी के बाद चुने गए 60,000 से अधिक विधायकों में सिर्फ 3,198 मुस्लिम, और उनमें से करीब 65 मुस्लिम महिलाएं विभिन्न राज्यों की विधानसभा में पहुंची हैं। अच्छी खासी मुस्लिम आबादी वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में भी मुस्लिम महिलाएं हाशिए पर हैं जहां मुस्लिम विधायक हैं। उदाहरणस्वरूप, 2025 में बिहार विधानसभा में मुस्लिम विधायक 11 रह गए। पिछली कई विधानसभाओं में ये संख्या सबसे कम है। एक मुस्लिम महिला विधायक नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक रूप से सिर्फ सात मुस्लिम महिला विधायक बनीं। ओडिशा ने 2024 में पहली मुस्लिम महिला विधायक चुनी। यह प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात से बहुत कम है। ये दर्शाता है कि बिना उप-कोटे के महिला आरक्षण मुस्लिम महिलाओं का सम्मानजनक संख्या में विधानसभाओं में पहुंचना नामुमकिन होगा।

संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने से रोकता है?

भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण को सीधे प्रतिबंधित करता है ताकि धर्मनिरपेक्षता (संविधान की मूल संरचना) बनी रहे। अनुच्छेद 15(1) धर्म के आधार पर भेदभाव रोकता है, जबकि अनुच्छेद 16 अवसर की समानता सुनिश्चित करता है। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत सामाजिक-शैक्षिक पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सकारात्मक कार्रवाई की अनुमति है—पिछड़ापन आधारित, न कि धर्म आधारित। सर्वोच्च न्यायालय ने शुद्ध धर्म-आधारित कोटों को असंवैधानिक ठहराया है। इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया था। 2023 का अधिनियम भी धार्मिक उप-कोटा से बचता है। हालाँकि, संविधान पिछड़े मुस्लिम उप-समूहों (जैसे पसमांदा या अरजल) को ओबीसी के रूप में पहचानने की अनुमति देता है। जाति सर्वेक्षण डेटा के आधार पर। यही बारीकी बहस को अहम बनाती है: पूर्ण 'मुस्लिम कोटा' न्यायिक जांच में फ़ेल हो सकता है, लेकिन पिछड़ापन-आधारित उप-कोटा संभव हैं।

क्या दलित आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं है?

यह सवाल संवैधानिक विरोधाभास को उजागर करता है। धर्म के आधार पर आरक्षण के समर्थक अक्सर इसका हवाला देते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950, एससी स्थिति और 15% आरक्षण को हिंदू, सिख और बौद्धों तक सीमित रखता है। हालाँकि 1956 में इसका दायरा सिखों तक बढ़ाया गया और 1990 में पौधों को भी इसमें शामिल कर लिया गया। इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को आरक्षण के लाभ से वंचित रखा जाता है, भले ही वे समान जातीय भेदभाव झेलते हों। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे हिंदू-परंपरा की ऐतिहासिक विकलांगताओं से जोड़ा है। फिर भी व्यवहार में यह धर्म से जुड़ा है। 

मुस्लिम और ईसाई धर्म अपना चुके दलित रंगनाथ मिश्रा आयोग का हवाला देकर इसमें शामिल होने की मांग करते हैं। एससी कोटे में यह 'धर्म-जुड़ा' अपवाद मुस्लिम महिलाओं के लिए ओबीसी-शैली उप-कोटे की मांग को मज़बूत करता है—यही कारण है कि मुद्दा संवैधानिक स्पष्टता की मांग करता है, न कि 'तुष्टीकरण' कहकर ख़ारिज किया जाए।

सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग

2006 में न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने मुस्लिम पिछड़ापन पर पहला व्यापक डेटा दिया। इसमें मुस्लिमों का लोकसभा प्रतिनिधित्व 5% पाया गया जबकि जनसंख्या में उनकी हस्सेदारी 13-14% थी। सरकारी नौकरियों और शिक्षा में भारी कमी, तथा 'पिछड़े' मुस्लिम समूहों (अरज़ल को ओबीसी जैसा) के लिए सकारात्मक कार्रवाई की सिफारिश की। इसमें मुस्लिम-बहुल सीटों को एससी के लिए आरक्षित होने से बचाने के लिए तर्कसंगत परिसीमन और स्थानीय निकायों में नामांकन की बात कही। लेकिन विधायी सीट कोटे या 'डबल वोटिंग' से साफ़ इनकार किया। 2007 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग ने और आगे जाकर नौकरियों/शिक्षा में 15% अल्पसंख्यक आरक्षण (मुस्लिमों के लिए 10%, अन्य के लिए 5%) की सिफ़ारिश की। सामाजिक पिछड़ापन के आधार पर। दोनों रिपोर्टें धर्म के बजाय सामाजिक-आर्थिक मानदंड पर जोर देती हैं, जो 2026 में भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे पसमांदा मुस्लिम महिलाओं के लिए उप-कोटे को संवैधानिक रूप से उचित ठहराती हैं।

संयुक्त राष्ट्र का चार्टर

1945 का संयुक्त राष्ट्र चार्टर धर्म के आधार पर भेदभाव रहित मानवाधिकारों को बढ़ावा देता है। इसके अनुच्छेद 1 और 55 में इसका स्पष्ट उल्लेख है। मुख्य दस्तावेज़ 1992 का 'धार्मिक, भाषाई और जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर घोषणा-पत्र' है। अनुच्छेद 2 अल्पसंख्यकों को सार्वजनिक जीवन और उनसे संबंधित निर्णयों में प्रभावी भागीदारी का अधिकार देता है। अनुच्छेद 1 राज्यों को अल्पसंख्यक पहचान की रक्षा और भागीदारी बढ़ाने के 'उचित' उपाय करने को कहता है। यह कोटे का आदेश नहीं देता, लेकिन समावेश के लिए सकारात्मक कार्रवाई का समर्थन करता है। भारत आईसीसीपीआर (अनुच्छेद 27) से बंधा है। ये घोषणा दर्शाती है कि मुस्लिम कोटे का सवाल वैश्विक रूप से अहम क्यों है: प्रभावी प्रतिनिधित्व मानवाधिकार की मांग है, न कि दान।

इस विषय पर क्या है संवैधानिक प्रतिबद्धता?

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता, समानता (अनुच्छेद 14-16) और अल्पसंख्यक सुरक्षा (अनुच्छेद 29-30) की प्रतिबद्धता रखता है। जाति-आधारित आरक्षण (अनुच्छेद 330, 332) के विपरीत राजनीतिक कोटे के लिए धर्म-आधारित प्रावधान नहीं है‌। संविधान सभा ने पूना पैक्ट के बाद सांप्रदायिक निर्वाचन ख़ारिज किया। अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व सामान्य समानता से आता है, न कि निश्चित हिस्से से। संविधान का 106वां संशोधन इसी लिंग-केंद्रित दृष्टिकोण का पालन करता है। फिर भी, डेटा (2026 जाति जनगणना) के आधार पर पिछड़े वर्गों की उप-श्रेणीकरण की अनुमति है। कोई धर्म-विशिष्ट कोटा संशोधन और मूल संरचना जांच का विषय होगा। प्रतिबद्धता एकता और समता के संतुलन में है: मुस्लिम महिलाओं के बहिष्कार को नज़रअंदाज़ करना संविधान की वास्तविक समानता की प्रतिज्ञा को कमजोर करता है।

इन देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों का कोटा?

कई लोकतंत्र धार्मिक या संप्रदायिक कोटों का उपयोग विविधता प्रबंधन के लिए करते हैं। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में ग़ैर-मुस्लिमों (ईसाई, हिंदू आदि) के लिए 10 सीटें आरक्षित हैं। ईरान की मज्लिस में पांच आरक्षित सीटें: दो ईसाई (आर्मेनियन), एक-एक असिरियन, यहूदी और जरोस्ट्रियन के लिए। लेबनान की संसद मुस्लिम-ईसाई सीटें बराबर बांटती है, फिर संप्रदायों (सुन्नी, शिया, मारोनाइट) में। कोसोवो में सर्ब और बोस्नियाक जैसे जातीय-धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए सीटें आरक्षित हैं। सिंगापुर ग्रुप रिप्रेजेंटेशन कांस्टीट्यूएंसी से अल्पसंख्यक (धार्मिक सहित) प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है। ब्रिटेन में हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एंग्लिकन बिशपों के लिए 'लॉर्ड्स स्पिरिचुअल' सीटें हैं। ये मॉडल सांप्रदायिक विभाजनों का समाधान करते हैं लेकिन पहचान-राजनीति को मज़बूत करने के लिए आलोचित भी हैं। भारत का जाति-केंद्रित दृष्टिकोण अलग है, फिर भी वैश्विक मिसालें दिखाती हैं कि सावधानीपूर्वक तैयार कोटे बहुलता को मज़बूत कर सकते हैं।

आगे का रास्ता क्या?

मुद्दे की अहमियत 2026 के परिसीमन विधेयकों और जाति जनगणना के बीच चरम पर है। विपक्षी ओबीसी-मुस्लिम उप-कोटे की मांग राजनीति को ध्रुवीकृत कर सकती है, जबकि सरकार इसे असंवैधानिक बताती है। मुस्लिम कोटे के समर्थक अंतर्संबंधिता का तर्क देते हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम महिलाएँ त्रिपक्षीय बाधाएं झेलती हैं। सच्चर कमेटी के अनुसार पितृसत्ता, ग़रीबी और भेदभाव मुस्लिम महिलाओं की नियति है। सामान्य महिला कोटा असमानताएं बढ़ा सकता है। विरोधी खंडित राजनीति का डर जताते हैं। व्यावहारिक रास्ता यही है कि अधिनियम में ओबीसी उप-कोटे का संशोधन आमसहमति से किया जाए। पिछड़े मुस्लिमों को सूचीबद्ध डेटा से शामिल किया जाए और पार्टियों पर टिकट देने का दबाव बनाया जाए। कोटों से परे शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और समुदाय-आंतरिक सुधार ज़रूरी है। अंततः, इस सवाल को नज़रअंदाज करना समावेशी लोकतंत्र को कमज़ोर करता है; इसे संबोधित करना उसे मज़बूत करेगा।

महिला आरक्षण में मुस्लिम कोटे का सवाल अहम इसलिए है क्योंकि यह भारत की सबसे हाशिए की महिलाओं को न्याय दिलाने की क्षमता की परीक्षा है। धर्मनिरपेक्ष एकता से समझौता किए बिना। आंकड़े, इतिहास और वैश्विक मानदंड सूक्ष्म समाधानों की मांग करते हैं। तभी नारी शक्ति सभी वर्गों को सशक्त बना सकेगी। प्यासा इस मुद्दे पर ग़ौर करके राजनीतिक आम सहमति से इसका समाधान निकालना वक़्त की ज़रूरत है। महिला आरक्षण में मुस्लिम कोटे की गुत्थी मोदी सरकार के "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास" नारे की भी अग्नि परीक्षा है।