आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी
मौलाना मुहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के कुल 40 में से 38 कमरे बिना नक़्शा पास कराये बनाने के आरोप में रामपुर विकास प्राधिकरण के ध्वस्तीकरण के आदेश पर हालांकि कमिश्नर आंजनेय कुमार ने फिलहाल तो स्टे कर दिया है, लेकिन योगी और अन्य बीजेपी सरकारों की अब तक की मुस्लिम विरोधी कार्यशैली को देखते हुए लगता नहीं कि यह स्टे स्थायी आदेश में बदलेगा। हालाँकि यह मामला राहत नहीं मिलने पर कोर्ट में भी जायेगा लेकिन बड़ी अदालतों का रूख़ भी आजकल सरकार को नाराज़ नहीं करने का साफ़ देखा जा सकता है।
दरअसल, यह मामला एक यूनिवर्सिटी या गैर कानूनी निर्माण तोड़ने का नहीं, मुसलमानों का मनोबल तोड़ने का अधिक लगता है। जिस तरह से देश में अनेक मस्जिद और मदरसे आये दिन अवैध बताकर तोड़े जा रहे हैं तो ऐसा नहीं है कि केवल यही अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल गैर कानूनी या बिना नक्शा पास कराये बने होंगे। लेकिन निशाना केवल इनको ही मुसलमानों को एक संदेश देने के लिये बनाया जा रहा है। हालांकि अपवाद के तौर पर कभी कभी, कहीं कहीं अन्य धर्म वालों के आस्था स्थल और मकान-दुकान भी तोड़े जाते हैं लेकिन उनका कारण कुछ और होता है। अयोध्या में राममंदिर के चढ़ावा चोरी और जंतर मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी के बैनर तले देश में हुए युवाओं के अभूतपूर्व आंदोलन से जनता का ध्यान हटाने का भी सरकार का एक मकसद हो सकता है।
एएमयू पर भी हुआ था विवाद
इससे पहले कई साल तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्जा छीनने का सरकार का अभियान भी मुस्लिम समाज को लंबे समय तक भय और तनाव में रखने में सफल रहा था। लेकिन बाद में उस समय के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चन्द्रचूड़ की बेंच ने आश्चर्यजनक तरीके से हिम्मत और निष्पक्षता दिखाते हुए एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा बहाल रखने का ऐतिहासिक आदेश दिया था। जिस पर मोदी सरकार इस अहम और संवेदनशील मुद्दे पर कोई अग्रिम कानूनी कार्यवाही नहीं करने पर मजबूर हो गयी थी। लेकिन उसकी मुसलमानों को मुख्यधारा से बाहर रखकर दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने, उनके साथ कदम कदम पर अन्याय और अत्याचार करने की नीति में कोई खास अंतर नहीं आया है।
जौहर यूनिवर्सिटी को सपा के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान को सबक सिखाने के लिये भी निशाने पर लिया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि सपा में आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच झेल चुके पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव, पूर्व सीएम अखिलेश यादव, उनके चाचा शिवपाल यादव तथा राम गोपाल यादव, सपा में कई अन्य वरिष्ठ नेता मंत्री और अधिकारी क्या भ्रष्ट नहीं थे जो केवल आज़म खान को ही सौ से अधिक मुकदमे कायम कर लगातार जेल में रखा जा रहा है? विपक्ष का सवाल रहा है कि क्या जौहर यूनिवर्सिटी की तरह अनेक सरकारी और निजी यूनिवर्सिटियों में गैर कानूनी निर्माण और अवैध गतिविधियां नहीं हुई होंगी लेकिन केवल इसी को निशाने पर लेने का मकसद क्या मुसलमानों को अनपढ़ जाहिल और बेरोज़गार बनाये रखना नहीं माना जाना चाहिये?
अगर जम्मू के वैष्णोदेवी मेडिकल काॅलेज में मेरिट के आधार पर 50 में से 42 मुस्लिम छात्रों के एडमिशन होने पर सरकार उस काॅलेज की मान्यता ही रद्द कर देती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है।
जुनैद मलिक निशाने पर क्यों आए?
हाल ही में जंतर मंतर पर सीजेपी के आंदोलन में यूपी के गाज़ियाबाद जिले के मसूरी निवासी जुनैद मलिक आंदोलन करने वाले युवाओं को खाना परोस रहा था। उसको दिल्ली पुलिस ने पकड़ लिया। उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर उसके राज्य यूपी ले जाया गया। उससे घंटों तक खाने की फंडिंग को लेकर दर्जनों सवाल पूछे गये। उसको रात के अंधेरे में हाईवे पर छोड़ दिया गया। उसके परिवार को भी पुलिस ने थाने बुलाकर डराया धमकाया। ऐसा और बच्चों के साथ भी हुआ है लेकिन इनमें मुस्लिम और दलित अधिक शामिल हैं। सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाला उमर खालिद अपने कई साथियों के साथ संविधान, तिरंगा झंडा और भारत माता की जय के नारों के बीच कानून का सम्मान करते हुए भाषण देता था लेकिन उनको सरकार ने कई साल से जेल में डाल रखा है और ‘बेल नियम जेल अपवाद’ बताने वाली अदालत उनको जमानत नहीं दे रही है। जबकि यह कानून ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ केवल मुसलमानों को शरणार्थी के तौर पर आने पर भारत की नागरिकता देने से मना करता है।कफील ख़ान का मामला
यूपी के गोरखपुर में जब सरकारी मेडिकल काॅलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई ठेकेदार ने भुगतान नहीं होने के कारण काट दी तो वहां सेवा दे रहे बच्चों के डॉक्टर कफील खान ने अपनी जेब से प्राइवेट ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदकर कई बच्चों की जान बचाई थी। इससे वे हीरो बन गये। लेकिन नतीजा क्या हुआ उनको पुरस्कृत करने की बजाये उल्टा मुसलमान होने की वजह से झूठे आरोप लगाकर कई महीनों के लिये जेल में डाल दिया गया। बाद में वे एक भी आरोप साबित नहीं होने पर कोर्ट से बरी किये गये। कश्मीरी लोगों को धारा 370 हटाने के बाद कई माह तक घरों में लाॅकडाउन लगाकर कैद रखा गया और देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य का पूर्ण राज्य का दर्जा छीनकर केंद्र शासित बना दिया गया। सद्दीक कप्पन नाम का एक पत्रकार हाथरस में हुए दलित युवती के बलात्कार की रिपोर्टिंग करने के लिए जैसे ही मथुरा पहुंचा उनको यूपी पुलिस ने 2020 में विदेशी साज़िश का फर्जी आरोप लगाकर हिरासत में लिया और कई माह तक जेल में रखा। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद रिहा हो सके थे। सरकार सड़क पर दस मिनट की नमाज़ पर रोक लगाती है लेकिन इसी रोड हाईवे एक्सप्रेस वे को एक माह के लिये कांवड़ के लिये बंद कर दिया जाता है। अकेले मेरठ दिल्ली एक्सप्रेस वे पर इस दौरान 700 करोड़ के नुकसान का व्यापारियों का अनुमान है। इस दौरान मांस बेचने पर भी रोक लग जाती है। मुस्लिम दुकानदारों होटलों और ढाबों को भी अपनी पहचान सार्वजनिक करने पर मजबूर किया जाता है। जिससे उनका कांवड़ वाले खरीदारी में बहिष्कार कर सकें।
कर्नल सोफिया कुरैशी मामला
सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को ऑप्रेशन सिंदूर सफलतापूर्वक करने के बादवजूद एक मुस्लिम होने की वजह से बीजेपी के एक मंत्री आतंकियों की बहन बताते हैं और उनको कोई सज़ा नहीं मिलती। पूरे देश में आये दिन मुस्लिम नामों वाले शहरों, कस्बों, गांवों और संस्थानों के नाम बदलकर हिंदू धर्म और संस्कृति के अनुसार रखे जा रहे हैं। सवाल है कि क्या यह देश मुसलमानों का नहीं है? किसी भी मुसलमान पर झूठा आरोप लगने पर भी तत्काल केस दर्ज हो जाता है और उसको जेल भेजने के साथ ही उसके दुकान मकान पर बुल्डोज़र भी चल जाता है। उसको ज़मानत भी अकसर देर से मिलती है। बाद में कोर्ट से वह बेकसूर साबित होने पर बरी हो जाता है तो ध्वस्तीकरण से उसके नुकसान का सरकार मुआवज़ा क्यों नहीं देती? हालांकि बुल्डोज़र अब गैर मुस्लिमों के यहां भी कई मामलों में जाने लगा है लेकिन वह भी गैर कानूनी ही है। बोट से गंगा की सैर कर बिरयानी खाने वाले एक दर्जन से अधिक मुस्लिम युवाओं को चिकन की हड्डी नदी में फेंकने पर महीनों के लिए जेल में रखा गया।
बिहार से लेकर यूपी और कई बीजेपी शासित राज्यों तक में चुन चुनकर पहले अनेक मुस्लिम माफियाओं का गैर कानूनी तरीके से फर्जी एनकाउंटर करके एक खास संदेश दिया गया। बाद में यह कवायद सभी वर्गों के लिये आम हो चुकी है। गोमांस का आरोप लगाकर कई मुसलमानों की माॅब लिंचिंग की जा चुकी है। अंतरधार्मिक विवाह का कानून और संविधान में अधिकार होने के बाद भी लव जिहाद बताकर केवल उन मामलों को रोका और मारा पीटा जाता है जिनमें लड़की हिंदू और लड़का मुस्लिम होता है।
काॅमन सिविल कोड
कई बीजेपी शासित राज्यों में काॅमन सिविल कोड के नाम पर सबके लिये एक-सा कानून लाने का दावा कर आदिवासियों को इससे बाहर रखकर केवल मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है। कश्मीर फाइल, केरल स्टोरी, हिजाब विवाद, हज सब्सिडी, कोरोना जिहाद, लैंड जिहाद, थूक जिहाद, यूपीएससी जिहाद, काॅरपोरेट जिहाद, रामनवमी पर शोभायात्रा के नाम पर मुस्लिम बस्तियों और मस्जिदों के सामने आपत्तिजनक नारेबाज़ी, वक्फ बोर्ड कानून के द्वारा उनकी सम्पत्तियों पर सरकार की बुरी नज़र, फिल्मी सितारे शाहरूख़, आमिर और सलमान को तरह-तरह से सताना, यहां तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव द्वारा मुसलमानों को टारगेट करने के बाद भी उनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं होना, इसकी कई मिसालें हैं। मुस्लिम विरोधी कई कानून बनाने के साथ ही असम और यूपी के सीएम आये दिन ऐसे बयान देते रहते हैं जिनसे मुसलमानों को अपमानित, प्रताड़ित और उनका मनोबल तोड़ा जा सके। इसलिये जौहर यूनिवर्सिटी तो नया बहाना है, इसके तोड़ने के आदेश के ज़रिये मुसलमानों का मनोबल तोड़ना अधिक प्रतीत होता है।