1 दिसंबर 2025 की रात यरुशलम में  इसराइली राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग के घर के बाहर हजारों लोग जमा थे। हाथों में तख्तियाँ थीं – “किंग बिबी को माफी नहीं”, “न्याय सबके लिए बराबर”। लोग चिल्ला रहे थे – “बिबी घर जाओ इज़रायल के सबसे ज़्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाने वाले। उन्हें प्यार से और तंज से दोनों ही “बिबी” कहते हैं। 
“बिबी” उनके नाम बिन्यामिन का छोटा और सबसे लोकप्रिय रूप है। नेतन्याहू 1996 से 1999, फिर 2009-2021 और फिर 2022 से प्रधानमंत्री हैं – यानी उनका तीसरा कार्यकाल चल रहा है। ये बताता है कि वे इसराइल की राजनीति में कितनी अहम हैसियत रखते हैं। लेकिन फ़िलहाल देश भर में उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं। वजह है उनका माफ़ी नामा। 
दरअसल, नेतन्याहू ने अपने ख़िलाफ़ चल रहे भ्रष्टाचार के तीन गंभीर मामलों को बंद करने और माफ़ कर देने की अपील राष्ट्रपति हर्ज़ोग से की है। लेकिन विपक्ष और आम लोग भड़के हुए हैं क्योंकि उन्होंने अपना गुनाह स्वीकार किए बिना माफ़ कर देने की अपील की है। लोग दंडहीनता की संभावना के ख़िलाफ़ हैं। उनका कहना है कि क़ानून के सामने सब बराबर हैं।
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नेतन्याहू पर लगे गंभीर आरोप

सबसे पहले समझिए – नेतन्याहू पर क्या-क्या आरोप हैं। तीन अलग-अलग केस हैं, जिन्हें नंबर से पुकारा जाता है।

केस 1000: 'गिफ्ट्स अफेयर': नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा पर हॉलीवुड प्रोड्यूसर अर्नोन मिलचन और ऑस्ट्रेलियाई अरबपति जेम्स पैकर से 2007 से 2016 तक 2 लाख डॉलर के गिफ्ट्स लेने का आरोप है – शैंपेन, सिगार, ज्वेलरी। बदले में नेतन्याहू ने मिलचन के लिए अमेरिकी वीजा लॉबिंग की, और विदेशी इसराइलियों को टैक्स छूट का कानून पास करवाया। पैकर को निवेश के लिए नागरिकता का वादा तक किया! कीमत? बदले में लिये 7 लाख शेकेल, यानी करीब 2 करोड़ रुपये। इस मामले में 3 से 10 साल तक की जेल हो सकती है।

केस 2000: 'मोजेस अफेयर': नेतन्याहू ने इसराइल का सबसे बड़े और सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले दैनिक अख़बार येदियोत अह्रोनोत के मालिक अर्नोन मोजेस से डील की – “अच्छी कवरेज दो, मैं तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी इसराइल हयोम को सर्कुलेशन लिमिट करने वाला कानून पास करवाऊँगा।” 2008 से 2014 के बीच तीन गुप्त मीटिंग्स हुईं। धोखाधड़ी का आरोप।

केस 4000: 'बेजेक अफेयर': संचार मंत्री रहते नेतन्याहू ने टेलीकॉम कंपनी बेजेक के मालिक शाउल एलोविच को रेगुलेटरी फायदे दिए –  500 मिलियन डॉलर का लाभ दिलाया। बदले में उनकी न्यूज़ साइट वल्ला पर पॉज़िटिव कवरेज करवाई।
पुलिस ने 2018 में इंडिक्टमेंट सिफ़ारिश की, यानी पहली नज़र में आरोप सही पाए गये। ट्रायल 2020 से चल रहा है, अब तक 300 से ज़्यादा गवाह हो चुके हैं। इन सबके लिए सज़ा 10 साल तक की कैद हो सकती है। नेतन्याहू कहते हैं, “सब झूठ!” लेकिन कोर्ट में मामला लटकाये रखने के लिए बहाने बनाते रहे – डिप्लोमेसी, सिक्योरिटी वग़ैरह। अब माफ़ी का रुख लेकिन बिना अपराध स्वीकार किये।

माफ़ी की माँग और ट्रंप का साथ

30 नवंबर 2025 को नेतन्याहू ने राष्ट्रपति को 111 पेज की याचिका सौंपी। मुख्य तर्क दो हैं: पहला – ये मुक़दमे देश को बाँट रहे हैं। दूसरा – मध्य पूर्व के इस नाजुक समय में उन्हें पूरा ध्यान सिक्योरिटी और कूटनीति पर चाहिए। याचिका में उन्होंने अपराध स्वीकार नहीं किया, बल्कि बार-बार कहा – “मैं निर्दोष हूँ, ये राजनीतिक उत्पीड़न है।”
यही नहीं, उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नवंबर का पत्र भी संलग्न कर दिया। इसमें ट्रंप ने लिखा: “नेतन्याहू एक असाधारण युद्धकालीन नेता हैं, इन मुक़दमों को समाप्त कर देना चाहिए।” ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से भी ऐसा कह चुके हैं।
ट्रंप “अब्राहम अकॉर्ड” को अपनी सबसे बड़ी विदेश नीति सफलता मानते हैं, जिसमें नेतन्याहू का साथ मिला। अब्राहम अकॉर्ड के तहत 2020 में इसराइल और चार अरब देशों – संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को – के बीच पहली बार बिना फ़िलिस्तीन मुद्दे सुलझाए शांति और राजनयिक संबंध स्थापित हुए। इसे नेतन्याहू की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत माना जाता है। ट्रंप इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं, ख़ासकर सऊदी अरब के साथ। इसके लिए उन्हें नेतन्याहू की ज़रूरत है। ट्रंप को परवाह नहीं कि गाज़ा पट्टी में नेतन्याहू ने नरसंहार किया है।

ग़ज़ा का नरसंहार

7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद ग़ज़ा पर इसराइली बमबारी में 67,000 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मारे गये, लाखों बेघर हुए। बच्चों और महिलाओं की बड़ी तादाद में मौत हुई। 2025 में सीज़फायर के बावजूद हमले जारी हैं। नेतन्याहू कहते हैं, “जॉब खत्म नहीं!” लेकिन दुनिया भड़की हुईहै – यूएन, ईयू, यूएनएचआरसी सबने इसे “जेनोसाइड” कहा और नेतन्याहू को ज़िम्मेदार ठहराया। ब्रिटेन, फ़्रांस, कनाडा ने फ़िलिस्तीन को मान्यता दी। आईसीसी (इंटरनेशनल  क्रिमिनल कोर्ट) ने नेतन्याहू के खिलाफ वारंट जारी किया है। उनके ख़िलाफ़ न्यूयॉर्क से लंदन तक प्रदर्शन हो रहे हैं। नागरिकों को निशाना बनाने के लिए उन्हें 'युद्ध अपराधी’ कहा जा रहा है। न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित मेयर ज़ोहरान ममदानी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि अगर नेतन्याहू न्यूयॉर्क आएँ तो गिरफ़्तार कर लेंगे। और अब नेतन्याहू माफ़ी चाहते हैं – नरसंहार के लिए नहीं, भ्रष्टाचार के आरोपों से छुटकारा पाने के लिए। ज़ाहिर है, इसराइल में तीखी प्रतिक्रिया हो रही है।

विपक्ष का तीखा विरोध और जनता का गुस्सा

विपक्ष ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताया। हर तरफ़ सवाल उठ रहा है कि इतने गंभीर आरोपों में माफ़ी कैसे दी जा सकती है? मुक़दमा चलना चाहिए। नेतन्याहू कोई राजा नहीं हैं। तंज़ किया जा रहा है – ‘किंग बिबी और क्वीन सारा।’ विपक्ष के बड़े-बड़े नेता भी खुलकर विरोध कर रहे हैं।
याइर लापिड विपक्ष के नेता हैं और येश अतीद पार्टी के अध्यक्ष भी। पूर्व पत्रकार, टीवी होस्ट, लेखक। 2013 से राजनीति में, 2022 में कुछ महीनों के लिए प्रधानमंत्री भी रहे। नेतन्याहू के सबसे मुखर आलोचक। लापिड कहते हैं: “बिना अपराध स्वीकार किए, बिना पश्चाताप के, बिना राजनीति छोड़े माफ़ी नहीं हो सकती।”
वहीं, नेशनल यूनिटी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व रक्षामंत्री बेनी गैंट्ज़ – जो पूर्व सेना प्रमुख भी हैं – ताल ठोंक रहे हैं। गाज़ा युद्ध के बाद इस्तीफ़ा देकर विपक्ष में चले गए थे। उन्होंने कहा कि अगर नेतन्याहू राजनीति छोड़ दें तो ट्रायल ख़त्म करने पर विचार किया जा सकता है।
हज़ारों लोग सड़कों पर हैं – तख्तियाँ हैं “नो इम्युनिटी, नो इंप्यूनिटी”। कानूनी स्थिति: राष्ट्रपति को माफ़ी देने का अधिकार है, लेकिन दोषसिद्धि से पहले ऐसा बहुत कम हुआ है।

भ्रष्टाचार का पुराना सिलसिला

नेतन्याहू कुल 17 साल से ज़्यादा समय प्रधानमंत्री पद पर बिता चुक हैं। यह इज़रायल के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल। उनके समर्थक उन्हें “मिस्टर सिक्योरिटी” कहते हैं। आलोचक कहते हैं – उन्होंने देश को गहरे विभाजन में डाला। वैसे, इज़रायल में भ्रष्टाचार का पुराना रिकॉर्ड है। 1996 के बाद से लगभग हर प्रधानमंत्री जाँच के दायरे में रहा।

तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों का ज़िक्र

एहुद ओल्मर्ट (2006–2009): तीन अलग-अलग केस (होलीलैंड, तालांस्की, रिशोन टूर्स) में दोषी ठहराए गए। फ़रवरी 2016 से जुलाई 2017 तक 19 महीने जेल में रहे (कुल सज़ा 27 महीने थी, अच्छे व्यवहार पर छूट मिली)। इसराइल के इतिहास में जेल जाने वाले एकमात्र पूर्व प्रधानमंत्री।
एरियल शारोन (2001–2006): पर गंभीर आरोप थे। बेटे गिलाद और व्यवसायी सिरिल कर्न के साथ रिश्वत-लोन कांड। 2004-05 में जाँच चली, लेकिन 2006 में कोमा में चले गए। केस बंद हो गया।
एहुद बराक (1999–2001): 1999-2000 में अवैध चुनावी फ़ंडिंग और एनजीओ के ज़रिए पैसे लेने के आरोप। 2001 में जाँच बंद हो गई, कोई दोषसिद्धि नहीं।
  • ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2024 सूची में इसराइल 180 देशों में 30वें स्थान पर है – स्कोर 64/100। मध्य पूर्व में ये सबसे अच्छा है, लेकिन पिछले दस साल में 10 अंक नीचे गिरा है।


जनता की मुखर आवाज़

वैसे इसराइल में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो जनता मुखर भी हो रही है। वरना कई लोकतंत्र तो ऐसे हैं जहाँ चुने हुए लोग ख़ुद को भगवान घोषित कर रहे हैं और उनके हर भ्रष्टाचार को मरियल मीडिया मास्टर स्ट्रोक बताता रहता है। ऐसे शासकों की भी नज़र नेतन्याहू पर है। वे दिल से चाहते हैं कि नेतन्याहू को माफ़ कर दिया जाए ताकि उनके लिए भी नज़ीर बने। सवाल है कि जनता क्या चाहती है? इसराइल की जनता तो नेतन्याहू को छोड़ने के मूड में नहीं लगती।