26 अगस्त, 2025 को अहमदाबाद में मारुति सुजुकी के हंसलपुर संयंत्र में ई-विटारा के लोकार्पण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बयान चर्चा में है। उन्होंने कहा, "मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं कि पैसा किसका है, चाहे वह डॉलर हो, पाउंड हो, या काला हो या गोरा, लेकिन उस पैसे से जो उत्पादन होता है, उसमें मेरे देशवासियों का पसीना होना चाहिए।" यह बयान उनके पिछले रुख से उलट है, जिसमें वे काले धन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और उसे विदेशी बैंकों से वापस लाने का दावा करते थे।

मोदी का नया बयान देंग शियाओ पिंग के प्रसिद्ध कथन "बिल्ली काली हो या गोरी, चूहा पकड़ ले तो ठीक है" की याद दिलाता है, जो चीन के बाजारवादी सुधारों का प्रतीक था। लेकिन भारत, जो 1991 से उदारीकरण की राह पर है, में यह दृष्टिकोण अलग संदर्भ में देखा जा रहा है। कांग्रेस ने इसे भ्रष्टाचार का संकेत बताते हुए मोदी के पुराने बयानों से तुलना की है।

तो क्या आर्थिक दबाव ने इस नरम रुख़ को जन्म दिया है। क्या ऐसा नहीं लगता कि प्रधानमंत्री काला धन रखने वालों को संकेत दे रहे हैं कि वे बेहिचक निवेश करें, उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। इस समय देश आर्थिक संकट में है। अमेरिकी राष्ट्रपि ट्रंप ने 50 फ़ीसदी टैरिफ़  लगाकर नया संकट पैदा कर दिया है। मैन्यूफ़ैक्चरिंग सेक्टर का योगदान महज़ 15 फ़ीसदी है जबकि लक्ष्य 25 फ़ीसदी है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे नारों के बावजूद धरातल पर कुछ उतरता नहीं दिख रहा है और बेरोज़गारी ऐतिहासिक गिवाट के दौर में है।
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काले धन से जंग के दिन

2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने वादा किया था कि विदेशों से काला धन लाकर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपये जमा किये जायेंगे। ज़ाहिर है, लोगों को यह कड़ा रुख़ पसंद आया। वे प्रधानमंत्री बन गये। नवंबर 2016 में उन्होंने काले धन पर वार का दावा करते हुए नोटबंदी जैसा बड़ा कदम उठाया था लेकिन रिजर्व बैंक की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि 99.3% पुराने नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गये थे। इससे काले धन पर लगाम लगाने का दावा धराशायी हो गया था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को "संगठित लूट" करार दिया था, और जीडीपी में लगभग 2% की गिरावट का उनका अनुमान भी सही साबित हुआ था।

2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था। नरेंद्र मोदी ने उस समय यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार और काले धन को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए जोरदार प्रचार किया। उनके बयान, जैसे "काला धन वापस लाकर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपये जमा किए जा सकते हैं" और "ईमानदार करदाताओं को 5-10% राशि उपहार के रूप में दी जाएगी," ने जनता में उम्मीद जगाई। उन्होंने यह भी वादा किया कि सरकार बनते ही एक टास्क फोर्स बनाई जाएगी, जो विदेशों में जमा काले धन को वापस लाएगी, चाहे इसके लिए कानून में संशोधन करना पड़े या नए कानून बनाना पड़े। ये वादे उस समय की राजनीतिक गर्मी में अहम थे, जब यूपीए सरकार टूजी और कोयला घोटाले जैसे आरोपों से जूझ रही थी। हालांकि, बाद में ये घोटाले अदालतों में बेबुनियाद साबित हुए। 

यह भी सामने आया कि बीजेपी और आरएसएस ने यूपीए सरकार को बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित रणनीति अपनाई थी। इस माहौल में अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर जैसे प्रभावशाली चेहरों ने काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनों को जो हवा दी थी उसका पूरा लाभ बीजेपी और मोदी को मिला।

रामदेव और आंदोलन

2011 में बाबा रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन किया। भगवा वस्त्रों में टीवी के जरिए घर-घर पहुंच चुके रामदेव ने स्वदेशी और आयुर्वेद का प्रचार करते हुए दावा किया कि यदि काला धन वापस आ जाए, तो पेट्रोल 30 रुपये प्रति लीटर और रसोई गैस 150-200 रुपये प्रति सिलेंडर मिलने लगेगा। उस समय पेट्रोल 70 रुपये और रसोई गैस 400 रुपये प्रति सिलेंडर थी। लेकिन आज, 2025 में, पेट्रोल 100 रुपये से ऊपर और रसोई गैस 1000 रुपये से अधिक है। रामदेव की पतंजलि अब  एक मल्टीनेशनल कंपनी बन चुकी है, जिसकी मार्केट वैल्यू 65,974 करोड़ रुपये और पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड का टर्नओवर 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। उनके पुराने वादे अब भूल चुके प्रतीत होते हैं।

इसी तरह, श्री श्री रविशंकर ने 2014 में दावा किया कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 40 रुपये तक पहुंच सकती है। उस समय डॉलर 60 रुपये के आसपास था, लेकिन आज यह 86.50 रुपये से अधिक है। यह विडंबना ही है कि मोदी ने कभी मनमोहन सिंह की उम्र को डॉलर की कीमत से जोड़ा था, लेकिन अब डॉलर की कीमत उनकी अपनी उम्र को पीछे छोड़ चुकी है।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का अंत

अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी 2011-12 में चर्चा में था। रामलीला मैदान में लोकपाल की मांग के साथ हजारों युवा थिरक रहे थे। लेकिन इस आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाकर दिल्ली में तीन बार सरकार बनाई, फिर भी लोकपाल का मुद्दा उनके लिए गौण हो गया। पार्टी के भीतर लोकपाल बनाए गए एडमिरल रामदास को हटा दिया गया, और प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव जैसे प्रतिबद्ध नेताओं से रिश्ते तोड़ लिये गए। केजरीवाल स्वयं शराब घोटाले के आरोप में जेल गये, भले ही वे बेगुनाह होने का दावा करें। इस सबका लाभ अंततः मोदी और बीजेपी को मिला, जिन्होंने 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी।

नोटबंदी: एक विफल प्रयोग

8 नवंबर, 2016 को मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोटों को तत्काल बंद करने की घोषणा की। इसका दावा था कि काला धन बाहर आएगा, क्योंकि लोग अपने अवैध धन को बैंकों में जमा करेंगे, जिससे उनकी पहचान हो सकेगी। लेकिन रिजर्व बैंक की 2017 की रिपोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें बताया गया कि 99.3% पुराने नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए। इसका मतलब था कि काला धन ज्यादातर नकदी में नहीं, बल्कि संपत्ति, सोना या विदेशी खातों में था।
विश्लेषण से और
नोटबंदी का असर छोटे व्यवसायों, असंगठित क्षेत्र और रोजगार पर पड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे "संगठित लूट और कानूनी डकैती" करार दिया और जीडीपी में 2% की गिरावट की आशंका जताई, जो 2017-18 में 6.7% की वृद्धि दर के साथ काफी हद तक सही साबित हुई। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियां आधी हो गईं, और भारतीय अर्थव्यवस्था उस स्तर पर नहीं पहुंच पाया, जो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में थी।

विदेशी बैंकों में काला धन

विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए सरकार ने स्विट्जरलैंड जैसे देशों के साथ सूचना साझा करने के समझौते किये। लेकिन ठोस आंकड़े नहीं बताते कि कितना धन वास्तव में वापस आया। अनुमानों के मुताबिक, स्विस बैंकों में भारतीयों का 1.06 से 1.4 ट्रिलियन डॉलर हो सकता है, लेकिन स्विट्जरलैंड ने इसे गलत बताया है। यह भी सच है कि विदेशी बैंकों में जमा सारा धन काला धन नहीं होता। अमित शाह ने बाद में स्वीकार किया कि 15 लाख रुपये का वादा "जुमला" था, जिसने जनता की उम्मीदों को और ठेस पहुँचायी।
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काले धन पर नरमी?

मोदी का ताजा बयान काले धन के प्रति नरम रुख को दर्शाता है। आर्थिक दबाव इस नरम रुख का कारण हो सकता है। मेक इन इंडिया का लक्ष्य था कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर जीडीपी का 25% योगदान दे, लेकिन यह 15% पर अटक गया। रोजगार की स्थिति ऐतिहासिक रूप से सबसे खराब है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50% टैरिफ लगाए जाने के बाद सरकार ने चीन के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की है। लेकिन चीन की मैन्युफैक्चरिंग ताकत को पछाड़ने के लिए सस्ती बिजली, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और कुशल श्रमिकों की जरूरत है, जो अभी दूर की कौड़ी है। भारत को प्रतिस्पर्धा के लिए बड़े पैमाने पर निवेश और नीतिगत सुधार चाहिए, लेकिन सरकार का ध्यान श्मशान-कब्रिस्तान जैसे मुद्दों पर ज्यादा रहा है। देश इस राजनीति का दंश भोग रहा है।

मोदी का ताजा बयान काले धन को स्वीकार्यता देने का संकेत देता है, जो उनके 2014 के वादों से उलट है। नोटबंदी, विदेशी काले धन की वापसी और मेक इन इंडिया जैसे कदम उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। रामदेव, श्री श्री रविशंकर और केजरीवाल जैसे आंदोलनकारियों के दावे भी खोखले साबित हुए। आज देश आर्थिक चुनौतियों और बेरोजगारी के संकट से जूझ रहा है। क्या यह बयान आर्थिक मजबूरी का परिणाम है, या एक नई रणनीति? यह सवाल अनुत्तरित है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि 2014 की उम्मीदों और 2025 की हकीकत में बड़ा अंतर है। देश इस अंतर का दंश भोग रहा है।