राममंदिर में चोरी की घटना ने मुझे हैरान नहीं किया था। दुष्ट प्रकृति के लोग कहीं भी हो सकते हैं और किसी भी तरह का दुष्कर्म कहीं भी कर सकते हैं। मंदिर से जुड़े लोगों ने चोरी की, ये बड़ी खबर ज़रूर है। ये भी बड़ी खबर है कि चोरी के आरोप उन पर लगे हैं जो राममंदिर आंदोलन से जुड़े रहे हैं या जो भगवान राम और हिंदू धर्म पर अपना कॉपीराइट समझते हैं। लेकिन ज्यादा बड़ी खबर है, इस पूरे वाकये पर संघ परिवार की प्रतिक्रिया । मैंने ये उम्मीद की थी कि संघ परिवार खासतौर पर आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व इस मामले पर विनम्रता का परिचय देगा और पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए प्रायश्चित की बात करेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ । मुझे उनके स्वर में अहंकार दिखाई दिया। एक तरह का दंभ दिखा। 
उन्होंने ये कहने की कोशिश की तुम कौन होते हो मेरे ऊपर या मेरे समर्थकों पर उँगली उठाने वाले । ये हो सकता है आत्मग्लानि का परिणाम हो लेकिन बाहर से देखने पर मुझे उस ग्लानि के दर्शन नहीं हुए । मैंने जो देखा वो सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के बयान से निकला है और बाद में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार की चिट्ठी से निकला है जो उन्होंने यूपी की एसआईटी को लिखी है । दोनों में विनम्रता का अभाव साफ दिखता है।
हिंदू परंपरा में भगवान राम की छवि विनम्रता की है । इसलिये वो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं । जब लंका विजय के बाद राम अयोध्या आते हैं और राजसिंहासन पर बैठते हैं । अयोध्या पर शासन करते हैं तो वो खुद को प्रजा से ऊपर नहीं मानते । वो भरी सभा में कहते हैं कि अगर उनसे भी कोई गलती हो जाये तो बिना भय के उन्हें टोक देना । तुलसी दास लिखते हैं -
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुशासन मानो जोई ।।
जौं अनीति कछु भाषौं भाई । तौ मोहि बरजहु भय बिसराई ।।
ताज़ा ख़बरें
भगवान राम कहते हैं उन्हें वही प्यारा है, वही उनका सच्चा सेवक है जो उनकी आज्ञा को मानता है । या उनके द्वारा बनाये अनुशासन का पालन करता है । लेकिन अगले वाक्य में वो ये भी कहते हैं कि अगर वो यानि भगवान राम भी अगर कुछ गलत करें या अनीति करे तो प्रजा बिना भय या डर या संकोच के उन्हें टोक दे । तुलसी यहाँ एक ऐसे राम के महात्म का वर्णन करते हैं जो रावण को जीत कर आये हैं, अयोध्या के राजा हैं और उनको कहीं से कोई चुनौती नहीं है फिर भी वो अपनी प्रजा से निवेदन करते हैं कि अगर वो कहीं कोई ऐसी बात करते हैं जो नीति संगत नहीं है या गलत है तो फिर ये जनता का कर्तव्य है कि वो उनकी गलती को रेखांकित करे, उन्हें टोके । ये वही राजा कर सकता है जो विनम्र है, जो खुद को प्रजा से ऊपर नहीं समझता, जो जनता के विवेक का सम्मान करता है ।
राम राजा थे । उन्हें ये कहने की ज़रूरत नहीं थी । लेकिन वो ये कहते हैं क्योंकि उनमें अहंकार नहीं था । न राजा होने का दंभ और न ही प्रजा से ऊपर खुद को समझने की कोशिश । वो ये मानते थे कि राजा को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिये । और जनता की बातों को अनसुना नहीं करना चाहिये । ये अकारण नहीं है कि जब एक धोबी ने माता सीता पर लाँक्षन लगाया तो राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली । इस प्रसंग पर आज के समाज में कुछ दूसरी तरह की प्रतिक्रिया भी हो सकती है कि सीता को अग्नि परीक्षा की ज़रूरत नहीं थी, वो पवित्र थीं लेकिन राजा राम के सामने ये प्रश्न था कि अगर उन पर या उनके परिवार पर किसी भी तरह की शंका जनता के मन में पनपती है तो ये राजा का कर्तव्य है कि वो जनता के संदेह का निराकरण करे । जो उन्होंने किया । और इसलिये उनके राज को आदर्श माना जाता है । और उसे रामराज्य की संज्ञा दी जाती है ।
दैहिक दैविक भौतिक तापा ।
रामराज नहि काहुहि ब्यापा ।।
सब नर करहि परस्पर प्रीती ।
चलहि स्वधर्म निरत श्रुति नीती ।।
यानी एक ऐसा राज जहां प्रजा को किसी भी तरह का कष्ट न हो न शारीरिक, न दैवीय और न ही सांसारिक । वो आनंद में रहे । सब दुखों से मुक्त । जहां सब नर नारी आपसी प्रेम और भाईचारे से रहे । जहां सब धर्म का पालन करते हैं । धर्म का पालन सिर्फ जनता को नहीं करना है, धर्म से राजा भी बँधा हुआ है । जब राजा और प्रजा दोनों ही धर्म का पालन करेंगे तभी राम राज्य होगा । राजा धर्म से ऊपर नहीं हो सकता । उसके लिये भी नियम है । गलती करने पर उसे भी दंड मिलना चाहिये । और प्रश्न सिर्फ शारीरिक कष्ट का नहीं है । आत्मिक और आध्यात्मिक कष्ट भी नहीं होना चाहिये । नर नर में भेद नहीं होना चाहिये ।नर नारी में भेद न हो, सब एक समान । चाहे वो किसी भी धर्म का हो या किसी भी समाज का । भेद और भेदभाव, और नफ़रत के लिये राम के राज में कोई स्थान नहीं है ।
लेकिन आज जब हम देखते हैं कि करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र राम मंदिर में वो लोग चोरी कर रहे है जो दूसरों को राम का पाठ पढ़ाते हैं और राम राज्य की कल्पना करते हैं, तो अफ़सोस ये नहीं होता कि चोरी हुई, अफ़सोस इस पर होता है कि पुरुषोत्तम राम की मर्यादा की बात करने वाले खुद की अग्नि परीक्षा की बात नहीं करते । दूसरों को दोष देते हैं और उनको लांक्षित करने का प्रयास करते हैं जिनका इस प्रकरण से कोई लेना देना नहीं है । नफ़रत से ओतप्रोत दिखाई देते हैं, धर्म ध्वजा धारण करने का नाटक करते हुये ।
होसबोले कहते हैं कि कुछ “हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी लोग हिंदू समाज और हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिये षड्यंत्र कर रहे थे”। उनका इशारा उन लोगों पर है जिन्होंने इस प्रकरण को उजागर किया और जो संघ परिवार से अग्नि परीक्षा की मांग कर रहे हैं । क़ायदे से उन्हें एक लाइन में ये कहना चाहिये कि जिन लोगों ने हिंदू धर्म और राममंदिर को कलंकित किया है, उन्हें बख्शा नही जायेगा, चाहे वो संघ परिवार से ही क्यों न जुड़ें हों । लेकिन वो पूरे विमर्श को बदलने की कोशिश कर रहे हैं । विश्व हिंदू परिषद के आलोक कुमार तो एक कदम आगे जाकर विपक्ष के उन नेताओं से पूछताछ की मांग कर रहे हैं जो दोषियों को सजा देने की मांग कर रहे हैं ।

ये अहंकार किस बात का है ? क्या इस बात का है कि संघ परिवार ने राममंदिर निर्माण के लिये आंदोलन चलाया और फिर उसके निर्माण में अहम भूमिका निभाई ? या फिर इस बात का है कि अब केंद्र में उनकी सरकार है और बाइस राज्यों में वो सरकार में शामिल है ?

ये अहंकार नैतिकता का नहीं है । ये अहंकार सत्ता का है जो ये मान बैठा है कि भगवान राम पर सिर्फ उनका अधिकार है । ये विचारधारा का संकट है । ये उस सोच का संकट है जो सत्ता को सत्व से च्युत कर बैठी है । चुनाव के दौरान नारा सुना होगा - जो राम को लाए हैं । कोई मूर्ख ही कह सकता है कि जो इस जगत का रचयिता है, जो सब में है, जो इस जगत का मालिक है, उसे कुछ लोग लाए हैं । ये कैसी विडंबना है । ये कैसी मूर्खता है । ये इस बात का प्रमाण है कि न इनको हिंदू धर्म की समझ है और न ये राम को जानते हैं । 
अगर ये जानते होते तो ये क़तई नहीं कहते कि जो अयोध्या नहीं गया, जिसने रामलला के दर्शन नहीं किये वो हिंदू द्रोही है, राम द्रोही है । क्योंकि हिन्दू परंपरा में तो कहा गया - ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ । ‘जो कण कण में व्याप्त’ हैं उनको किसी एक मंदिर में सीमित करना कहाँ का न्याय है । जो राममंदिर जाना चाहता है, ये उसकी श्रद्धा है लेकिन दूसरों को कैसे बाध्य किया जा सकता है ? और मंदिर न जाने पर दूसरों को कैसे राम द्रोही कहा जा सकता है ? क्योंकि राम तो सर्वत्र हैं । सर्वव्यापी है । सर्व शक्तिमान हैं । अंतर्यामी हैं । ऐसी कौन सी जगह हैं जहां राम नहीं हैं । हो सकता है कि संघ की सोच में राम सिर्फ मंदिर में ही वास करते हों । हिंदू परंपरा में तो ऐसा नहीं है । वो मुझमें हैं, वो तुम में हैं, वो सब में हैं, वो घट घट में हैं, वो कण कण में है ।