भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है, प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में लगातार पिछड़ रहा है। 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से रेपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स यानी आरएसएफ की विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग में तेजी से गिरावट आई है। यह गिरावट न केवल आँकड़ों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारों पर हमलों, मीडिया के कॉर्पोरेट नियंत्रण और सरकारी दबाव के रूप में भी प्रकट होती है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया फ्रीडम संगठन आरएसएफ़ ने हाल ही में ओपइंडिया (एक प्रो-बीजेपी ऑनलाइन मैगजीन) और अडानी ग्रुप (भारत के प्रमुख क्रोनी कैपिटलिस्ट) को “प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स” की सूची में शामिल किया है, जो वैश्विक प्रेस फ्रीडम को निशाना बनाने वाले सबसे खराब खतरे के रूप में चिन्हित हैं।
मोदी शासन में प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की स्थिति
आरएसएफ की वार्षिक विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 180 देशों की पत्रकारों की स्वतंत्रता, सुरक्षा और मीडिया बहुलता का मूल्यांकन करती है। मोदी के सत्ता में आने से पहले भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी, लेकिन उसके बाद यह “बहुत गंभीर” श्रेणी में पहुंच गई। नीचे प्रमुख वर्षों की रैंकिंग दी गई है-यह गिरावट 2014 से 2025 तक लगभग 11 स्थानों की है, जो दुनिया के अन्य लोकतंत्रों से पीछे छोड़ देती है। आरएसएफ के अनुसार, भारत अब “दुनिया के सबसे खतरनाक देशों” में से एक है, जहां पत्रकारों की हत्या, उत्पीड़न और डिजिटल सेंसरशिप आम हो गई है।
गिरावट के प्रमुख कारण
मोदी शासन में प्रेस फ्रीडम की गिरावट बहुआयामी है, जो राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी और सामाजिक कारकों से जुड़ी हुई है। आरएसएफ और अन्य रिपोर्ट्स के आधार पर मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
मीडिया स्वामित्व, क्रोनी कैपिटलिज्म
मीडिया के बड़े हिस्से अब मोदी के करीबी अरबपतियों के हाथों में हैं। मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज (70 से अधिक मीडिया आउटलेट्स, 800 मिलियन दर्शकों तक पहुंच) और गौतम अडानी का ग्रुप (2022 में एनडीटीवी का अधिग्रहण) सरकारी नीतियों के अनुकूल संपादकीय रेखा अपनाते हैं। अडानी ग्रुप को आरएसएफ ने “प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर” घोषित किया है, क्योंकि यह आलोचनात्मक कंटेंट को हटाने के लिए अदालती दबाव बनाता है।सरकारी विज्ञापनों (2014-2022 में 64.9 बिलियन रुपये) का दुरुपयोग मीडिया को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ता है।
पत्रकारों पर हिंसा, उत्पीड़न, ऑनलाइन ट्रोलिंग
आलोचनात्मक पत्रकारों को बीजेपी समर्थक ‘भक्तों’ द्वारा ऑनलाइन हमले, धमकियां और फेक न्यूज कैंपेन का सामना करना पड़ता है। ओपइंडिया जैसी प्रो-बीजेपी साइट्स ने 2025 में पत्रकारों के खिलाफ डिसइनफॉर्मेशन बढ़ाया, जिसके लिए आरएसएफ ने इसे “प्रीडेटर” नामित किया।
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) के अनुसार, 2014 के बाद 36 पत्रकार जेल गए, जबकि यूपीए शासन में केवल 8 थे। कश्मीर जैसे संघर्ष क्षेत्रों में पत्रकारों की सुरक्षा सबसे कमजोर है।कानूनी और सरकारी दबाव
राजद्रोह कानून (सेडिशन एक्ट) और अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट (यूएपीए) का दुरुपयोग आलोचना को दबाने के लिए होता है। 2014 के बाद सेडिशन केस 30% बढ़े।
- 2023 के टेलीकॉम एक्ट, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और ब्रॉडकास्टिंग बिल जैसे कानून सेंसरशिप को बढ़ावा देते हैं।
- बीबीसी डॉक्यूमेंट्री “द मोदी क्वेश्चन” को ब्लॉक करना और बीबीसी दफ्तरों पर छापा इसका उदाहरण है।
- मोदी ने 2014 से कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, केवल अनुकूल पत्रकारों को इंटरव्यू देते हैं।
राजनीतिक ध्रुवीकरण और प्रोपेगैंडा
- “गोदी मीडिया” (बीजेपी समर्थक चैनल) ने विपक्ष पर 52% एयरटाइम खर्च किया, जबकि मोदी की प्रशंसा 27%।
- हिंदू राष्ट्रवादी प्रचार अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाता है।
- विदेशी पत्रकारों को वीजा रद्द (जैसे, वानिसा डौग्नाक, 2024) और एनजीओ पर प्रतिबंध (एमनेस्टी इंटरनेशनल, 2020) से वैश्विक रिपोर्टिंग प्रभावित हुई।
मोदी शासन में भारत की प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की गिरावट लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर रही है। आरएसएफ़ के ‘अघोषित आपातकाल’ के वर्णन के अनुसार, मीडिया अब सरकार का प्रचार तंत्र बन गया है, जहां आलोचना के लिए जगह नहीं बची। ओपइंडिया और अडानी जैसे तत्वों को प्रीडेटर्स नामित करना इस संकट की गहराई दर्शाता है। सुधार के लिए मीडिया बहुलता, कानूनी सुरक्षा और सरकारी पारदर्शिता जरूरी है। अन्यथा, भारत का “विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र” का दावा खोखला साबित होगा।