सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण से जुड़े एक विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। यह विवाद करीब दस साल से चल रहा था। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का दर्जा केवल माता-पिता की आय (वेतन) के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। माता-पिता के पद की श्रेणी, सेवा स्टेटस और संगठन में उनकी स्थिति को भी ध्यान में रखना अनिवार्य है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी और मद्रास, दिल्ली तथा केरल हाई कोर्ट के फैसलों को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला क्रीमी लेयर के नाम पर पिछले वर्गों के बड़े हिस्से को आरक्षण से बाहर रखने की साजिश पर एक चाबुक की तरह है।
60 ओबीसी उम्मीदवारों को राहत
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के 60 ओबीसी उम्मीदवारों को राहत मिली है। इन सभी को परीक्षा पास करने के बावजूद यूपीएससी ने इन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर बात कर नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था। यूपीएससी ने इनके माता-पिता की पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम) या प्राइवेट नौकरी के उच्च वेतन के आधार पर क्रीमी लेयर माना और आरक्षण का लाभ नहीं दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर मान लिया है तो यूपीएससी को मजबूरन में आरक्षण का लाभ देना होगा। यह फ़ैसला सिर्फ एक केस का नहीं, बल्कि संवैधानिक आरक्षण की मूल भावना से जुड़ा है।
सीएटी का फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट से पहले केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल यानी सीएटी और कई हाईकोर्ट इन उम्मीदवारों के पक्ष में फ़ैसला सुना चुके थे लेकिन यूपीएससी और केंद्र सरकार इन्हें आरक्षण का लाभ न देने की अपनी ज़िद पर अड़े हुए थे। आरक्षण का लाभ नहीं मिलने पर प्रभावित उम्मीदवारों ने पहले सीएटी का रुख किया। चेन्नई सीएटी ने 12 जनवरी 2017 को सुनाए अपने फ़ैसले में इन उम्मीदवारों को आरक्षण का लाभ नहीं देने के यूपीएससी के फ़ैसले को भेदभावपूर्ण माना। सीएटी ने साफ़ कहा कि 1993 ओएम के तहत सैलरी आय को इनकम टेस्ट से बाहर रखा गया है। 2004 का पैरा 9 सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों के बीच होस्टाइल डिस्क्रिमिनेशन है। सीएसटी ने डीओपीटी को पैरा 9 वापस लेने और उम्मीदवारों को ओबीसी स्टेटस देने का आदेश दिया। विभिन्न हाई कोर्टों के फ़ैसले
- मद्रास हाई कोर्ट ने 31 अगस्त 2017 को सीएटी के फ़ैसले को बरकरार रखा। कहा कि समकक्षता टेस्ट न बनाने से पीएसयू कर्मचारियों के वार्ड्स को नुक़सान। ग्रुप सी/डी सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ने पर भी क्रीमी लेयर नहीं माना जाता, लेकिन पीएसयू में वेतन के आधार पर बाहर कर दिया जाता है- यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन।
- दिल्ली हाई कोर्ट ने 22 मार्च 2018 को 2004 लेटर को रद्द कर दिया। 1993 ओएम में इनकम/वेल्थ टेस्ट में सैलरी शामिल नहीं। केवल "अन्य स्रोतों" की आय देखी जाए। 2004 लेटर सब्स्टैंटिव चेंज है, क्लैरिफिकेशन नहीं। उम्मीदवारों को 1993 ओएम के अनुसार वेरिफाई करने का आदेश।
- केरल हाई कोर्ट ने 25 फरवरी 2022 को एर्नाकुलम सीएटी के 13 अक्टूबर 2020 को दिए फैसले को बरकरार रखा। इन उम्मीदवारों के माता-पिता ग्रुप सी में थे। समकक्षता न तय होने का दोष सरकार का, उम्मीदवारों पर नहीं। पीएसयू बनाम सरकारी कर्मचारियों के बीच भेदभाव वैलिड ओबीसी-एनसीएल सर्टिफिकेट को मान्यता।
तीनों हाई कोर्टों ने एक स्वर में कहा कि 1993 ओएम स्टेटस-बेस्ड है। 2004 का लेटर इसे ओवरराइड नहीं कर सकता। आय अकेली निर्णायक नहीं है।
क्रीमी लेयर की अवधारणा
दरअसल, देश में 1993 के इंदिरा साहनी मामले के बाद से क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू है, लेकिन इसका क्रियान्वयन पिछले तीन दशकों से विवादास्पद रहा। अब सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (ओएम) को सर्वोच्च माना और 2004 के क्लैरिफिकेटरी लेटर को ओवरराइड करने वाला बताया है। 1992 में सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी (मंडल कमीशन) फैसले ने 27% ओबीसी आरक्षण को वैध ठहराया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग (क्रीमी लेयर) को इससे बाहर रखा जाए। उद्देश्य था कि आरक्षण का लाभ वास्तविक पिछड़ों तक पहुंचे, न कि उन तक जो पहले से ही सरकारी नौकरी, उच्च पद या आय के कारण उन्नत हो चुके हैं। केंद्र सरकार ने 8 सितंबर 1993 को ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया, जिसमें क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने के मानदंडों की विस्तृत सूची दी गई। यह स्टेटस-बेस्ड यानी पद और स्थिति आधारित था, न कि शुद्ध आय-आधारित:
- कैटेगरी I-III: केंद्र/राज्य सरकार के ग्रुप ए (क्लास I) अधिकारी, कुछ ग्रुप बी अधिकारी (40 वर्ष से पहले प्रमोटेड), पीएसयू, बैंक, विश्वविद्यालय आदि में समकक्ष पद वाले व्यक्ति के बच्चे क्रीमी लेयर माने जाते हैं। यहां पद की श्रेणी (ग्रुप ए/बी) मुख्य है; वेतन को अलग रखा गया।
- कैटेगरी II(C): पीएसयू/प्राइवेट संगठनों में जहां सरकारी पदों से समकक्षता (Equivalence) तय नहीं हुई, वहां लंबे समय तक कैटेगरी VI (इनकम/वेल्थ टेस्ट) लागू होता था।
- कैटेगरी VI: परिवार की कुल वार्षिक आय 3 लगातार वर्षों तक सीमा (शुरू में 2.5 लाख, बाद में 6 लाख, अब 8 लाख) से ज्यादा हो तो क्रीमी लेयर। लेकिन स्पष्ट रूप से वेतन और कृषि आय को अन्य आय स्रोतों के साथ क्लब नहीं किया जाता। व्याख्या (i) में साफ लिखा है कि सैलरी और एग्रीकल्चरल इनकम को अलग रखा जाए।
इसका मतलब: क्रीमी लेयर मुख्य रूप से सामाजिक-प्रशासनिक उन्नति (पद का स्टेटस) पर आधारित है। आय केवल सहायक भूमिका निभाती है, और वेतन को जानबूझकर बाहर रखा गया ताकि सरकारी कर्मचारियों के ग्रुप सी/डी बच्चों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
2004 का क्लैरिफिकेटरी लेटर से विवाद की शुरुआत
तत्कालीन यूपीए सरकार के दौरान 14 अक्टूबर 2004 को डीओपीटी ने एक लेटर जारी किया। इसके पैरा 9 में कहा गया कि जहां समकक्षता तय नहीं हुई (कैटेगरी II(C)), वहां माता-पिता की सैलरी आय और अन्य आय को अलग-अलग देखा जाए। अगर सैलरी अकेले ही सीमा से ज्यादा हो तो क्रीमी लेयर माना जाएगा। यह 1993 ओएम की स्पिरिट के खिलाफ था, क्योंकि 1993 में सैलरी को क्लबिंग से बाहर रखा गया था। समस्या यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में उभरी। कई ओबीसी उम्मीदवारों जैसे रोहित नाथन-सीएसई 2012, जी. बाबू-2013, केतन और अन्य-2015, डॉ. इबसन शाह-2016/17 ने नॉन-क्रीमी लेयर सर्टिफिकेट जमा किया। उनके माता-पिता पीएसयू (नेवेली लिग्नाइट, केएसएफई आदि) या प्राइवेट (एचसीएल) में एक्जीक्यूटिव/इंजीनियर पद पर थे। समकक्षता न तय होने पर डीओपीटी ने 2004 लेटर के आधार पर केवल वेतन आय देखी और उन्हें क्रीमी लेयर मानकर ओबीसी आरक्षण से वंचित कर दिया। वे जनरल मेरिट पर सर्विस अलॉटमेंट पा गए, लेकिन ओबीसी रैंक से बेहतर सर्विस (आईएएस/आईपीएस) से वंचित रहे।
केंद्र सरकार का रुख
पहले रुख: केंद्र सरकार (डीओपीटी) ने 1993 ओएम को अपनाते हुए 2004 लेटर को "क्लैरिफिकेशन" बताया। यूपीएससी परीक्षा में कैटेगरी वेरिफिकेशन डीओपीटी करती है। डीओपीटी ने तर्क दिया कि समकक्षता न होने पर इनकम टेस्ट लागू होता है और सैलरी को शामिल करना जरूरी है, वरना "अग्रणी" ओबीसी फायदा उठा लेंगे। अशोक कुमार ठाकुर (2008) फैसले का हवाला दिया। सरकार ने हाई कोर्ट फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। संसदीय समिति में भी यह मुद्दा उठा था, लेकिन सरकार ने 2004 लेटर का बचाव किया। यूपीएससी ने भी डीओपीटी के आधार पर अलॉटमेंट रोका। यानी क्रीमी लेयर के नाम पर पिछले वर्गों के बड़े हिस्से को आरक्षण से वंचित करने के लिए 'क्लैरिफिकेशन' के नाम पर जो लेटर यूपीए सरकार में जारी हुआ था उसे पर मोदी सरकार ने भी अमल जारी रखा। संसदीय समिति से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उस पर अड़ी रही। प्रशासनिक सेवाओं में पिछड़ों को ऊंचे पद न देने की साज़िश यूपीए सरकार से लेकर मोदी सरकार तक चलती रही।
सुप्रीम कोर्ट ने चलाया साज़िश पर चाबुक
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज करके पिछड़ों की हक़मारी की साज़िश पर चाबुक चला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया कि 2004 लेटर "क्लैरिफिकेशन" नहीं, बल्कि सब्स्टैंटिव चेंज है। यह 1993 ओएम की संरचना को कमज़ोर करता है। कोर्ट ने कई बिंदुओं में स्पष्ट किया:
- "किसी उम्मीदवार को क्रीमी या नॉन-क्रीमी लेयर में रखना केवल आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।"
- "1993 ओएम और 2004 लेटर को एक साथ पढ़ने से साफ हो जाता है कि सैलरी आय अकेली मानदंड नहीं। माता-पिता का स्टेटस और पद की श्रेणी जरूरी।"
- "आय ब्रैकेट्स पर अकेले जोर देकर 1993 ओएम के ढांचे को नष्ट करना कानूनन असंगत है।"
- "पीएसयू/प्राइवेट बनाम सरकारी कर्मचारियों के समान स्टेटस वाले बच्चों के बीच भेदभाव अनुच्छेद 14-16 का उल्लंघन है।"
- "क्रीमी लेयर बहिष्कार का उद्देश्य वास्तविक पिछड़ों को लाभ पहुंचाना है, समान स्थिति वाले सदस्यों के बीच कृत्रिम भेदभाव पैदा करना नहीं।"
सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती
इस पूरे मामले में सख्त रूप अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डीओपीटी को 6 महीने में उम्मीदवारों की दोबारा वेरिफिकेशन करने, 1993 ओएम (सैलरी को बाहर रखकर) लागू करने और सर्विस अलॉटमेंट करने का निर्देश दिया। जरूरत पड़ी तो सुपरन्यूमररी पोस्ट बनाने का संकेत भी दिया।
फैसले के बड़े प्रभाव
यह फैसला हजारों यूपीएससी उम्मीदवारों को राहत देगा। कई वर्षों से लंबित केस सुलझेंगे। ओबीसी आरक्षण की शुद्धता बनी रहेगी, क्योंकि स्टेटस-बेस्ड टेस्ट से वास्तविक उन्नत वर्ग ही आरक्षण के दायरे से बाहर रहेगा, केवल माता-पिता के वेतन के आधार पर उम्मीदवारों को नॉन क्रीमी लेयर का अपात्र होने का ख़ामियाजा नहीं भुगतना पड़ेगा
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला याद दिलाता है कि आरक्षण सामाजिक न्याय का औजार है, न कि आय का खेल। 1993 ओएम की मूल भावना को पुनर्स्थापित किया है। साथ ही मद्रास, दिल्ली और केरल हाई कोर्टों के दूरदर्शी फैसलों को बरकरार रखकर सुप्रीम कोर्ट ने संघीय ढांचे का सम्मान किया। केंद्र सरकार और यूपीएससी को अब इस फैसले का पालन करना होगा। इससे न केवल प्रभावित उम्मीदवारों को न्याय मिलेगा, बल्कि पूरे देश में ओबीसी आरक्षण प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और संवैधानिक बनेगी।