भारत-यूएस ट्रेड डील के बीच मोदी सरकार ने यूपीआई लेनदन पर शुल्क लगाने का बिल पेश कर दिया। वीजा, मास्टरकार्ड वाले कारोबार प्रभावित होने के आरोप लगा रहे हैं। एक थिंकटैंक GTRI ने लिखा है कि अमेरिकी दबाव में भारत को यूपीआई नीति में बदलाव नहीं लाना चाहिए।
यूपीआई पर शुल्क लगाने के प्रस्ताव पर सवाल उठे। (तस्वीर: एआई जेनरेटेड)
अब तक इंसेंटिव देकर भी यूपीआई ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने में जुटी रही सरकार अचानक से यूपीआई ट्रांजेक्शन पर शुल्क लगाने का प्रस्ताव क्यों ले आई? वह भी तब जब भारत-अमेरिका ट्रेड डील अपने अंतिम दौर में है। तब जब वीजा, मास्टरकार्ड जैसी कार्ड पेमेंट वाली अमेरिकी कंपनियाँ लगातार आरोप लगा रही हैं कि फ्री यूपीआई पेमेंट से उनका कारोबार ठीक से नहीं चल रहा है। इकोनॉमी पर एक थिंकटैंक GTRI ने तो कहा है कि अमेरिकी दबाव में भारत को यूपीआई नीति में बदलाव नहीं लाना चाहिए।
दरअसल, भारत में डिजिटल भुगतान व्यवस्था का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI पर तब नया विवाद खड़ा हो गया जब मोदी सरकार ने संसद में इस पर विधेयक पेश किया है। विधेयक पास होने के बाद भविष्य में यूपीआई और RuPay डेबिट कार्ड के जरिए होने वाले कारोबारी यानी मर्चेंट भुगतान पर शुल्क लगाने का रास्ता खुल सकता है। शुल्क यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का यह प्रस्ताव तब आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। इसी वजह से सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह बदलाव केवल डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए है या इसके पीछे अमेरिका और उसकी बड़ी पेमेंट कंपनियों वीजा और मास्टरकार्ड का भी दबाव है।
UPI में क्या बदलाव लाना चाहती है सरकार?
अभी तक सामान्य बैंक-टू-बैंक यूपीआई भुगतान पर कोई भी शुल्क यानी एमडीआर नहीं देना होता है। यानी जब कोई ग्राहक यूपीआई से भुगतान करता है तो दुकानदार से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। सरकार के नए प्रस्ताव के तहत भविष्य में बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को यूपीआई और RuPay डेबिट कार्ड के कुछ लेनदेन पर शुल्क लेने की अनुमति मिल सकती है।हालाँकि सरकार ने अभी यह साफ़ किया है कि आम ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और यदि एमडीआर लागू होता है तो उसका भुगतान मर्चेंट यानी व्यापारी करेंगे। यह भी संभव है कि केवल बड़े या अधिक मूल्य वाले लेनदेन पर ही शुल्क लगाया जाए।
यूपीआई को सरकार ने दिया था बढ़ावा
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क है जो किसी डिजिटल भुगतान को स्वीकार करने पर दुकानदार को देना पड़ता है। क्रेडिट और डेबिट कार्ड भुगतान में यह शुल्क पहले से लागू है। यह राशि बैंक, कार्ड वाले नेटवर्क और पेमेंट कंपनियों के बीच बांटी जाती है। लेकिन जनवरी 2020 से यूपीआई भुगतान पर सरकार ने एमडीआर पूरी तरह ख़त्म कर दिया था। यही वजह रही कि यूपीआई बेहद तेजी से लोकप्रिय हुआ।
यूपीआई आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म में शामिल है। एनपीसीआई के आँकड़ों के अनुसार, मई 2026 में ही यूपीआई के ज़रिए 23.2 अरब लेनदेन हुए। कुल लेनदेन का मूल्य लगभग 29.9 लाख करोड़ रुपये रहा। देश के 720 बैंक इस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।
वीजा और मास्टरकार्ड को क्यों है आपत्ति?
अमेरिका की प्रमुख कार्ड भुगतान कंपनियाँ वीजा और मास्टरकार्ड लंबे समय से भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर चिंता जताती रही हैं। उनका तर्क है कि कार्ड भुगतान पर व्यापारी शुल्क देते हैं, लेकिन यूपीआई पर कोई शुल्क नहीं है। इससे यूपीआई को अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता है। इन कंपनियों का मानना है कि यदि यूपीआई पर भी एमडीआर लागू होगा तो सभी भुगतान प्रणालियों के लिए समान प्रतिस्पर्धा बनेगी।
क्या ट्रंप प्रशासन भी यही चाहता था?
अमेरिका लंबे समय से भारत समेत कई देशों से डिजिटल बाजार में विदेशी कंपनियों के लिए समान अवसर देने की मांग करता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन भी व्यापार वार्ताओं के दौरान डिजिटल भुगतान, बाजार पहुंच और विदेशी कंपनियों के लिए बराबरी की प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे उठाता रहा है। इसी कारण कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि भारत के इस प्रस्ताव और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के समय को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालाँकि अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है कि यह फ़ैसला सीधे अमेरिकी दबाव में लिया गया है।
सरकार का क्या कहना है?
सरकार का कहना है कि यह फ़ैसला किसी विदेशी दबाव में नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए लिया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा पहले ही कह चुके हैं कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को चलाने में भी खर्च आता है और 'आखिरकार किसी न किसी को उसका खर्च उठाना ही पड़ेगा।' यूपीआई भले ही ग्राहकों के लिए मुफ्त हो, लेकिन बैंक, एनपीसीआई, भुगतान सेवा प्रदाता और तकनीकी कंपनियां सभी को इसके संचालन, सुरक्षा और फ्रॉड रोकने पर भारी खर्च करना पड़ता है।
GTRI ने क्यों जताई चिंता?
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी जीटीआरआई का कहना है कि यूपीआई केवल एक भुगतान सेवा नहीं बल्कि भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अहम हिस्सा है। इस थिंक टैंक का तर्क है कि यदि भारत अमेरिकी दबाव में अपनी सफल डिजिटल भुगतान नीति बदलता है तो इससे उसकी डिजिटल नीति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। जीटीआरआई का कहना है कि भारत को किसी भी नीति में बदलाव केवल अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर करना चाहिए, न कि विदेशी कंपनियों या किसी दूसरे देश के दबाव में।
क्या ग्राहकों को UPI इस्तेमाल करने पर पैसे देने होंगे? फिलहाल इसका जवाब नहीं है। सरकार ने अभी केवल ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव रखा है जिससे भविष्य में एमडीआर लगाया जा सके। अभी यह तय नहीं हुआ है कि शुल्क कब लागू होगा, किस तरह के लेनदेन पर लागू होगा और इसकी दर कितनी होगी।
यूपीआई शुल्क पर बहस अब केवल कुछ रुपये के भुगतान की नहीं रह गई है। यह तीन बड़े सवालों से जुड़ गई है। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था का खर्च कौन उठाए? क्या यूपीआई को हमेशा मुफ्त रखना संभव है? क्या भारत अपनी सफल घरेलू डिजिटल प्रणाली में बदलाव विदेशी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार दबाव के कारण करे? इन्हीं सवालों के बीच संसद में पेश किए गए इस प्रस्ताव पर आने वाले दिनों में सरकार, विपक्ष, डिजिटल भुगतान कंपनियों और व्यापार विशेषज्ञों के बीच व्यापक चर्चा होने की संभावना है।