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असम: एनडीए में फिर से शामिल एजीपी, कहीं खुशी तो कहीं ग़म!

नागरिकता बिल को लेकर मित्र दल की सरकार से बाहर निकली राज्य की पुरानी क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) दो महीने बाद फिर से बुधवार को एनडीए में शामिल हो गई। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव की उपस्थिति में लगातार दो बैठकों के बाद एजीपी अध्यक्ष अतुल बोरा ने बीजेपी के साथ दोस्ती का फै़सला लिया। उनके इस फै़सले से जहाँ एजीपी का एक खेमा काफ़ी उत्साहित है तो पूर्व मुख्यमंत्री तथा मौजूदा पार्टी विधायक प्रफुल्ल कुमार महंत सख्त नाराज़ दिख रहे हैं।

कोई फ़ैसला पार्टी संविधान से नहीं?

पूर्व मुख्यमंत्री तथा एजीपी के पूर्व अध्यक्ष रह चुके मौजूदा पार्टी विधायक महंत का आरोप है कि उनको पार्टी से बाहर निकालने की गहरी राजनीतिक साज़िश चल रही है ताकि चार-पाँच नेता अपनी मनमर्ज़ी चला सकें। उन्होंने कहा कि फ़िलहाल चार-पाँच नेता ही पार्टी चला रहे हैं और कोई भी फ़ैसला पार्टी संविधान के अनुसार नहीं लिया जा रहा है।

नागरिकता बिल के मुद्दे पर सहयोगी दल से नाता तोड़ने के बाद फिर से दोस्ती करना अलोकतांत्रिक है। नागरिकता बिल को लेकर पार्टी मंच पर चर्चा के बाद ही गठबंधन तोड़ने का फ़ैसला लिया गया था।


प्रफुल्ल कुमार महंत, (पूर्व मुख्यमंत्री)

इसके बाद फिर से साथ आने के लिए इतनी जल्दबाज़ी की गई है कि इस मसले पर पार्टी स्तर पर कोई चर्चा ही नहीं की गई। यह क़तई समर्थन योग्य नहीं हो सकता है। उन्होंने एजीपी के मौजूदा नेतृत्व पर कथित तानाशाही का आरोप लगाते हुए इसके विरोध में आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी के किसी भी उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार नहीं करने की घोषणा की है। उधर, एजीपी के पूर्व विधायक भवेन भराली ने आज गुवाहाटी में मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा की पार्टी नेशनलिस्ट पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) का दामन थाम लिया है।

सीटों के बँटवारे पर चर्चा

बता दें कि नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलाइंस (नेडा) के संयोजक डॉ. हिमंत विश्व शर्मा ने पहले कहा था कि केंद्र में फिर एनडीए की सरकार बनती है तो बीजेपी नागरिकता बिल को पारित करने की फिर से पहल करेगी। ऐसे में इस बिल के विरोध में बीजेपी से दो महीने पहले दोस्ती तोड़ने के बाद लोकसभा चुनाव के नज़दीक आते ही एजीपी द्वारा फिर से बीजेपी से दोस्ती करने को लेकर क्षेत्रीयतावाद के समर्थकों में व्यापक नाराज़गी फैली हुई है।
उधर, एजीपी से फिर से दोस्ती पक्की होने के अगले ही दिन प्रदेश बीजेपी ने 14 में से 10 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की प्रस्तावित सूची बना ली है। गुरुवार को बीजेपी के असम प्रभारी महेंद्र सिंह, असम प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष रंजीत कुमार दास और नेडा के संयोजक तथा राज्य के वित्त मंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा गुरुवार को एजीपी मुख्यालय पहुँचे और सीटों के बँटवारे के मुद्दे पर चर्चा की।
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शाह करेंगे नामों की घोषणा

शुक्रवार को एजीपी अध्यक्ष तथा दो महीने बाद फिर से कृषि मंत्री पद संभालने वाले अतुल बोरा सहित पार्टी के अन्य दो मंत्री व नेतागण प्रदेश बीजेपी मुख्यालय जाएँगे और पार्टी उम्मीदवारों की सूची सौंपेंगे। चर्चा है कि एजीपी 3 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम देगी। सनद रहे कि कोकराझाड़ लोकसभा सीट से गठबंधन में सहयोगी बीपीएफ़ की उम्मीदवार मौजूदा मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्म के नाम की घोषणा हो चुकी है। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रंजीत कुमार दास बीजेपी-एजीपी-बीपीएफ़ के संभावित उम्मीदवारों की सूची लेकर नई दिल्ली के लिए रवाना होंगे। बताया गया है कि 16 मार्च को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह नई दिल्ली में असम के 14 सीटों से एनडीए में शामिल मित्रदलों के उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करेंगे।
गुरुवार  को यहाँ संवाददाताओं के साथ हुई भेंट में प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दास ने बताया कि पार्टी ने संभावित उम्मीदवारों का पैनल तैयार कर लिया है। इस पैनल में सभी नए-पुराने व 4 महिला उम्मीदवारों के नाम शामिल किए गए हैं। सभी को प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने बताया- ‘फ़िलहाल 10-11 सीटों से उम्मीदवारों का पैनल बनाया गया है। शुक्रवार शाम इस प्रस्तावित पैनल को लेकर नई दिल्ली जाऊँगा। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ होनेवाली बैठक में ही उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी की जाएगी।
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बताया जाता है कि मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल, प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रंजीत कुमार दास व नेडा के संयोजक डॉ. हिमंत विश्व शर्मा की उपस्थिति में गुरुवार को आयोजित बैठक में 10 लोकसभा सीटों के लिए बीजेपी ने अपने संभावित उम्मीदवारों की सूची बनाई है।

मौजूदा सांसद रामप्रसाद का नाम नहीं!

सूची को प्रदेश बीजेपी की ओर से हरी झंडी मिल गई है। प्रस्तावित सूची का सबसे महत्वपूर्ण नाम तेजपुर क्षेत्र से शामिल किया गया है। यह नाम नेडा के संयोजक तथा राज्य सरकार के वित्त, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और लोकनिर्माण विभाग के मंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा का है। इस क्षेत्र के मौजूदा पार्टी सांसद रामप्रसाद शर्मा का नाम इस बार प्रदेश बीजेपी ने प्रस्तावित नहीं किया है
गुरुवार को प्रदेश बीजेपी के एक सूत्र ने सूची में शामिल उम्मीदवारों की जानकारी दी। इस सूची की ख़ासियत यह है कि इसमें 10 लोकसभा क्षेत्रों से कम से कम 25 नाम प्रस्तावित किए गए हैं।
हर क्षेत्र से न्यूनतम दो-तीन या चार नाम शामिल किए गए हैं। वहीं तेजपुर क्षेत्र से सिर्फ़ हिमंत विश्व शर्मा का ही नाम है। यानी केंद्रीय कमेटी भी इस क्षेत्र से इस बार मौजूदा पार्टी सांसद रामप्रसाद शर्मा को टिकट देना नहीं चाहती है। इससे बात साफ़ है कि इस बार तेजपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार तथा पूर्व आईएएस अधिकारी एमजीवीके भानू से लड़ने के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी ऐसी दमदार छवि  की तलाश थी जो हिमंत विश्व शर्मा में दिखी है।

भानु और हिमंत होंगे आमने-सामने!

मालूम हो कि तरुण गोगोई की सरकार में रहने के दौरान वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एमजीवीके भानु और तब के बाग़ी विधायक हिमंत विश्व शर्मा के बीच अक्सर छत्तीस का आँकड़ा रहा करता था। अब रिटायर होने के बाद भानु का कांग्रेस के टिकट पर तेजपुर सीट से लड़ना लगभग तय माना जा रहा है तो ऐसे में बीजेपी भी पूरे जोश और दमखम के साथ इस सीट पर कब्ज़ा जमाने के मूड में दिख रही है। इसलिए पार्टी के मौजूदा सांसद रामप्रसाद शर्मा के बजाय इस बार हिमंत पर भरोसा दिखाया जा रहा है।
वहीं, काफ़ी कम समय में अपनी राजनीतिक विलक्षणता की वजह से बीजेपी के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के चहेते बन चुके राज्य के कद्दावर नेता हिमंत विश्व शर्मा को इस सीट से उम्मीदवारी देने की स्वयं मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रंजीत कुमार समेत बीजेपी के पहली पंक्तियों के नेताओं ने भी हामी भर दी है। उम्मीद की जा सकती है कि इस क्षेत्र में भानु और हिमंत के बीच होनेवाली लड़ाई काफ़ी दिलचस्प होगी।

एजीपी की हो रही आलोचना

वहीं 13 मार्च को हुए इस पुनर्मिनल से बीजेपी को क्या लाभ मिलेगा? इस मुद्दे पर फ़िलहाल तो कुछ कहा नहीं जा सकता है पर यह तय है कि विपक्षी कांग्रेस और एआईयूडीएफ़ में घमासान मचेगा। पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने एजीपी नेतृत्व को अवसरवादी कहा है बल्कि इस पार्टी को ही आदर्शहीन क़रार दिया है।
क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी होने के नाते असम गण परिषद के इस 'यू-टर्न' की कड़ी आलोचना भी हो रही है। सोशल मीडिया पर लोग खुलकर एजीपी व इसके मौजूदा नेतृत्व को मौकापरस्त और सत्तालोभी बता रहे हैं।
जिसमें ख़ासकर सोनोवाल सरकार में फिर से मंत्री बने एजीपी विधायक अतुल बोरा, केशव महंत और फणिभूषण चौधरी प्रमुख हैं। ऐसे में एजीपी-बीजेपी की फिर से हुई दोस्ती से दोनों पार्टियों में से किसको कितना लाभ मिलेगा, यह चुनाव परिणामों से ही साफ़ होगा। क्योंकि, एजीपी को इस दोस्ती के कारण कम से कम ऐसी तीन सीटें दिए जाने के कयास लग रहे हैं, जिनमें से एक पर धुबड़ी से एआईयूडीएफ़ प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल मौजूदा सांसद हैं। इसके अलावा बरपेटा से उनके भाई सिराजुद्दीन अजमल मौजूदा सांसद हैं।

बांग्लादेशी घुसपैठ के डर का मुद्दा

ये दोनों सीटें मुसलिम बहुल हैं जहाँ बीजेपी से फिर दोस्ती के बाद अगर एजीपी समर्थित उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरता है तो यह निर्भर करेगा कि एजीपी उम्मीदवार का वहाँ जनाधार कैसा है? साथ ही मुसलिम समुदाय के मतदाता एजीपी-बीजेपी के पुनर्मिलन को किस राजनीतिक नज़रिए से देख रहे हैं? ग़ौरतलब है कि सत्ता केंद्रित राजनीति में 'अंदर की राजनीति' में राजनीतिक रूप से सचेत असम के अधिकांश मतदाता कब किसके समर्थन में चले जाएँ? इसका कोई अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है।
हालाँकि कांग्रेस व एआईयूडीएफ़ खुलकर एकजुटता में अब तक नहीं आ रही हैं। एआईयूडीएफ़ के मुखिया मौलाना अजमल चाह रहे हैं कि कांग्रेस-एआईयूडीएफ़ के बीच असम में गठबंधन हो जाए तो उनकी पार्टी को इसका फ़ायदा मिल जाए। कांग्रेस में इस मुद्दे को लेकर शीत-युद्ध पुरानी बात हो चुकी है, जो जग-जाहिर है। ऐसी स्थिति में एजीपी-बीजेपी-बीपीएफ़, गठबंधन की ताक़त पर निर्भर हैं। वहीं, असम की 14 सीटों में से एजीपी के लिए संभावित 3 सीटों का भविष्य है।

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संजीव कलिता
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