असम में विधानसभा की 126 सीटों के लिए नौ अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदल रही है. पहले माना जा रहा था कि इस चुनाव में बीजेपी को विपक्ष की कड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन विपक्षी गठबंधन तैयार होने के बाद अब बीजेपी की राह आसान नहीं लग रही है.
लंबे समय तक जारी कयासों के बाद कांग्रेस ने अखिल गोगोई की राइजोर दल के साथ हाथ मिलाया है. विपक्षी गठबंधन में अब इन दोनों पार्टियों के अलावा असम जातीय परिषद और आल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस जैसे राजनीतिक दल शामिल हैं. बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ गठबंधन से बाहर अपने बूते चुनाव लड़ रही है.
विपक्षी गठबंधन में सीटों के बंटवारे के फार्मूले के तहत कांग्रेस 101, राइजोर दल और सीपीएम 11, जातीय परिषद 10 और हिल लीडर्स कांफ्रेंस दो सीटों पर चुनाव लड़ रहा है. इसके अलावा सीपीआई (एमएल) ने एक सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा है. कांग्रेस और रिजोर दल दो सीटों-गौरीपुर और ग्वालपाड़ा ईस्ट में दोस्ताना मुकाबले में हैं.
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लेकिन बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए अब भी जीत के दावे कर रहा है. एनडीए में बीजेपी 89 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसके अलावा असम गण परिषद (अगप) 25 और बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. एनडीए की सहयोगी रही यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल इस बार मतभेदों के कारण निर्दलीय के तौर पर मैदान में है.
अब बोडोलैंड टेरिटोरियल कौंसिल इलाके में इस पार्टी और बीपीएफ के बीच मुकाबले की संभावना है. इलाके में विधानसभा की 15 सीटें हैं.
पिछली बार कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने वाली एआईयूडीएफ ने इस बार अपने बूते 21 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. पार्टी अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल राज्य की राजनीति में लौटते हुए बिन्नाकांदी सीट से मैदान में हैं. बीते लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला था. तीन बार सासंद रहे अजमल भी खुद धुबड़ी सीट से हार गए थे.
गौहाटी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अखिल रंजन दत्ता कहते हैं कि पहले यह धारणा बनी थी कि यह चुनाव एकतरफा होगा और बीजेपी सरकार आसानी से सत्ता में लौटेगी. लेकिन हाल के दिनो में यह धारणा तेजी से बदली है. अब यह मुकाबला एकतरफा नहीं रहा. इस बार मुकाबला नजदीकी है. एनडीए को बहुमत मिला भी तो उसकी राह आसान नहीं होगी.
विश्लेषकों का कहना है कि इस बार एनडीए और कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला है. एआईयूडीएफ का इस चुनाव पर खास असर नहीं होगा. अजमल को बीजेपी के पक्ष में वोटकटवा माना जा रहा है. इसलिए लोग एआईयूडीएफ का समर्थन नहीं करेंगे.
कांग्रेस और राइजोर दल के बीच तालमेल से विपक्षी गठबंधन अचानक मजबूत नजर आने लगा है.
बीजेपी के लिए इस बार ऊपरी असम की सीटें सबसे कड़ी चुनौती के तौर पर उभरी हैं. यहा विपक्षी उस पर भारी नजर आ रहा है. इलाके में 50 सीटें हैं. यहां जीत ही सत्ता का रास्ता खोलती है. विश्लेषकों का कहना है कि कई सीटों पर अहोम समुदाय के वोटर निर्णायक हैं और यह तबका इस बार कांग्रेस के पक्ष में झुका नजर आ रहा है.
दरअसल, पिछले चुनाव में विपक्ष में एकता की कमी ने एनडीए को बढ़त दे दी थी. लेकिन इस बार गठबंधन के कारण विपक्ष मजबूत नजर आ रहा है.
प्रमुख विपक्ष नेताओं के एक बैनर तले मैदान में उतरने से ऊपरी असम में चुनाव पर असर पड़ने की संभावना है. इससे निचले असम के कुछ सीटों पर भी विपक्ष को मजबूती मिली है.
दूसरी ओर, बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए में टिकटों के बंटवारे के पहले से ही उसके और अगप के कई नेताओं ने दल बदल लिया था.
बीजेपी में टिकटों के मुद्दे पर पहली बार बड़े पैमाने पर असंतोष सामने आया. टिकट नहीं पाने वाले कुछ विधायक निर्दलीय के तौर पर मैदान में हैं तो कुछ ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है. कई दूसरे नेताओं में भी भारी नाराजगी है.
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस बार मैदान में उतरने वाले बीजेपी उम्मीदवारों में से 37 पूर्व कांग्रेसी हैं. इनमें मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भी हैं. इसलिए मजाक में बीजेपी को अब कांगजेपी भी कहा जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीते एक सप्ताह के दौरान नैरेटिव तेजी से बदला है. गौरव गोगोई पर पाकिस्तान से संबंध रखने के आरोप अचानक परिदृश्य से गायब हो गए हैं. दो सप्ताह पहले तक बीजेपी नेता गौरव गोगोई को पाक्सितानी बताते हुए चुनाव प्रचार कर रहे थे. लेकिन अब यह मुद्दा अचानक हाशिए पर पहुंच गया है.
विश्लेषकों का कहना है कि मुख्यमंत्री समेत तमाम नेताओं के ऐसे आरोपों के बावजूद गौरव गोगी ने इस मुद्दे पर अपना आपा नहीं खोया. शायद बीजेपी के नेता गोगोई को उकसाना चाहते थे. लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिलते देख भगवा खेमे में कुछ हताशा है.
पिछली विधानसभा में बीजेपी के 64 विधायक हैं और विपक्षी कांग्रेस के 26. विश्लेषकों की राय में विपक्ष की मजबूती के बावजूद बीजेपी की सांगठनिक ताकत की अनदेखी नहीं की जा सकती. इस बार मुकाबला भले नजदीकी है, चुनावी नतीजों के बारे में कोई पूर्वानुमान लगाना जल्दबाजी होगी.