असम विधानसभा चुनाव में क्या मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अपनी कुर्सी बचा पाएँगे? या फिर अपने दम पर बहुमत ला दिखाएँगे? जो भी उनकी साख दांव पर है। क्या बीजेपी अपनी पकड़ बरकरार रख पाएगी या विपक्ष चुनौती देगा?
असम में नौ अप्रैल को होने वाले मतदान में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की साख दांव पर है। उनके सामने अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान किए गए काम के आधार पर बीजेपी को अकेले अपने बूते बहुमत के साथ सत्ता में लौटाने की चुनौती है। वैसे तो पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में भाजपा के चुनाव अभियान की कमान संभालने और पार्टी के बेहतर प्रदर्शन में अहम भूमिका के कारण हिमंता को पूर्वोत्तर की राजनीति का चाणक्य कहा जाता रहा है। लेकिन इस चाणक्य के सामने अब अपने राज्य में अपनी सरकार के कामकाज के आधार पर वोट हासिल करने की कड़ी चुनौती है।
दूसरी ओर, कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। वह बीते दस साल से सत्ता से बाहर है। इस दौरान पार्टी के कई नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इसके अलावा वह अंदरूनी गुटबाजी की भी शिकार रही है। मुख्यमंत्री हिमंता सरमा कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरे गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर पाकिस्तानी कनेक्शन का आरोप लगाते हुए उनको कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। अब चुनावी नतीजों से साफ़ हो जाएगा कि इन आरोपों में कितना दम है।
हिमंता की पत्नी पर तीन पासपोर्ट रखने का आरोप
चुनाव से ठीक पहले अपनी पत्नी रिनिकी भुइयां पर तीन देशो का पासपोर्ट रखने और अमेरिकी में एक कंपनी के मालकिन होने के कांग्रेस के आरोपों ने राजनीति में हलचल मचा दी है। हालांकि मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित बताया है। लेकिन चुनाव बाद ही पता चलेगा कि इन आरोपों का आम लोगों पर क्या और कितना असर हुआ है।
जहाँ तक बगावत का सवाल है, बीजेपी भी इससे अछूती नहीं रही है। उसकी एक महिला मंत्री कांग्रेस के टिकट पर हाफलांग सीट से मैदान में है तो कई अन्य वरिष्ठ नेता भी नाराज़ होकर घर बैठे हैं।
वर्ष 2016 में भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से हटाने में कामयाबी जरूर हासिल की थी। लेकिन सरकार के गठन के लिए उसे अपने सहयोगियों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ा था। उस चुनाव में पार्टी को 60 सीटें मिल सकी थीं। उसके पांच साल बाद हुए चुनाव में भी पार्टी 60 सीटों तक ही सिमटी रही। इस बार हिमंता की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को अकेले अपने बूते बहुमत दिलाने की है ताकि उसे सहयोगियों पर निर्भर नहीं रहना पड़े।
बीजेपी किस भरोसे पर मैदान में?
हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा इस बार परिसीमन से बदले जमीनी समीकरण के अलावा सरकार की विकास योजनाओं और बड़े पैमाने पर अतिक्रमण अभियान के भरोसे मैदान में है। परिसीमन के कारण राज्य में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 से घट कर 22 रह गई है। राज्य में वर्ष 2023 में सीटों के परिसीमन के बाद पहली बार कोई चुनाव हो रहा है।विशेलषकों का कहना है कि राज्य के स्वदेशी और बंगाली मिया मुसलमानों के बीच बढ़ती खाई का भी चुनावी नतीजों पर असर हो सकता है। मुख्यमंत्री खुलेआम कहते रहे हैं कि उनको मिया वोटों की ज़रूरत नहीं है। खासकर निचले असम की सीटों पर ऐसे बांग्लाभाषी मुसलमान पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाएंगे, यह तो बाद में ही पता चलेगा। वैसे, भाजपा को भी इस खतरे का अंदाजा है। यही वजह है कि पार्टी ने इस बार महिलाओं, युवाओं और चाय बागान मजदूरों को अपने पाले में खींचने पर खास जोर दिया है। उसके चुनाव अभियान में भी यही मुद्दे छाए रहे हैं।
बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह समेत कई नेता असम में चुनावी रैलियों को संबोधित कर चुके हैं। प्रधानमंत्री ने अपने दौरे में चाय बागान में पत्तियां तोड़ी तो कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेता भी चाय बागान इलाके में ताबड़तोड़ रैलियां कर चुके हैं।