पूर्वोत्तर राज्य असम के विधानसभा चुनाव पर लंबे समय बाद एक बार फिर उग्रवाद का साया मंडरा रहा है। अल्फा और बोडो उग्रवादियों के दौर में राज्य में लगभग हर चुनाव पर उग्रवाद की छाप साफ़ नज़र आती थी। लेकिन इन उग्रवादी संगठनों के ज्यादातर सदस्यों के हथियार डाल कर मुख्यधारा में लौटने के बाद राज्य में चुनाव के दौरान उग्रवादी हिंसा काफी हद तक कम हो गई थी। लेकिन अब अल्फा के बातचीत विरोधी स्वाधीन गुट ने असम पुलिस के एक शिविर पर हमला कर अपने इरादे जता दिए हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने आगे भी ऐसी संभावना से इंकार नहीं किया है। इससे सरकार की चिंता बढ़ गई है।
राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पहले से ही सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी। लेकिन इस हमले के बाद पूरे तिनसुकिया जिले और अंतरराज्यीय सीमाओं पर हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है।
यहाँ इस बात का ज़िक्र प्रासंगिक है कि ऊपरी असम चुनावी लिहाज से सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के लिए बेहद अहम है। 42 विधानसभा सीटों वाला यह इलाक़ा ऐतिहासिक रूप से असम गण परिषद (अगप)) और राज्य की क्षेत्रीय राजनीति का गढ़ रहा है। वर्ष 2016 के बाद बीजेपी ने यहाँ मज़बूत पकड़ बना ली है। वर्ष 2021 के चुनाव में भाजपा और अगप गठबंधन को कुल 32 सीटें मिली सीटें मिली थीं।
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पुलिस कमांडो बटालियन कैंप पर हमला

असम के तिनसुकिया जिले के जागुन में बीते 22 मार्च को तड़के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन अल्फा-आई ने असम पुलिस के कमांडो बटालियन कैंप पर एक बड़ा हमला किया था। इसमें आरपीजी समेत कई ऑटोमेटिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया। इस हमले में असम पुलिस के चार कमांडो घायल हुए थे। फिलहाल उनका इलाज चल रहा है। अल्फा ने एक प्रेस बयान जारी कर इस हमले की जिम्मेदारी ली है और इसे 'ऑपरेशन बुजोनी' का नाम दिया है। समझा जाता है कि इस हमले के बाद उग्रवादी सीमा पार कर अरुणाचल प्रदेश में छिप गए हैं।
दिल्ली स्थित द सेंटर पार नार्थ ईस्ट इंडिया सिक्योरिटी स्टडीज समेत कई रक्षा विशेषज्ञों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अल्फा का स्वाधीन गुट विधानसभा चुनाव में गड़बड़ी फैलाने के लए कुछ जगह हमले कर सकता है। अब ताजा हमले के बाद ऐसी आशंका और बढ़ गई है।

खुफिया एजेंसियों का कहना है कि यह वर्ष 2021 के बाद असम पुलिस पर पहला बड़ा हमला है। इससे साफ़ है कि उसकी रणनीति बदल रही है।

इससे पहले बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में बीते दिसंबर में पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई और बांग्लादेश डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ़ डिफेंस फोर्सेज की कथित पहल पर अल्फा के अलावा पार्तवत्य चटग्राम जनसंहति समिति, अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी और रोहिंग्या सॉलिडैरिटी ऑर्गेनाइजेशन के प्रतिनिधियों के बीच बैठक में सुरक्षा बलों पर हमले की नई रणनीति तय की गई थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस गठजोड़ पर काबू पाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो खासकर असम के सीमावर्ती इलाकों और ऊपरी असम में ऐसे हमले बढ़ सकते हैं।
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अमेरिकी, यूक्रेनी नागरिकों की गिरफ्तारी

हाल में उग्रवादियों को प्रशिक्षण और हथियार देने के आरोप में मिजोरम-म्यांमार सीमा से अमेरिकी और यूक्रेनी नागरिकों की गिरफ्तारी से इस आशंका को और बल मिला है। उनको बीते 13 मार्च को राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने गिरफ्तार किया था। एनआईए ने कोर्ट को बताया कि वह आठ अन्य यूक्रेनियों की तलाश कर रही है। इन पकड़े गए सातों यूक्रेनी और अमेरिकी समेत ये सभी 15 अभियुक्त टूरिस्ट वीजा पर गैरकानूनी तरीके से भारत आए। जांच एजेंसी के सूत्रों का दावा है कि यह तमाम लोग म्यांमार में भारत विरोधी उग्रवादी गुटों को ट्रेनिंग देने आए थे। रिपोर्ट मुताबिक, इन सभी आरोपियों ने ड्रोन वॉरफेयर, ड्रोन ऑपरेशंस, ड्रोन की असेंबलिंग और तकनीक को जाम करने की ट्रेनिंग दी थी।
सुरक्षा एजेंसियों को बांग्लादेश और म्यांमार के ज़रिए पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर आधुनिकतम हथियार भेजने की उग्रवादियों की योजना का भी पता चला है।
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अल्फा का स्वाधीन गुट पहले भी चुनाव के समय नेताओं को निशाना बनाता रहा है। एक खुफिया अधिकारी का कहना है कि यह संगठन अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए चुनाव से बेहतर दूसरा कोई मौका नहीं हो सकता। फिलहाल संगठन में करीब डेढ़ सौ सदस्य हैं।
उग्रवाद के खतरे को ध्यान में रखते हुए दूसरे राज्यों से लगी राज्य की सीमा पर निगरानी बढ़ा दी गई है। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि लंबे समय बाद किसी चुनाव पर उग्रवाद का काला साया मंडरा रहा है। लेकिन सरकार ने उसे निपटने की ठोस योजना तैयार कर ली है।