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एनआरसी के प्रकाशन के ख़िलाफ़ उतरे हिंदू संगठन, लोगों में ख़ौफ़

असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस (एनआरसी) को लेकर ख़ौफ़ का माहौल है। एनआरसी के अंतिम प्रकाशन में 11 दिन शेष बचे हैं और हज़ारों लोग इस चिंता में परेशान हैं कि क्या उनका नाम एनआरसी की अंतिम सूची में आ पायेगा। और अगर नहीं आया तो, यही सोचकर उनकी रुह काँप जाती है। एनआरसी में 40 लाख लोगों की नागरिकता छिनने का ख़तरा है और 31 अगस्त को इसकी फ़ाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी है। 

एनआरसी में नाम आने को लेकर सबसे ज़्यादा चिंतित मुसलिम समुदाय के लोग हैं। लेकिन अब इस मामले में हिंदू संगठनों ने असम में प्रदर्शन शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े इन संगठनों का कहना है कि एनआरसी का अंतिम प्रकाशन तब किया जाना चाहिए जब इसकी पूरी तरह जाँच हो चुकी हो और इसमें कोई भी ग़लती न हो। 

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सोमवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने असम में एनआरसी समन्वयक के कार्यालय बाहर प्रदर्शन किया और प्रकाशित करने से पहले इस मामले में आये हर आवेदन की फिर से जाँच करने की माँग की। 
एबीवीपी से पहले हिंदू जागरण मंच ने भी असम के 30 में से 22 जिलों में प्रदर्शन किया था। मंच को इस बात का डर है कि बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग एनआरसी में आने से बाहर रह सकते हैं। मंच की यह भी माँग है कि एनआरसी के अंतिम प्रकाशन पर रोक लगा दी जाये, जिससे कि अवैध तरीक़े से असम में रह रहा कोई भी व्यक्ति इसमें शामिल न हो सके।
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मंच के अध्यक्ष मृणाल कुमार लस्कर ने कहा कि 31 अगस्त को एनआरसी के अंतिम प्रकाशन में कई लोगों के छूट जाने का ख़तरा है। लस्कर ने कहा, ‘अगर इसे इस रूप में प्रकाशित किया जाता है तो हम इसके ख़िलाफ़ आंदोलन करेंगे। क्योंकि आंकड़ों के दुरुपयोग के भी उदाहरण सामने आये हैं, इसलिए इसकी फिर से जाँच कराया जाना बेहद ज़रूरी है।’ 

शांतिपूर्वक होगा प्रकाशन: सोनोवाल

लेकिन इस सबके बीच सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलने पहुँचे असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, ‘एनआरसी का अंतिम प्रकाशन शांतिपूर्वक उसी तरह होगा जिस तरह पिछले साल इसके ड्राफ़्ट का प्रकाशन हुआ था।’ पत्रकारों के द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या केंद्र या राज्य सरकार आगे की जाँच के लिए एनआरसी के प्रकाशन की समय सीमा को कुछ समय के लिए आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है, इस पर सोनोवाल ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के पास विकल्प होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने भरोसा दिया है कि वह एनआरसी के प्रकाशन को लेकर पूरा सहयोग देंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार के पास इस बात के भी विकल्प हैं कि वह एनआरसी में शामिल हो चुके लोगों के नागरिकता के दावों की जाँच करा सकती है।
इस मुद्दे पर बीजेपी के विधायक शिलादित्य देव का कहना है, ‘विभाजन के समय के कई पीड़ित हिंदुओं और उनके परिवारों के नाम एनआरसी में नहीं हैं। अगर एनआरसी की अंतिम सूची में उनका नाम नहीं होगा तो असम की पहचान और इसकी संस्कृति पर इसका बेहद घातक असर होगा। हम दूसरा जम्मू-कश्मीर नहीं चाहते। इसीलिए हम दावों की फिर से जाँच चाहते हैं।’ पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी के अंतिम प्रकाशन से पहले राज्य सरकार की एनआरसी के लिए आये आवेदनों की दुबारा जाँच करने की याचिका को खारिज कर दिया था। एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया 2010 में हुई थी और यह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है। उस दौरान केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।
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अखिल असम छात्र संघ (आसू) चाहता है कि तय तारीख़ को ही एनआरसी का प्रकाशन किया जाना चाहिए। आसू की महासचिव लुरिनज्योति गोगोई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट एनआरसी की दोबारा जाँच को पहले ही ठुकरा चुका है। गोगोई ने कहा, ‘ऐसे लोग जो नहीं चाहते कि एनआरसी की प्रक्रिया पूरी हो इसके पीछे उनके राजनीतिक उद्देश्य हैं। इसे लेकर जो प्रदर्शन हो रहे हैं वे एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया को लटकाने के लिए किए जा रहे हैं। अगर एनआरसी में कोई भी विदेशी रह जाता है तो इसके लिए असम सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि इस प्रक्रिया में शामिल अधिकारी सरकार के ही हैं।’ 

1979 में आसू द्वारा अवैध आप्रवासियों की पहचान और निर्वासन की माँग करते हुए 6 साल तक आन्दोलन चलाया गया था। यह आन्दोलन 15 अगस्त, 1985 को असम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ख़त्म हुआ था।
असम समझौते के मुताबिक़, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक राज्‍य में प्रवेश करने वाले लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा। एनआरसी से प्रभावित होने वाले लोगों में अधिकांश लोग बेहद ग़रीब हैं। उन्हें यह साबित करना पड़ रहा है कि वे या उनके पुरखे असम में 1971 से पहले से बसे हुए हैं। उस समय वोटर कार्ड या फिर आधार जैसी सुविधा नहीं थी, इसलिए उनकी दिक़्क़तें और बढ़ गई हैं। 

मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालने वाले श्रमिकों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि क्या वे ख़ुद को भारतीय नागरिक साबित कर पायेंगे। इस मामले में सरकारी अधिकारियों की लापरवाही ने लोगों की जिंदगी को दोज़ख कर दिया है।

ताउम्र की देश की सेवा, बताया 'विदेशी'

कुछ समय पहले ऐसा ही एक मामला सामने आया था जब जीवन भर सेना में रहकर देश की सेवा करने वाले मोहम्मद सनाउल्लाह को ‘विदेशी’ घोषित करने की जाँच रिपोर्ट झूठी होने की बात सामने आई थी। सनाउल्लाह की जाँच रिपोर्ट पर जिन तीन लोगों के हस्ताक्षर करने की बात सामने आई थी, उन्होंने कहा था कि इस मामले में हुई किसी जाँच के बारे में उन्हें जानकारी ही नहीं थी। उन्होंने कहा था कि इस मामले में उनका कोई बयान दर्ज नहीं किया गया और उन्हें गवाह के रूप में दिखाया गया है जो पूरी तरह झूठ है।
रिहा होने के बाद सनाउल्लाह ने कहा था कि वह इस बात से बेहद दुखी हैं कि उन्हें ‘विदेशी’ कहा गया। जमानत पर बाहर आने के बाद सनाउल्लाह ने कहा कि था 30 साल तक देश की सेवा करने के बाद उनके साथ ऐसा सलूक किया गया।
बता दें कि सनाउल्लाह और उनके परिवार पर अवैध तरीक़े से भारत में रहने का आरोप लगा था और इस आरोप में सनाउल्लाह को 29 मई को हिरासत में ले लिया गया था। लेकिन गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 7 जून को सनाउल्लाह को रिहा करने का आदेश दिया था। अदालत ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार को भी नोटिस जारी किया था। 

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