अररिया से महाराष्ट्र व कर्नाटक के मदरसा जा रहे 163 बच्चों को कटनी में रोके जाने पर बड़ा विवाद। अभिभावकों ने अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की।
अररिया में बच्चों के अभिभावक और स्वयंसेवी संगठन की प्रेस कॉन्फ्रेंस।
बिहार के अररिया से महाराष्ट्र व कर्नाटक के मदरसों में पढ़ने जा रहे 163 बच्चों को मध्य प्रदेश के कटनी स्टेशन पर रोकने और 'रेस्क्यू' कर बाल गृह में भेजने पर अभिभावकों ने नाराज़गी जताई है। अब 25 अप्रैल को बच्चों को सौंपे जाने के बाद अभिभावक सवाल पूछ रहे हैं- क्या गरीब मुस्लिम बच्चे मदरसा पढ़ने का हक भी नहीं रखते? या फिर धर्म के नाम पर निशाना बनाया गया? अररिया में सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अभिभावकों ने कहा कि 'हमारे बच्चे मजदूरी नहीं, शिक्षा हासिल करने जा रहे थे। फिर भी उन्हें अपराधी बना दिया गया।' यह मामला अब सिर्फ एक 'रेस्क्यू' का नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासन की जवाबदेही का बड़ा सवाल बन गया है।
बाल तस्करी के नाम पर रोका
दरअसल, बिहार के अररिया से ट्रेन में सवार 163 मासूम बच्चे महाराष्ट्र और कर्नाटक के मदरसों में पढ़ने जा रहे थे। एक फोन कॉल और शक के चलते वैध टिकट, सहमति पत्र और शिक्षकों के साथ सफर कर रहे ये बच्चे बाल तस्करी के नाम पर कटनी में उतार लिए गए। बाल गृह पहुंचाए गए। इसी को लेकर जन जागरण शक्ति संगठन द्वारा अररिया में सोमवार को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में मानवाधिकार कार्यकर्ता और बच्चों के अभिभावकों ने अपनी पीड़ा बताई। अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चे अपनी मर्जी से मदरसों में पढ़ने जा रहे थे। कई सालों से यह सिलसिला चल रहा है। बच्चों के साथ उनके शिक्षक थे, वैध रेलवे टिकट थे, जरूरी कागजात थे और माता-पिता के सहमति पत्र भी थे। फिर भी प्रशासन ने इसे बाल तस्करी का मामला बना दिया और बच्चों को बाल गृह में भेज दिया।
जन जागरण शक्ति संगठन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि अभिभावकों को जब पता चला कि बच्चे जबलपुर और कटनी के बाल गृह में हैं, तो उन्हें बहुत झटका लगा। कुछ अभिभावक कटनी पहुंचे, लेकिन बच्चों को सौंपा नहीं गया। कई दिनों की कोशिशों, स्थानीय संगठनों की मदद और सरकार पर दबाव के बाद सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट पूरी हुई। अंत में 25 अप्रैल को बच्चों को परिवारों को सौंप दिया गया।
'गरीब बच्चों को पढ़ने का हक नहीं?'
नरपतगंज प्रखंड के कुंडीलपुर गांव की बीबी अंजुमन ने कहा, 'क्या गरीब के बच्चों को पढ़ने का हक नहीं है? मेरे तीन नाती-पोते अपनी मर्जी से कर्नाटक के बीदर मदरसे में पढ़ते हैं। वहां रहने-खाने और पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था है। सरकार अगर अररिया में भी ऐसी व्यवस्था दे दे तो अच्छा हो।' उन्होंने बताया कि बच्चों को कटनी में रोके जाने के बाद कई दिनों तक उनसे बात भी नहीं हो पाई। उनका बेटा सदमे से बीमार पड़ गया और अब अस्पताल में है। उन्होंने मांग की कि सरकार दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करे।
'मुस्लिम हैं तो निशाना बनाया गया'
एक अन्य अभिभावक शौकत ने कहा कि बच्चे मुस्लिम समुदाय के हैं, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया। प्रशासन के पास कोई ठोस सबूत नहीं था, फिर भी बच्चों को रोक लिया गया। जब वे खुद कटनी पहुंचे तो बच्चों को सौंपा क्यों नहीं गया? सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट की प्रक्रिया दो बार हुई, जिसमें बहुत समय बर्बाद हुआ। अगर स्थानीय संगठनों ने मदद न की होती तो बच्चों को छुड़ाने में और ज्यादा समय लगता। उन्होंने कहा कि इस घटना से बच्चों की पढ़ाई पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।कैसे रोका गया बच्चों को?
प्रेस कॉन्फ्रेंस में एडवोकेट रमीज ने सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के हवाले से बताया कि बाल कल्याण समिति को सूचना मिली थी कि 11 अप्रैल 2026 को पटना-पुणे एक्सप्रेस में 163 बच्चों को अवैध रूप से काम कराने के लिए ले जाया जा रहा था। लेकिन वास्तव में यह न तो अवैध परिवहन था और न ही जबरन काम कराने का मामला। एडवोकेट नवाज ने कहा कि इस मामले पर बहस चल रही है, लेकिन बहस का केंद्र बच्चों को रखना चाहिए। सीमांचल क्षेत्र बहुत पिछड़ा है। यहां गरीबी के कारण कई बच्चे अच्छी शिक्षा नहीं पा पाते। मदरसे उनकी जरूरतें पूरी करते हैं– रहना, खाना और पढ़ाई का इंतजाम करते हैं। इस कार्रवाई से बच्चों को जीवन भर का सदमा पहुंचा है।
जन जागरण शक्ति संगठन के सचिव आशीष रंजन ने कहा कि सवाल उठता है कि क्या बच्चों को इसलिए रोका गया क्योंकि वे मदरसा में पढ़ने जा रहे थे? वर्तमान सांप्रदायिक माहौल और कुछ राज्यों में बने वातावरण की वजह से ऐसा हुआ लगता है। संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा की आजादी देता है।
ईमारत ए शरिया के काजी अतिकुल्लाह ने कहा कि दूर-दराज के मदरसों में बच्चे कई कारणों से जाते हैं। यह कोई गुनाह नहीं है। यह पुराना सिलसिला है और बच्चों का पूरा हक है। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रशासन ने अब तक कोई अफसोस भी नहीं जताया और केस आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने मांगें रखीं कि निष्पक्ष जांच कर अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जाए, बच्चों और शिक्षकों को मुआवजा दिया जाए, स्पष्ट SOP जारी हो ताकि ऐसी घटना दोबारा न हो और सभी शैक्षिक संस्थानों पर समान और निष्पक्ष नियम लागू हों।