वोट फॉर डेमोक्रेसी की एक रिपोर्ट में दावा किया है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मतदाता सूची से नाम हटाने, एसआईआर में हेरफेर और चुनाव के बाद 'आधी रात को नाम बढ़ाने' के ज़रिए सुनियोजित तरीके से धांधली की गई। पूरा रिपोर्ट पढ़ें।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को लेकर गंभीर आरोप लगाते हुए 'वोट फॉर डेमोक्रेसी' (VFD) नामक संगठन ने एक विस्तृत पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन जारी किया है, जिसमें दावा किया गया है कि चुनावी प्रक्रिया में व्यवस्थित हेरफेर हुआ और जनादेश को 'चुरा लिया गया'। रिपोर्ट का शीर्षक है - "THE BIHAR VERDICT 2025: An Audit of the 'Stolen Mandate' – From SIR Manipulation to the 'Midnight Hike': How the Vote Was Engineered"।
यह रिपोर्ट महाराष्ट्र स्थित वोट फॉर डेमोक्रेसी द्वारा तैयार की गई है, जिसमें रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एमजी देवसायम (फोरम फॉर इलेक्टोरल इंटीग्रिटी के संस्थापक), डॉ. प्यारा लाल गर्ग, प्रोफेसर हरिश कर्णिक और माधव देशपांडे जैसे विशेषज्ञ शामिल हैं। रिपोर्ट में चुनाव से पहले, दौरान और बाद में हुई कथित अनियमितताओं का ऑडिट पेश किया गया है।
विशेष गहन संशोधन (SIR) में हेरफेर
24 जून 2025 को SIR की अधिसूचना जारी की गई, जो चुनाव से कुछ महीने पहले हुई। हालांकि 2003 से लगातार वोटर लिस्ट संशोधित हो रही थी और कहीं कोई आरोप या विवाद नहीं था। रिपोर्ट में इसे अभूतपूर्व और संदिग्ध बताया गया है, क्योंकि जनवरी 2025 में ही विशेष संशोधन हो चुका था। दावा है कि इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 का उल्लंघन हुआ। एसआईआर के लिए न तो कोई ठोस कारण दर्ज किया गया और न ही कोई अनुभवजन्य आधार सार्वजनिक किया गया। रिपोर्ट का कहना है कि समय और पैमाने दोनों ही दृष्टि से यह प्रक्रिया कानूनी और लोकतांत्रिक रूप से संदेहास्पद थी।
मतदाता सूची में नामों की भारी कटौती
एसआईआर के बाद आंकड़े चौंकाने वाले हैं: 24 जून 2025 (एसआईआर से पहले) को 7.89 करोड़ मतदाता थे। 1 अगस्त 2025 (ड्राफ्ट रोल) को 7.24 करोड़ मतदाता रह गए। करीब 65.69 लाख नाम हटाए गए। 30 सितंबर 2025 (अंतिम सूची) को करीब 7.42 करोड़ मतदाता रह गए। जबकि वास्तविक रूप से केवल 3.66 लाख मतदाता ही अपात्र पाए गए। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाया जाना वैध अपवादों की तुलना में अत्यधिक और असंतुलित है।‘घोस्ट डिलीशन’: आंकड़ों से परे
21 से 25 जुलाई 2025 के बीच मात्र तीन दिनों में: 21.27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए। 5.44 लाख को मृत घोषित किया गया, जबकि उससे पहले 27 दिनों में कुल मौतें 16.55 लाख थीं। 14.24 लाख को ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ बताया गया। ‘अनट्रेसेबल’ मतदाताओं की संख्या रातोंरात 809% बढ़ गई। एक भी ‘विदेशी मतदाता’ नहीं मिला, जबकि यही एसआईआर का घोषित उद्देश्य था।
ऑडिट रिपोर्ट इसे मैदानी सत्यापन नहीं, बल्कि एल्गोरिदमिक डिलीशन का संकेत मानती है।'मिडनाइट हाइक' और डेटा में हेराफेरी
हकीकत यही है कि चुनाव के बाद के आंकड़ों ने सबसे ज्यादा चौंकाया है। रिपोर्ट में इसे 'मिडनाइट हाइक' का नाम दिया गया है। 12 नवंबर को महिला और पुरुष मतदाताओं के टर्नआउट में समान रूप से 0.18% की वृद्धि दर्ज की गई। इससे अचानक 1,34,145 नए वोट जुड़ गए। इस डेटा हेरफेर ने कम से कम 20 सीटों के नतीजों को प्रभावित किया। बिहार में 21 सीटें ऐसी रहीं जहां हार-जीत का अंतर 0 से 15 वोटों के बीच था, लेकिन वहां VVPAT पर्चियों की दोबारा गिनती नहीं कराई गई।बूथों का गणित और जीविका दीजियों का कब्जा
चुनाव आयोग ने मतदान केंद्रों की संख्या 77,462 से बढ़ाकर 90,740 कर दी, लेकिन आरोप है कि यह बढ़ोतरी दुर्गम और दूरदराज के क्षेत्रों के बजाय रणनीतिक क्षेत्रों में की गई। रिपोर्ट में 1.8 लाख 'जीविका दीदियों' को चुनाव स्वयंसेवक के रूप में तैनात करने पर सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि वे सीधे सरकारी वित्तीय योजनाओं की लाभार्थी हैं। बूथों पर एनडीए के 91,098 एजेंटों के मुकाबले महागठबंधन के पास केवल 67,450 एजेंट थे, जिससे निगरानी में भारी कमी आई।मतदान के दिन उल्लंघन और 'बाहरी' दखल
रिपोर्ट में कई गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं, जिसमें CCTV कैमरों का खराब होना और सड़कों पर VVPAT पर्चियों का मिलना शामिल है।
इसी तरह हरियाणा से विशेष ट्रेनों के जरिए लगभग 6,000 मतदाताओं को बिहार लाए गए। यह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(5) का उल्लंघन है। सवाल उठाया गया है कि चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद भी मतदाता सूची में 3.34 लाख नए नाम कैसे जोड़े जा सकते हैं।क्या यह संवैधानिक संकट है?
ऑडिट रिपोर्ट का सारांश है कि यह चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं था। इसमें संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 326 का उल्लंघन करते हुए मतदाता के अधिकारों का हनन किया गया है। आधार कार्ड को दरकिनार करना और बिना फील्ड वेरिफिकेशन के 'एल्गोरिथमिक' तरीके से नाम काटना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ बताया गया है।यह ऑडिट बताता है कि बिहार 2025 चुनाव लोकतंत्र पर हमला था, जहां मतदाता सूची से लेकर परिणाम तक हर स्तर पर हेरफेर हुआ। विपक्ष ने इसे 'चोरी हुआ जनादेश' करार दिया है और कानूनी चुनौतियां जारी हैं। क्या यह लोकतंत्र की नई सच्चाई बन जाएगी? समय बताएगा।