वैसे तो बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद परिवारवाद की राजनीति की उपज है लेकिन गुरुवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में तो ऐसा लगता है कि ‘परिवारवाद का दफ्तर’ ही खोल दिया गया है। लगभग दर्जन पर ऐसे लोग मंत्री बने हैं जिनके परिवार का कोई ना कोई सदस्य किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक पद पर रहा है।
राजद प्रमुख लालू प्रसाद को परिवारवाद के लिए दिन रात कोसने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को भी मंत्री बनवा लिया जो अभी तक किसी भी सदन के सदस्य भी नहीं बन पाए हैं और वह हाल ही में पापा की पार्टी यानी जनता दल यूनाइटेड मैं शामिल हुए थे।
यह बताना मुश्किल है कि ज्यादा विडंबना की बात क्या है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मंत्रिमंडल विस्तार के साक्षी बने जिसमें तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटों को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले सम्राट चौधरी का राजनीतिक करियर वैसे तो लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी से शुरू हुआ लेकिन उनकी असली पहचान उनके पिता शकुनी चौधरी से ही मानी जाती है जो मंत्री रह चुके हैं।
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जेपी और लोहिया के नामलेवा और समाजवाद को अपनी विचारधारा बताने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्रा और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन उर्फ संतोष मांझी भी मंत्री बने हैं। निशांत कुमार जहां पहली बार मंत्री बने हैं वहीं नीतीश मिश्रा और संतोष सुमन पहले भी मंत्री रह चुके हैं। नीतीश मिश्रा भारतीय जनता पार्टी की कथित परिवारवाद विरोधी राजनीति की विडंबना ही माने जाते हैं।
परिवारवाद के इस दफ्तर में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश ने भी मंत्री पद की शपथ ली है और दिलचस्प बात यह है कि वह न तो विधानसभा और ना ही विधान परिषद के सदस्य हैं लेकिन उन्होंने दूसरी बार इस तरह बिना किसी सदन का सदस्य रहते हुए मंत्री पद की शपथ ली है। ध्यान रहे कि उपेंद्र कुशवाहा भी खुद को लोहियावादी बताते हैं और जब पहली बार दीपक प्रकाश मंत्री बने थे तो उपेंद्र कुशवाहा ने यह दलील दी थी कि उन्होंने पार्टी को बचाने के लिए परिवार के सदस्य को मंत्री बनवाया है।
उपमुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी के पिता जगदीश चौधरी भी विधायक रह चुके हैं। विजय चौधरी का राजनीतिक करियर कांग्रेस से शुरू हुआ और अब वह जनता दल यूनाइटेड के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं।
सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल की सबसे अमीर मंत्री राम निषाद भारतीय जनता पार्टी की विधायक हैं जिनके पति अजय निषाद लोकसभा सदस्य रह चुके हैं और ससुर कैप्टन जय नारायण निषाद भारत सरकार के कैबिनेट मंत्री थे।
इसी तरह नीतीश के पार्टी जनता दल यूनाइटेड की विधायक शीला मंडल भी मंत्री बनी हैं जिनके ससुर धनिक लाल मंडल राज्यपाल रह चुके हैं। एक और चर्चित नाम भाजपा की श्रेयसी सिंह का है जिनके पिता दिग्विजय सिंह केंद्र में मंत्री थे और माता पुतुल सिंह सांसद रह चुकी हैं। मंत्री संजय सिंह टाइगर के भाई धर्मपाल सिंह भी विधायक रह चुके हैं।
नीतीश कुमार के खास माने जाने वाले अशोक चौधरी ने भी एक बार फिर मंत्री पद की शपथ ली है जिनके पिता महावीर चौधरी कांग्रेस शासन काल में मंत्री थे। अशोक चौधरी की पुत्री शांभवी चौधरी दिवंगत रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की सांसद हैं।
इस बात पर बहस हो सकती है कि नीतीश कुमार की सेहत सही है या नहीं लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने परिवारवाद के विरोध के नाम पर लालू प्रसाद और राबड़ी देवी को हमेशा निशाना बनाया। वह कहते थे, “हम तो कभी अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाए। जननायक कर्पूरी ठाकुर जी से हमने यही सीखा है कि राजनीति में परिवार को नहीं लाना चाहिए। आजकल तो लोग अपने बेटे बेटियों और परिवार को ही सेट करने में लगे रहते हैं।” 
यह सही है कि जब तक उनकी सेहत सही रही तब तक उन्होंने ना तो अपनी पत्नी को राजनीति में लाया और ना ही बेटे को लेकिन जैसे ही उनके मुख्यमंत्री पद से हटने की बारी आई उनके पुत्र निशांत कुमार को पहले पार्टी में शामिल कराया गया और अब उन्हें बिहार का स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया है। नीतीश कुमार कहा करते थे, “कुछ लोग सिर्फ अपने परिवार के लिए काम करते हैं लेकिन हमारे लिए पूरा बिहारी एक परिवार है पूर्ण राम राजनीति में परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए इससे असली कार्यकर्ताओं का हक मारा जाता है।”
सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार इस हालत में हैं कि उनसे यह पूछा जाए कि जब उनके पुत्र को मंत्री बनाया गया है तो जदयू के किसी कार्यकर्ता का हक मारा गया या नहीं?
ध्यान रहे कि जब लालू प्रसाद के बड़े पुत्र तेज प्रताप को स्वास्थ्यमंत्री बनाया गया था तब लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी की परिवारवाद के लिए काफी आलोचना हुई थी और इसमें भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे थी। हालांकि निशांत और तेज प्रताप में यह फर्क है कि निशांत अभी किसी सदन के सदस्य नहीं है जबकि तेज प्रताप ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी।
कुछ लोगों का अब भी यह मानना है कि शायद नीतीश कुमार ने मजबूरी में ही इस मामले में हां कही है क्योंकि उनके इर्द-गिर्द लगे रहने वाले स्वार्थी नेता निशांत कुमार के बहाने अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि निशांत कुमार को दरअसल पार्टी बचाने के लिए जरूरी माना गया क्योंकि नीतीश कुमार के बाद जदयू का बिखरना तय माना जा रहा है।
लालू प्रसाद को परिवारवाद के लिए कोसने वालों ने निशांत और दूसरे परिवारवादी नेताओं के मंत्री बनने पर यह तर्क ढूंढा है कि राजनीति में युवाओं को आगे आना चाहिए। इस पर राजद नेताओं का कहना है कि क्या तेज प्रताप और तेजस्वी यादव से युवा नहीं थे?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परिवारवाद के विरोध के नाम पर ही राहुल गांधी को शहजादे का ताना देते हैं लेकिन जब उनकी पार्टी के नेता परिवारवाद के रास्ते आगे बढ़कर मंत्री बने हैं तो उन्होंने इस पर चुप्पी साध ली है। श्री मोदी चुनाव प्रचार के दौरान कई बार यह कह चुके हैं कि देश के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं। उनमें से एक को वह भाई-भतीजावाद या परिवारवाद का नाम देते थे और यह भी कहते थे कि जब तक इसके खिलाफ लड़ाई नहीं होगी तब तक हम पूरी क्षमता से आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
वह परिवारवाद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन बता चुके हैं और कहते थे कि राजनीति में जब परिवारवाद हावी होता है तो वह केवल अपने परिवार के बारे में सोचता है देश के बारे में नहीं। इस बात पर गौर किया जा सकता है कि अब बिहार में जिन परिवारवादी नेताओं ने मंत्री पद की शपथ ली है वह देश और बिहार के बारे में सोचेंगे या अपने परिवार के बारे में?