बिहार में नवंबर में हुए चुनाव में भारी बहुमत मिलने के बावजूद राजनीतिक अनिश्चितता जारी है और भारतीय जनता पार्टी अब तक यह ऐलान नहीं कर पा रही है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद उनकी जगह कौन लेगा। भाजपा जहां इस तरह की अनिश्चितता और देरी को अपनी चाणक्य नीति बताना चाहती है, वहीं बिहार में बहुत से लोगों का यह मानना है कि इसकी वजह यह है कि पूरा मामला फंसा हुआ है।

खरमास का बहाना कितना सही?

भारतीय जनता पार्टी के समर्थक लोगों को भरमाने के लिए खरमास की बात कह रहे हैं जो 14 अप्रैल को ख़त्म होने वाला है। खरमास की बात बिल्कुल धोखे में रखने वाली है क्योंकि इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा का चुनाव जीत चुके हैं, जबकि खरमास चल ही रहा था। इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य की शपथ ले सकते हैं।
खरमास का बहाना असल में वक्त लेने के लिए है क्योंकि नाम का ऐलान करने के बाद शपथ की तारीख़ खरमास के बाद तय की जा सकती है। इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी बिहार में फिलहाल ऐसा कोई फ़ैसला नहीं करना चाहती जिसका पड़ोसी पश्चिम बंगाल के चुनाव के जातीय समीकरण पर असर हो।
आमतौर पर बीजेपी के बारे में यह बात मशहूर हो चुकी है कि वह मुख्यमंत्री और किसी दूसरे पद के लिए भी किसी ऐसे नाम का ऐलान करती है जिसके बारे में किसी को कोई अंदाजा नहीं होता है। ऐसे नाम के ऐलान के बाद फिर वह यह भी दावा करती है कि उसने समाज के अमुक वर्ग से प्रतिनिधित्व दिलाते हुए किसी को मुख्यमंत्री बनाया है। हकीकत यह है कि बिहार को देखते हुए यह दावा बिल्कुल गलत लगता है और साफ़ तौर पर यह लग रहा है कि वह राजनीतिक उलझन का शिकार है।

एनडीए को एक माह में भी नहीं मिला सीएम

इस बात का अंदाजा नीतीश कुमार की उस घोषणा से लगाया जा सकता है जो उन्होंने 5 मार्च को की थी। उन्होंने तब बिहार का मुख्यमंत्री पद छोड़ने के इरादे और राज्यसभा का सदस्य बनने के बारे में ऐलान किया था। इस तरह देखा जाए तो अब तक एक महीने से ऊपर का समय बीत चुका है लेकिन बिहार में नेतृत्व किसके पास जाएगा, इसका किसी को कोई अंदाजा नहीं है। हालाँकि कम से कम आधा दर्जन प्रमुख नाम लिए जा चुके हैं लेकिन बिहार के लोगों ने इस पर बात करना ही छोड़ दिया है।

कुछ लोग तो यह कहते हैं कि दरअसल बिहार की राजनीति पिछले कई महीनों से ऑटो पायलट मोड पर है और सब कुछ अफसरों और कुछ नेताओं के भरोसे चल रहा है।

ऊपरी तौर पर नीतीश कुमार अब तक पहले की तरह मुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं, निर्देश दे रहे हैं और उन्होंने इस दौरान समृद्धि यात्रा भी जारी रखी है। लेकिन हकीकत यह है कि नीतिगत मामलों में बिहार बिल्कुल ठहरा हुआ नजर आ रहा है।

यदि सीएम बीजेपी का तो देरी क्यों?

यह बात लगभग मान ली गई है कि बिहार में अगला मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी का होगा, लेकिन नाम चुनने में उसे वह आज़ादी नहीं है जो दूसरे राज्यों में रही है क्योंकि वहां वह अपने दम पर सरकार बनाती थी, बिहार में ऐसा मामला नहीं है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की कथित चौंकाने की नीति को भी चुनौती का सामना है।
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इसकी वजह यह है कि एक तरफ़ जहां नीतीश कुमार के समर्थक बेहद मायूस हैं तो दूसरी तरफ़ यह बात भी कही जा रही है कि भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश कुमार के नाम का इस्तेमाल कर चुनाव तो जीत लिया लेकिन इसके बाद उन्होंने उन्हें किनारे लगा दिया।

बीजेपी की रणनीति  

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी पहले यह तय करना चाहती है कि नीतीश कुमार के जातीय समीकरणों की वजह से जो समर्थन एनडीए को हासिल है उसे किसी तरह ना खोया जाए। इसके साथ ही नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के नेता यह भी चाह रहे हैं कि मुख्यमंत्री जो भी बने उसमें नीतीश कुमार की मर्जी शामिल हो। 

दूसरी तरफ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का कहना है कि अगर 20 साल के बाद भी बिहार का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मर्जी से ही बनेगा तो उन्हें हटाने का क्या फायदा हुआ?

इन परिस्थितियों में इस बात की भी चर्चा हो रही है कि शायद भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश कुमार को हटाने में कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी दिखाई है और उसने उनके उत्तराधिकारी के बारे में कोई ठोस फैसला या विचार विमर्श के बिना ही यह कदम उठाया है। जनता दल यूनाइटेड के नेता भी यह बात स्वीकार करते हैं कि अगर नीतीश कुमार अपनी सही सेहत में होते तो भारतीय जनता पार्टी उनका इस्तेमाल कर उन्हें इस तरह किनारे नहीं लगाती।

सम्राट चौधरी का दावा कितना मज़बूत?

शुरुआत में ऐसा माना जा रहा था कि उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के मजबूत दावेदार हैं। खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चुनाव के दौरान यह कह चुके थे कि सम्राट चौधरी को बड़ी जिम्मेदारी मिलने वाली है। नीतीश कुमार ने भी मुख्यमंत्री पद छोड़ने के अपने ऐलान के बाद सम्राट चौधरी के बारे में इस तरह के संकेत दिए थे। इसकी वजह यह थी कि वह उसी जाति समूह से आते हैं जिसका प्रतिनिधित्व नीतीश कुमार करते हैं।
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लेकिन कुछ दिनों के बाद सम्राट चौधरी के नाम की चर्चा कम होती गई और यह कहा जाने लगा कि उनकी विवादास्पद छवि और जरूरत से ज्यादा प्रचार केंद्रीय नेतृत्व को रास नहीं आ रहा है। शायद यही वजह है कि सम्राट चौधरी इस समय उपमुख्यमंत्री के तौर पर बहुत कम सार्वजनिक मंचों पर नज़र आ रहे हैं।
सम्राट चौधरी के अलावा हर जाति वर्ग से कोई ना कोई नाम नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन सबको यही लगता है कि भारतीय जनता पार्टी इनमें से किसी को मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहती है। इसकी एक वजह तो यह भी है कि वह अगर इनमें से किसी एक नाम को चुनती है तो चौंकाने वाली बात का दम भरने का मौका उसे नहीं मिलेगा। लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि वह वैसा नाम मुख्यमंत्री के लिए चुनना चाहेगी जो न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से हो बल्कि केंद्रीय नेतृत्व के आगे अपनी बात मनवाने की जुर्रत करने वाला ना हो।