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दशहरे पर फिर दिखी नीतीश-बीजेपी नेताओं के बीच ‘दूरियां’ 

बिहार की सियासत में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजेपी के कुछ नेताओं के बीच जिन ‘दूरियों’ की जोरदार चर्चा है, वह दशहरे के मौक़े पर साफ़ दिखाई दीं। पटना के गाँधी मैदान में आयोजित दशहरा मेले से बीजेपी के नेताओं ने दूरी बनाये रखी, जबकि इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सभी दलों के नेता आते हैं। बीजेपी नेताओं के इस कार्यक्रम से दूर रहने की चर्चा इसलिए भी है क्योंकि बीजेपी राज्य की सरकार में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू की सहयोगी है। दशहरे के मौके़ पर आयोजित कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विधानसभा स्पीकर विजय चौधरी और बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा मौजूद रहे। 

सूत्रों के मुताबिक़, बिहार के गवर्नर फ़ागू चौहान, उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी, बीजेपी के कई विधायक, स्थानीय मेयर पटना में ही मौजूद थे और इन्हें कार्यक्रम में शामिल होने के लिए निमंत्रण भी भेजा गया था लेकिन सभी ने कार्यक्रम से दूरी बनाये रखी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बीजेपी नेताओं के ऐसा करने के पीछे ज़रूर कोई बड़ी वजह है और उन्होंने सोच-समझकर ही यह फ़ैसला लिया है। 

बीजेपी और जेडीयू के रिश्तों में पिछले कुछ महीनों में खटास बढ़ी है और कहा जा रहा है कि इनका गठबंधन टूट सकता है। बिहार की राजधानी पटना में इन दिनों बाढ़ आई हुई है और इसे लेकर भी दोनों दलों के नेताओं के बीच बयानबाज़ी हुई है।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कुछ दिन पहले बाढ़ से निपट पाने में विफल रहने के लिए नीतीश कुमार पर हमला बोला था। गिरिराज सिंह ने कहा था, ‘ताली सरदार को मिलेगी तो गाली भी सरदार को मिलेगी।’ इस पर जेडीयू की ओर से भी तीख़ी प्रतिक्रिया जताई गई थी। 
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सीएम की कुर्सी पर है बीजेपी की नज़र!

बिहार में बीजेपी और जेडीयू मिलकर सरकार चला रहे हैं। मुख्यमंत्री का पद जेडीयू के पास है जबकि उप मुख्यमंत्री का पद बीजेपी के पास। लोकसभा चुनाव तक सब ठीक था और गठबंधन सरकार ठीक चल रही थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी जीत मिलने के बाद से ही बिहार में बीजेपी के कुछ नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ गई है। ऐसे नेताओं का कहना है कि बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी बीजेपी के पास होनी चाहिए। 

बिहार की राजनीति में गिरिराज सिंह, सीपी ठाकुर, संजय पासवान और कुछ अन्य क्षेत्रीय नेता नीतीश के ख़िलाफ़ हैं और उन्हें यह लगता है कि बीजेपी अब अकेले बहुमत पाने की स्थिति में आ चुकी है। संजय पासवान तो नीतीश को केंद्र की राजनीति करने की सलाह भी दे चुके हैं।
ऐसे नेता पार्टी आलाकमान तक यह बात पहुंचा चुके हैं कि बीजेपी अकेले दम पर ही लड़कर राज्य में सरकार बना सकती है तो ऐसे में उसे जेडीयू के साथ की क्या ज़रूरत है। और अगर जेडीयू का साथ चाहिए भी तो वह छोटे भाई की भूमिका में रहे यानी सीएम की कुर्सी का दावा छोड़ दे। इसे लेकर बिहार की सियासत में जोर-आज़माइश जारी है। 
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प्रदेश अध्यक्ष के बयान से बढ़ी चिंता

बिहार में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं और बीजेपी के एक गुट के नेताओं की पूरी कोशिश है कि नीतीश कुमार गठबंधन के मुख्यमंत्री का चेहरा न बनें। इन कयासों को हवा तब मिली थी जब बिहार के नवनियुक्त बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने अंग्रेजी अख़बार ‘द इकनॉमिक टाइम्स’ के साथ बातचीत में कहा था कि मुख्यमंत्री पद के चेहरे के बारे में फ़ैसला बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व और संसदीय बोर्ड करेगा। जायसवाल का यह बयान नीतीश कुमार के लिए आफ़त का इशारा था। क्योंकि बिना जेडीयू की सहमति के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने अगर यह बयान दिया तो इसका मतलब यह है कि बीजेपी राज्य में जेडीयू को पीछे धकेलना और ख़ुद का मुख्यमंत्री चाहती है। 

एनडीटीवी के मुताबिक़, दशहरा मेले के कार्यक्रम की आयोजक कमेटी के सदस्य कमल नोपानी ने बताया कि कार्यक्रम में सभी नेताओं को आमंत्रित किया गया था और वे इसमें आते रहे हैं। लेकिन इस बार बीजेपी की ओर से कोई भी नहीं आया और हमें इस बारे में कोई सूचना भी नहीं दी गई। 

हालांकि केंद्रीय मंत्री और पटना के सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि वह इस बार दशहरे के किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे और अपने लोकसभा क्षेत्र के बाढ़ पीढ़ितों के बीच मौजूद रहेंगे। जबकि गवर्नर के कार्यालय की ओर से कहा गया कि वह अस्वस्थ हैं। लेकिन सुशील मोदी के न आने को लेकर भी हैरानी हुई जबकि वह नीतीश के पक्ष में खड़े दिखते रहे हैं। हालांकि उनके कार्यालय की ओर से कहा गया है कि वह राज्य से बाहर थे। 

नीतीश ने किया था मोदी का विरोध

2014 के लोकसभा चुनाव के समय नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम का खुलकर विरोध किया था और एनडीए से नाता तोड़ लिया था। सियासी जानकारों के मुताबिक़, मोदी और अमित शाह नीतीश के इस विरोध को आज तक नहीं भूले हैं। नीतीश ने बीजेपी और संघ की विचारधारा को देश को बाँटने वाली विचारधारा बताया था। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबंधित संगठनों से जुड़े नेताओं की जांच कराने के आदेश को लेकर भी संघ की भौहें नीतीश को लेकर तनी हुई हैं। 

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अब जब बिहार के विधानसभा चुनाव में महज एक साल का समय बचा है तो आए दिन बीजेपी और जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार के बीच दूरियां बढ़ने की ख़बर आती रहती है। साथ ही यह चर्चा भी जोरों पर है कि नीतीश कुमार बीजेपी का दबाव बढ़ने पर एक बार फिर महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं। क्योंकि नीतीश कुमार पहले भी एनडीए से नाता तोड़ चुके हैं, ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री की कुर्सी को बचाने के लिए अगर वह फिर से एनडीए से नाता तोड़ लेंगे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। 
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