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आरजेडी क्यों नहीं चाहती कांग्रेस का दलित प्रदेश अध्यक्ष?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. मदन मोहन झा ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफा के बाद पार्टी प्रदेश में नए निजाम की तलाश शुरू कर दी है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस पर मंथन कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने इस दफा बिहार में किसी दलित या अल्पसंख्यक पर अपना मन बनाया है। लेकिन, इसकी चर्चा सामने आने के बाद पार्टी दो खेमे में बंट गई है। 

कांग्रेस में आरजेडी समर्थक पार्टी आला कमान के इस फैसले का विरोध कर रहे है। जबकि एक गुट इसके समर्थन में है। दलित प्रदेश अध्यक्ष का विरोध करने वाले नेताओं ने सोनिया गांधी से मिलकर अपनी बात रखी है। 

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उनका कहना है कि जिस तरीके से बिहार में जातीय समीकरण और राजनीतिक परिदृष्‍य में बदलाव हो रहा है उसे देखते हुए बिहार प्रदेश अध्‍यक्ष की कुर्सी मजबूत सवर्ण नेता के हाथ में सौंपी जाए। दूसरी पार्टियां अब मुसलिम यादव के समीकरण से बाहर निकल सवर्ण कैंडिडेट पर केंद्रित हो रही है। जनता भी अब दलितों से अधिक सवर्णों पर ही भरोसा कर रही है।

दलित प्रदेश अध्यक्ष का विरोध क्यों?

कांग्रेस में आरजेडी समर्थकों का तर्क है कि मुसलमान और दलित अध्यक्ष होने से बिहार में गठबंधन पर असर पड़ेगा। दरअसल, बिहार में आरजेडी 'माई' समीकरण के साथ साथ दलित और महादलितों की राजनीति करती आ रही है। यह वर्ग आरजेडी का सबसे बडा वोट बैंक है। कांग्रेस पार्टी अगर दलित या मुसलमान कोटे से किसी को  अपना अगर प्रदेश अध्यक्ष बनाती है तो इससे आरजेडी का वोटबैंक प्रभावित हो सकता है। और एनडीए विरोधी वोटों में बँटवारा होगा। जिसका फ़ायदा एनडीए को होगा। 

जबकि दलित या मुसलमान नाम का समर्थन करने वालों का कहना है कि दलित या मुसलमान कांग्रेस के परंपरागत वोटर रहे हैं। 1990 के बाद कांग्रेस का साथ जरुर उन लोगों ने छोड़ा है लेकिन, इनका कांग्रेस से मोहभंग नहीं हुआ। अभी भी भाजपा की जगह यह वर्ग कांग्रेस के साथ खड़ा दिखता है। हाल में हुए बिहार विधान परिषद चुनाव में इसकी एक बानगी भी दिखी। 

Madan Mohan Jha resigns from Bihar congress president - Satya Hindi

आरजेडी ए टू जेड की पार्टी तो कांग्रेस क्यों नहीं

कांग्रेस में दलित या मुसलमान समर्थकों का कहना है कि आरजेडी अब ए टू जेड की पार्टी बनने का दावा कर रही है। फिर कांग्रेस क्यों सवर्णों तक ही सीमित रहे। लालू प्रसाद के जमाने में आरजेडी सवर्णो को दरकिनारा किया करती थी। लेकिन, तेजस्वी राज में आरजेडी बिहार में सवर्णो की पार्टी बनने का प्रयास कर रही है। इसकी एक बानगी बिहार विधान परिषद के चुनाव में भी दिखा। इसलिए कांग्रेस को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। 

ब्राह्मण नेता भी रेस में 

राहुल गांधी से मुलाकात के मदन मोहन झा ने गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा देने के बाद से पार्टी में जातिगत स्तर से लामबंदी तेज हो गई है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि दलित कोटे से कांग्रेस विधायक राजेश राम, अशोक राम और मीरा कुमार का चल रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मीरा कुमार फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनना चाह रही हैं। राजेश राम बिहार प्रदेश कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास की पसंद हैं। पूर्व विधायक अशोक राम पार्टी के सीनियर नेता रहे हैं। 

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इसी प्रकार मुसलमान कोटे से तारिक अनवर और शकील अहमद खान के नामों की चर्चा है। तारिक अनवर ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा है कि फिलहाल हम जिस जगह हैं खुश हैं। इसके बाद शकील अहमद खान के नाम की चर्चा तेज हो गई है। भूमिहार कोटे से विधायक दल के नेता अजीत शर्मा, श्याम सुंदर सिंह धीरज के साथ साथ कन्हैया कुमार का नाम भी चर्चा मे है। सूत्रों का कहना है राहुल गांधी की पसंद कन्हैया कुमार हैं। 

ब्राह्मण नेताओं में प्रेमचंद मिश्रा और विजय शंकर दुबे के नाम की भी अटकलें हैं। 

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राजेश कुमार ओझा
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