नीतीश और बीजेपी का साथ अब असहज लग रहा है। अभी दोनों का अलग होना आसान नहीं दिखायी देता, तब भी बीजेपी एक कड़वी दवा की तरह नीतीश को स्वीकार कर रही है। एक बात तय है कि अगर आरजेडी और तेजस्वी अपने अवसाद के इस दौर से बाहर नहीं आते तो उसका बड़ा फ़ायदा नीतीश को होगा।
तेजस्वी के लिए एक अच्छी ख़बर यह है कि उनकी पार्टी में अभी भगदड़ की स्थिति नहीं है। रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे पुराने नेता अब भी पार्टी की टूटी कड़ियों को जोड़ने में तेजस्वी के साथ खड़े दिखायी दे रहे हैं। लेकिन महागठबंधन की कुछ पार्टियों और नेताओं का आत्मविश्वास ज़रूर टूटता दिखायी दे रहा है।