यह बात आज से 26 साल पहले की है जब नीतीश कुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली लेकिन हफ्ते भर में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। उस वक्त नीतीश कुमार ने कहा था कि वह केंद्र की राजनीति छोड़कर बिहार में खूंटा गाड़ कर रहेंगे। इसके 5 साल बाद वह नियमित रूप से मुख्यमंत्री बन गए। इसके आठ साल बाद तक उनका खूंटा गड़ा रहा लेकिन 2013 के बाद से उन्हें अपने खूंटे को बचाने के लिए तरह-तरह की तरकीब लगानी पड़ी। यह खूंटा आज यानी 5 मार्च को फिर उखड़ गया। राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने से पहले बिहार की जनता को संबोधित करते हुए, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मतदाताओं के निरंतर समर्थन के लिए उन्हें धन्यवाद दिया और कहा कि उनके भरोसे ने ही उन्हें दो दशकों से अधिक समय तक राज्य की सेवा करने में सक्षम बनाया है। बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड 10वीं बार शपथ लेने के महज चार महीने बाद, नीतीश कुमार के राज्यसभा चुनाव लड़ने की घोषणा ने इस बात पर अटकलों का दौर शुरू कर दिया है कि शीर्ष पद पर उनका उत्तराधिकारी कौन होगा।

नीतीश ने एक्स पर लिखा है- पिछले दो दशक से भी अधिक समय से आपने अपना विश्वास एवं समर्थन मेरे साथ लगातार बनाए रखा है, तथा उसी के बल पर हमने बिहार की और आप सब लोगों की पूरी निष्ठा से सेवा की है। आपके विश्वास और समर्थन की ही ताकत थी कि बिहार आज विकास और सम्मान का नया आयाम प्रस्तुत कर रहा है। इसके लिए पूर्व में भी मैंने आपके प्रति कई बार आभार व्यक्त किया है।
मुख्यमंत्री ने लिखा- संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूँ। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूँ।
नीतीश कुमार की इस घोषणा के पीछे की मजबूरी को इस बात से समझा जा सकता है कि अगर उन्होंने ऐसा फैसला किया तो इसका ऐलान उन्हें आखिरी दिन क्यों करना पड़ा।

ताज़ा ख़बरें
दरअसल पहली मार्च से ही इस बात की चर्चा शुरू हो गई थी कि भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व विशेष कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मन बना लिया है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता मुख्यमंत्री होगा और नीतीश कुमार को दिल्ली में सेट करने के लिए या तो मना लिया जाएगा या उन पर दबाव बनाया जाएगा। यह चर्चा आज सच साबित हो गई।
वैसे तो इस बात का अंदाजा बिहार विधानसभा चुनाव के पहले और उसका रिजल्ट आने के बाद भी लगाया जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी एक न एक दिन नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाएगी और अपनी पार्टी के किसी नेता को यह पद देगी लेकिन इसकी चर्चा और फिर इस पर अमल इतनी जल्दी शुरू हो जाएगी इसका अंदाजा बहुत कम लोगों को रहा होगा।

इसके साथ ही अब यह भी पता चल गगा कि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को बिहार में कोई महत्वपूर्ण पद मिलेगा है, जैसे डिप्टी सीएम वगैरह बनाया जाता है। और सबसे बड़ा यह सवाल के भारतीय जनता पार्टी का कौन नेता अब बिहार का मुख्यमंत्री बनेगा, इसका जवाब भी एक दो दिन में मिल जाएगा।

दरअसल नीतीश कुमार के बिहार से दिल्ली जाने की चर्चा के साथ-साथ यह चर्चा भी जोरों पर थी कि उनके पुत्र निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में आएंगे। यह भी कहा जा रहा था कि अगर नीतीश कुमार नहीं तैयार होते हैं तो उनके पुत्र निशांत कुमार को ही जनता दल यूनाइटेड की ओर से राज्यसभा भेजा जाएगा। नीतीश कुमार की अपनी घोषणा के बाद अब यह संभावना खत्म हो गई है।
दरअसल जदयू में भाजपा को पसंद नहीं करने वाला धड़ा लंबे समय से यह चाह रहा था कि निशांत कुमार राजनीति में आएं ताकि अगर नीतीश कुमार की जगह खाली हो तो उसे भरने के लिए बीजेपी का कोई नेता आए इससे बेहतर निशांत कुमार को वहां रखा जाए।
निशांत कुमार के बारे में यह माना जाता है कि उनका रुझान ज्यादातर आध्यात्मिक है और उन्हें कई बार पूजा पाठ करने के बाद राजनीति के मामले में बस इतना कहते हुए सुना गया कि उनके पिता अच्छा कर रहे हैं और उन्हें जिताना चाहिए। हालांकि विधानसभा चुनाव के दौरान यह चर्चा जोरों पर थी कि उन्हें हरनौत से जदयू का उम्मीदवार बनाया जा सकता है लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसकी एक बड़ी वजह तो यह बताई जा रही थी कि नीतीश कुमार नहीं चाहते थे कि उन्हें किसी भी हाल में परिवारवाद के आरोप का सामना करना पड़े। दूसरी तरफ जदयू के जो नेता चाहते थे कि निशांत कुमार राजनीति में आए उनका यह तर्क था कि निशांत युवा है और पार्टी को संभाल सकते हैं।
एक दिलचस्प बात यह भी कही जाती रही कि नीतीश कुमार को हटाने के पीछे शराब बंदी के खिलाफ रहने वाले नेता और शराब कारोबार में लगी लॉबी भी है। किसके साथ यह भी चर्चा रही कि यूजीसी की कैंपस गाइडलाइन के खिलाफ रहने वाला स्वर्ण वर्ग भी भारत की जनता पार्टी पर यह दबाव बना रहा था कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाए।
इस चर्चा के पीछे दिलचस्प बात यह है कि जदयू का एक धड़ा तो इस बात के लिए कतई तैयार नहीं था लेकिन औपचारिक रूप से उसकी तरफ से इसका खंडन भी नहीं आ रहा था। चूंकि नीतीश कुमार की सेहत को सही नहीं माना जा रहा है इसलिए सीधे उनसे किसी बयान की उम्मीद भी किसी को नहीं थी। ऐसे में जदयू के वरिष्ठ नेता और मंत्री विजय कुमार चौधरी का यह बयान 4 मार्च को जरूर आया कि इस पर बातचीत चल रही है लेकिन अंतिम फैसला नीतीश कुमार को करना है।
राजनीतिक विश्लेषक इस बात की भी चर्चा कर रहे थे कि क्या वाकई नीतीश कुमार का निर्णय अंतिम निर्णय होगा या जो फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी करेगी वह उसे मानने को मजबूर किए जाएंगे। आखिरकार यह माना जाएगा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ही अपनी बात मनवाने में कामयाब रही।
इस पूरी चर्चा की अहम बात यही थी कि क्या नीतीश कुमार इस हालत में हैं या उन्हें इतनी मोहलत और छूट मिली हुई है कि वह इस बारे में फैसला खुद कर सकें? यह बात तो सबको पता है कि नीतीश कुमार भले ही अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष हों, लेकिन वह कुछ ऐसे नेताओं के प्रभाव और दबाव में रहते हैं जिनका भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा झुकाव माना जाता है। इनमें उनके राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का नाम सबसे ऊपर है जो पहले भारतीय जनता पार्टी में ही हुआ करते थे। इसके अलावा मंत्री और पूर्व जदयू अध्यक्ष ललन सिंह और कांग्रेस छोड़कर 2015 में नीतीश कुमार के साथ आए मंत्री अशोक चौधरी का नाम लिया जाता है। इसके अलावा विजय कुमार चौधरी को भी इसी विचारधारा का माना जाता है।

दूसरी तरफ मनीष कुमार वर्मा, मंत्री श्रवण कुमार और दूसरे कुछ ऐसे नेता जो खुलकर नहीं बोलते, उनके बारे में यह कहा जा रहा है कि वह इस बात के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे कि नीतीश कुमार को बिहार के मुख्यमंत्री पद छोड़ना चाहिए और राज्यसभा जाना चाहिए। हालांकि नीतीश कुमार के इस धड़े का भी यह मानना था कि अभी नीतीश कुमार नहीं जाएंगे लेकिन वह भी यह समझते थे कि आज नहीं तो कल नीतीश कुमार को गद्दी छोड़नी पड़ेगी।

जेडीयू का प्रदर्शन

लेकिन इस मामले में जदयू के अंदर कितना उथल-पुथल था इस बात का अंदाजा इससे लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने तो अपने उम्मीदवारों की घोषणा दो-तीन दिन पहले कर दी थी लेकिन जदयू के उम्मीदवारों की लिस्ट नामांकन वाले दिन यानी 5 मार्च को सामने आई। जदयू के नेता कहते रहे कि उनके सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार को फैसला लेना है लेकिन इससे यह तो साबित हो गया कि नीतीश कुमार के लिए भी यह फैसला लेना शायद उनके राजनीतिक करियर का सबसे मुश्किल काम रहा। इसके अलावा जनता दल यूनाइटेड के आम कार्यकर्ता यह समझते रहे कि यह दरअसल भारत की जनता पार्टी की साजिश है इसीलिए इस दौरान उन्होंने प्रदर्शन भी किया।

जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से 2013 में पहली बार अपना रास्ता अलग किया था, उसके बाद उन्होंने बीजेपी को किसी न किसी तरह छकाए रखा। जब वह बीजेपी के साथ हुए तो मुख्यमंत्री की शर्त पर उसके साथ रहे और जब उससे अलग भी हुए तब भी मुख्यमंत्री बने रहे। अब वह दौर खत्म हो गया।
बिहार से और खबरें

राज्यसभा चुनाव की स्थिति

बिहार से राज्यसभा की पांच सीटों के लिए नामांकन गुरुवार को अंतिम दिन है, जबकि मतदान और मतगणना 16 मार्च को होगी। एनडीए गठबंधन की ओर से बीजेपी ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और बिहार इकाई के महासचिव शिवेश कुमार को उम्मीदवार बनाया है। जेडीयू की ओर से केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर अपना नामांकन दाखिल करेंगे, जबकि नीतीश कुमार दूसरे उम्मीदवार के रूप में सामने आ रहे हैं। एनडीए सहयोगी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी गठबंधन के समर्थन से चुनाव लड़ रहे हैं। विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) पांचवीं सीट के लिए अपना उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है।

नीतीश कुमार यदि राज्यसभा पहुंचते हैं, तो वे बिहार विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा—चारों सदनों का प्रतिनिधित्व करने वाले दुर्लभ नेता बन जाएंगे। यह कदम बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी और गठबंधन की रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है।