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भारत भूषण, मीना कुमारी और भगवान दादा।

गुमनामी का दर्द: कभी करोड़ों दिलों पर राज करने वाले सितारे कहाँ खो जाते हैं?

फ़िल्म इंडस्ट्री वास्तव में निर्मम और कठोर है। यह दमकती प्रतिभाओं को दोनों हाथों से थामती है, नाम, शोहरत, पैसा आदि सारी चीजों से नवाज़ती है। उनकी प्रतिमा गढ़ती है। किंवदंतियाँ आरंभ हो जाती हैं और फिर देखते-देखते वही इंडस्ट्री उसी प्रतिमा का विसर्जन कर देती है। प्रतिमाएँ गढ़ने और उनके विसर्जन का अनवरत सिलसिला चलता रहता है।
अजय ब्रह्मात्मज

जन्मदिन पर बधाई संदेश के साथ आए पुष्पगुच्छ की संख्या की बढ़त और घटत से ज़ाहिर होने लगता है कि लोकप्रिय सितारे की चमक बढ़ रही है या घट रही है। शाहरुख ख़ान ने लोकप्रियता के शीर्ष के दिनों में एक इंटरव्यू में कहा था कि मैं इंडस्ट्री पहचान हासिल करने के बाद हर साल पुष्पगुच्छ की बढ़ती संख्या देखकर ख़ुश होता रहा हूँ। एक समय ऐसा भी आया कि संख्या तेज़ी से घटी, लेकिन फिर से फ़िल्मों के हिट होने पर सब ठीक हो गया। इन दिनों पॉपुलर स्टार की लोकप्रियता का पैमाना सोशल मीडिया पर उसके फॉलोवर होते हैं। 

लोकप्रियता के केंद्र में आने और नेपथ्य में जाकर गुम हो जाने का चक्र चलता रहता है। आए दिन ख़बरें आती रहती हैं कि बीते दिनों के फलाँ मशहूर कलाकार या तकनीशियन इन दिनों बदहाल ज़िंदगी जी रहे हैं। उनकी मदद में इंडस्ट्री और प्रशंसकों के हाथ आगे बढ़ जाते हैं। हाल ही में वनराज भाटिया का मामला सुर्खियों में था।

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फ़िल्म इंडस्ट्री की कठोर सच्चाई यही है कि यहाँ हर देदीप्यमान सितारे को एक दिन धूमिल हो कर गुमनाम (बुझ) हो जाना पड़ता है। नए चेहरे आते हैं। सारी गतिविधियाँ उनके इर्द-गिर्द होने लगती हैं। यह चक्र बना रहता है। बीसवीं सदी में अनेक सितारों और निर्देशकों के ऐसे क़िस्से मिल जाएँगे, जिनमें उनकी ग़रीबी और गुमनामी की कहानियाँ हैं। उम्र बढ़ने के साथ फ़िल्में मिलनी बंद हो जाती हैं...। फिर गहमागहमी कम होती है तो मेल-मुलाक़ात का सिलसिला थम जाता है। धीरे-धीरे यह स्थिति आ जाती है कि परिवार और चंद परिचितों के अलावा कोई नामलेवा नहीं होता है। अचानक बीमारी या मौत की ख़बर आती है और इंडस्ट्री को ख़बर होती है। फिर अफसोस और शर्मिंदगी की बातें होती हैं। कुछ दिनों के शोर के बाद सब कुछ रुक जाता है। फ़िल्म इंडस्ट्री बदस्तूर चलने लगती है।

अतीत में भारत भूषण, मीना कुमारी और भगवान दादा के बारे में मशहूर है कि वे ग़रीबी में मरे। कुछ कलाकारों और मशहूर फ़िल्मी हस्तियों का अंतिम संस्कार नगरपालिका के कर्मचारियों ने किया। उनके नाम लेने की ज़रूरत नहीं है। हम देखते हैं कि बीते दिनों के मशहूर सितारे कैसे मुंबई शहर में गुमनामी की ज़िंदगी जी रहे हैं। कुछ ने बंगले बेचे, आवास बदले और सुदूर इलाक़ों में रहने चले गए। 

दर्शकों और प्रशंसकों की याददाश्त इतनी कमज़ोर है कि उन्हें याद भी नहीं रहता कि कभी जिन पर जान छिड़कते थे और जिनकी फ़िल्में देखने के लिए लालायित रहते थे, वे अभी कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं और किस हाल में हैं?

अगर धर्मेंद्र इंस्टाग्राम पर अपनी तसवीरें और बातें शेयर नहीं करें तो शायद ही किसी को याद आएँ। सुपरस्टार राजेश खन्ना का अवसान और हश्र इसी इंडस्ट्री में देखा। कभी जिनकी तूती बोलती थी, वे लाचारी कराहते नज़र आते हैं। अपनी बेचारगी छिपा नहीं पाते। अतीत में तो अनेक सितारों को बाद के दिनों में एक्स्ट्रा (जूनियर आर्टिस्ट) का काम करना पड़ा। सुलोचना, डी बिलमोरिया, भारत भूषण जैसे अनेक नाम हैं।

कलाकार, निर्देशक, लेखक, गीतकार, संगीतकार और निर्माता कोई भी अछूता नहीं रहा। जुहू में बी आर चोपड़ा के बंगले में कभी चहल-पहल रहती थी। वहाँ की छीजती भीड़ देख चुके लोग गवाह हैं कि कैसे अंतिम दिनों में बी आर चोपड़ा मिलने और बातें करने के लिए अपने डबिंग स्टूडियो के चक्कर लगा लिया करते थे। आर के स्टूडियो में रणधीर कपूर खाली बैठे रहते थे।

सुभाष घई को तो ‘विसलिंग वुड’ की व्यस्तता मिल गई है, लेकिन उनके समकालीन जेपी दत्ता और राजकुमार संतोषी के पास न तो फ़िल्में हैं और न स्टार। अभी प्रतिभाओं का झुंड यशराज फ़िल्म्स और धर्मा प्रोडक्शन के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। कल किसी और प्रोडक्शन हाउस की सक्रियता बढ़ेगी और कोई नया सितारा फ़िल्मी आकाश पर उभरेगा।

फ़िल्म इंडस्ट्री वास्तव में निर्मम और कठोर है। यह दमकती प्रतिभाओं को दोनों हाथों से थामती है, नाम, शोहरत, पैसा आदि सारी चीजों से नवाज़ती है। उनकी प्रतिमा गढ़ती है। किंवदंतियाँ आरंभ हो जाती हैं और फिर देखते-देखते वही इंडस्ट्री उसी प्रतिमा का विसर्जन कर देती है। प्रतिमाएँ गढ़ने और उनके विसर्जन का अनवरत सिलसिला चलता रहता है। यह इंडस्ट्री दुनिया एक हाथ से देती है और सौ हाथों से ले लेती है। टीवी शो और पुरस्कार समारोह में गए दिनों के सितारों, गायकों और संगीतकारों को बुलाकर औपचारिक सम्मान दिया जाता है। कुछ पैसे भी मिल जाते हैं। बुजुर्ग कलाकार ऐसे निमंत्रण की प्रतीक्षा में रहते हैं, जहाँ से अपनी पुरानी गरिमा और ऐश्वर्या का बखान कर सकें।

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21वीं सदी में स्थिति बदली है। कमाई और लोकप्रियता के दिनों में कलाकार भविष्य के लिए ज़रूरी निवेश करने लगे हैं। अब उनका बुढ़ापा पहले की तरह फटेहाली में नहीं गुजरता। अगर बेटे-बेटियों ने कुछ बड़ा नहीं किया हो तो भी सामाजिक बदनामी के डर से उन्हें घर में ज़रूरी सुविधाएँ देकर संभाले रहते हैं। कलाकारों और तकनीशियनों के संगठन मज़बूत हुए हैं। वहाँ से ज़रूरतमंद को पेंशन और आर्थिक मदद मिल जाती है।

कोविड-19 की महामारी ने तो सक्रिय कलाकारों और तकनीशियनों को भी घर पर बिठा दिया है। इस दौर में उनकी मजबूरी और उभर कर सामने आई है। असंगठित फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए वक़्त बुरा गुज़र रहा है। ‘न्यू नॉर्मल’ में अनेक चेहरे ग़ायब मिलेंगे।

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