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जुमलों से नहीं, ठोस काम करने से रुकेंगे रेल हादसे


जिस देश में मानव रहित क्रॉसिंग पर गेट मैन तक न हो, वहां महंगे बुलेट ट्रेन की क्या ज़रूरत है? सवाल उठा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह

रेलवे की हर दुर्घटना कुछ दिनों के लिए हमें हमेशा से अनुत्तरित चले आ रहे सवालों पर एक बार फिर अनुत्तरित रह जाने के लिए कुरेद भर जाती है और कुछ भी नहीं बदलता।

समाज लगातार हर संवेदनशील सवाल पर "चलता है" कि तर्ज़ पकड़ता जा रहा है। रेलवे दुर्घटनाओं पर हमारे रवैये में यही कुआदत सामने आती है। 

अमृतसर में क्या हुआ? 

रेलवे जमाने से जीपीएस नियंत्रित होने की बात कह रहा है कुछ फाइलें चल भी रही होंगी पर वैसे ही जैसे दूसरीं चल रही हैं। अभी भी पन्द्रह हजार से ज्यादा बिना कर्मचारी वाली रेलवे क्रोसिंग्स हमारे 65000 किलोमीटर लंबे ट्रैक पर विद्यमान हैं।
2013 की खुद रेलवे की रिपोर्ट बताती है कि करीब 15000 लोग हर साल गलत तरीके से रेल लाइन क्रॉस करने के चक्कर में कट कर मर जाते हैं।
बीते बरस यह संख्या बढ़कर 25000 पर कर गयी थी। हम लंबे समय से आम इंसान के लिए जनरल डिब्बे बढ़ाने का काम लगभग बंद कर चुके हैं। जो बचे हैं उनमें इंसान बोरियों से भी बुरे ढंग से खुद ही खुद को ठूंस कर यात्रा करते हैं । आर्थिक प्रबंधन की सलाह पर रेलवे, जो सबसे बड़ा सरकारी उद्यम है कर्मचारियों मैं हर साल कटौती करता आ रहा है। लाइनमैन अब गुजरे जमाने की वस्तु हैं। 

बुलेट ट्रेन

बीजेपी ने अप्रैल2014 के अपने घोषणापत्र में देश के चार बड़े महानगरों दिल्ली मुम्बई कोलकाता चेन्नई को हाई स्पीड रेल नेटवर्क से जोड़ने की बात कही थी , उसका क्या हुआ? इसके उलट मुम्बई से अहमदाबाद की बुलेट ट्रेन के एक लाख करोड़ रुपए के कर्ज़े वाले प्रोजेक्ट का एलान हो गया।2012 में सरकार की एक दूसरी रिपोर्ट में सलाह थी कि रेलवे ट्रैक्स की फेंसिंग ,19,000  किलोमीटर ट्रैक के बदलाव और ट्रैक मेंटेनेन्स के रखरखाव के लिए तत्काल करीब 130 बिलियन डॉलर की रकम का बंदोबस्त किया जाय । इस दिशा में अब तक कुछ नहीं हुआ है। ये 19,000  किलोमीटर ट्रैक वह हैं जिन पर करीब 40% ट्रैफिक है।

रेल लाइनों की बुरी हालत 

वर्ष 2000 के बाद से अब तक हमारे यहां करीब 100 बड़ी रेलवे दुर्घटनाएं हज़ारों लोगों की जान ले चुकी हैं । प्रधानमंत्री जी यह जुमलों से नहीं हो सकता इसके लिए गंभीर और समयबद्ध काम जरूरी है।
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