दिल्ली की एक अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इनके अलावा चार अन्य को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। अदालत ने हत्या को बेहद क्रूर और अमानवीय बताते हुए कहा कि पीड़ित के शव को 'जानवर की तरह घसीटकर नाले में फेंक दिया गया था।' हालाँकि अभियोजन पक्ष ने इस मामले में दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग की थी, लेकिन अदालत ने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर होने के बावजूद दोषियों को सुधार की संभावना से पूरी तरह बाहर नहीं माना जा सकता है। इसलिए उन्हें मौत की सजा देने के बजाय आजीवन कारावास की सजा दी गई।

अदालत ने हत्या को बताया बेहद बर्बर

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने अपने फ़ैसले में कहा कि यह अपराध सांप्रदायिक हिंसा के दौरान अत्यंत क्रूर तरीके से किया गया। अदालत ने कहा, 'हत्या इतनी बर्बरता से की गई कि उसे देखकर घृणा होती है। मृतक के शव को जानवर की तरह घसीटा गया और बाद में नाले में फेंक दिया गया।' कोर्ट ने कहा कि दोषियों ने सजा के दौरान यह दलील दी कि वे अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य हैं, लेकिन अपराध की गंभीरता इस तर्क से कहीं अधिक बड़ी है।
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अदालत ने माना कि हत्या अत्यंत नृशंस थी, लेकिन भारतीय कानून के अनुसार फांसी की सजा केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम' मामलों में ही दी जाती है। न्यायाधीश ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि दोषी ऐसे व्यक्ति हैं जिनमें सुधार की कोई संभावना नहीं है या जो भविष्य में समाज के लिए स्थायी ख़तरा बने रहेंगे। फ़ैसले में कहा गया, 'मृत्युदंड अंतिम विकल्प होता है। दोषियों को सुधारा जा सकता है और वे कानून के अनुसार जीवन जी सकते हैं।'

अभियोजन ने मांगी थी मौत की सजा

सजा पर सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडेय ने अदालत से सभी दोषियों को फाँसी देने की मांग की थी। अभियोजन का कहना था कि जिस तरह से हत्या की गई, वह अत्यंत जघन्य थी और दोषियों को सबसे कठोर सजा मिलनी चाहिए।

ताहिर हुसैन की ओर से पेश वकीलों ने अदालत से कहा कि इस मामले में मौत की सजा नहीं दी जा सकती क्योंकि यह 'दुर्लभ से दुर्लभतम' श्रेणी में नहीं आता। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मुक़दमे के दौरान किसी आपराधिक साजिश का ठोस सबूत पेश नहीं किया गया।

बचाव पक्ष की ओर से यह भी दलील दी गई कि ताहिर हुसैन का जेल में आचरण अच्छा रहा है। केवल चोटों की संख्या के आधार पर फाँसी की सजा नहीं दी जा सकती है। बचाव पक्ष ने कहा है कि वह इस फ़ैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देगा।

क्या है अंकित शर्मा हत्याकांड?

यह मामला 25 फरवरी 2020 का है जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए और एनआरसी को लेकर हिंसा भड़क गई थी। इसी दौरान आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा अपने घर से सामान लेने निकले थे, लेकिन वापस नहीं लौटे। अगले दिन उनका शव चांद बाग इलाके के एक नाले से बरामद हुआ। पुलिस के अनुसार अंकित शर्मा को भीड़ ने पकड़ लिया था। उन पर 51 बार चाकू से वार किए गए। हत्या के बाद शव को नाले में फेंक दिया गया। दिल्ली दंगे की इन हिंसा में कुल 53 लोगों की मौत हुई थी।
26 फरवरी 2020 को अंकित शर्मा के पिता रविंद्र कुमार की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि ताहिर हुसैन की इमारत से दंगाई हमला कर रहे थे और वहीं से इस पूरी घटना को अंजाम दिया गया।

अदालत ने ताहिर हुसैन को हत्या, दंगा और अन्य गंभीर धाराओं में दोषी ठहराया। हालाँकि उन्हें आपराधिक साजिश के आरोप से बरी कर दिया गया।

सजा सुनाते समय अदालत ने कहा कि पीड़ित को केवल उसके धर्म की वजह से हिंसक भीड़ ने निशाना बनाया। हमला बेहद नजदीक से और लगातार किया गया। हत्या के बाद भी शव के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। यह अपराध कानून और मानव जीवन के प्रति पूरी तरह उपेक्षा को दर्शाता है।
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अदालत ने कहा कि अपराध की क्रूरता बेहद गंभीर है, लेकिन फाँसी देने से पहले यह साबित होना जरूरी है कि दोषियों के सुधरने की कोई संभावना नहीं बची है। इस मामले में ऐसा साबित नहीं हो पाया।

अदालत के फैसले के बाद ताहिर हुसैन और अन्य दोषियों को आजीवन कारावास की सजा भुगतनी होगी। वहीं बचाव पक्ष ने संकेत दिया है कि वह इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील करेगा। दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष भी अदालत के फैसले का अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी रणनीति तय करेगा।