अरविंद केजरीवाल द्वारा आबकारी केस की सुनवाई से हटाने के लिए लगातार दबाव बनाए जाने के बीच आख़िरकार जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अब खुद को उस केस से हटा लिया है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने केजरीवाल और अन्य आप नेताओं पर एक नया मुक़दमा शुरू कर दिया। जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक, संजय सिंह, विनय मिश्रा और सौरभ भारद्वाज समेत अन्य नेताओं पर सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाने का आरोप लगाते हुए अवमानना का केस शुरू किया है।

जस्टिस शर्मा ने क्या कारण बताए?

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि अगर वे आबकारी मामले की सुनवाई जारी रखती हैं तो केजरीवाल और अन्य लोग सोच सकते हैं कि उनके मन में उनके प्रति नाराजगी है। यही कारण बताते हुए उन्होंने यह केस दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया। उन्होंने साफ़ कहा, 'यह केस इसलिए ट्रांसफर नहीं किया गया क्योंकि केजरीवाल और अन्य लोग मुझे हटाए जाने की मांग कर रहे थे। मैंने पहले उनकी रिक्यूजल याचिका खारिज कर दी थी। लेकिन अब अवमानना केस शुरू होने के बाद स्थिति बदल गई है।' जस्टिस शर्मा ने कहा, 'संवैधानिक साहस का कभी-कभी व्यक्तिगत मूल्य चुकाना पड़ता है।'
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लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस शर्मा ने कहा, "मैं अपने 'रिक्यूज़ल' के आदेश पर कायम हूँ। मैं इसमें एक भी शब्द नहीं बदलूँगी... मैंने इस संस्था और खुद के लिए आवाज़ उठाई है।"

जज ने आगे कहा, "क्योंकि, कानून के तहत, जिस जज के खिलाफ अवमानना ​​की कार्यवाही चल रही हो, वह मुख्य मामले की सुनवाई नहीं कर सकता... मेरा 'रिक्यूज़ल' आदेश जैसा है, वैसा ही रहेगा, लेकिन मैं इस मामले को दूसरी अदालत में भेजूँगी। मैं इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के सामने पेश करूँगी, ताकि इस पर किसी दूसरे जज द्वारा सुनवाई की जा सके।"

जस्टिस शर्मा की नाराज़गी क्या?

जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि केजरीवाल अदालत के अंदर तो सम्मान दिखाते हैं, लेकिन अदालत के बाहर उन्होंने उनके ख़िलाफ़ समन्वित अभियान चलाया। उनके वीडियो को एडिट करके फैलाया गया। 

जस्टिस शर्मा ने कहा कि एक कॉलेज कार्यक्रम के वीडियो को काट-छांटकर आरएसएस इवेंट बता दिया गया। उन्होंने कहा कि उनके बच्चों को भी मामले में घसीटा गया, जबकि वे इस केस से बिल्कुल जुड़े नहीं थे।

जस्टिस शर्मा ने कहा कि पत्र लिखे गए, वीडियो वायरल किए गए और सोशल मीडिया पर जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए। उन्होंने कहा, 'यह सिर्फ मेरे खिलाफ नहीं, पूरी न्याय व्यवस्था के खिलाफ बदनामी का अभियान था। अगर किसी को जज पसंद नहीं तो वह जज पर पक्षपात का आरोप लगा दे, वीडियो एडिट कर दे और सोशल मीडिया पर फैला दे- तो यह अराजकता होगी।'
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सॉलिसिटर जनरल का अनुरोध, जज ने मना किया

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस शर्मा से अनुरोध किया कि वे आबकारी मामले की सुनवाई जारी रखें। उन्होंने कहा कि रिक्यूजल मांगने वालों को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए था, न कि सोशल मीडिया पर अभियान चलाना चाहिए। लेकिन जस्टिस शर्मा ने कहा, 'मैं जानती हूं कि मेरे सामने किस तरह का मुवक्किल है। अगर मैं सुनवाई करती रही तो वे फिर कहेंगे कि मैं उनके खिलाफ हूं।'

पहले क्या हुआ था?

20 अप्रैल को जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल और अन्य की रिक्यूजल याचिका खारिज कर दी थी। उन्होंने कहा था कि राजनेता न्यायपालिका में अविश्वास के बीज नहीं बो सकते। इसके बाद आप नेताओं ने अदालती कार्यवाही का बहिष्कार करने का ऐलान किया। सोशल मीडिया पर जज के परिवार और उनकी निष्पक्षता पर हमले किए गए।

आबकारी नीति मामला क्या है?

यह मामला 2021-22 की दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा है। सीबीआई और ईडी का आरोप है कि आप नेताओं ने शराब नीति में बदलाव करके कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाया और बदले में रिश्वत ली। फरवरी 2025 में ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल, सिसोदिया समेत 23 लोगों को इस मामले में बरी कर दिया था। सीबीआई ने उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जो अब दूसरी बेंच के पास जाएगा।

जस्टिस शर्मा का संदेश क्या

जस्टिस शर्मा ने कहा, 'न्यायपालिका राजनीतिक शक्ति पर नहीं, जनता के विश्वास पर टिकी है। न्यायाधीश आलोचना सह सकते हैं, लेकिन यह आलोचना नहीं बल्कि विलिफिकेशन का अभियान था। परिवार को घसीटना और एडिटेड वीडियो चलाना मनोवैज्ञानिक दबाव है।' बहरहाल, अब अवमानना मामले की सुनवाई होगी और आबकारी नीति का केस दूसरे जज के पास जाएगा। इस घटनाक्रम से न्यायपालिका बनाम राजनेता की बहस एक बार फिर तेज हो गई है।