भारत के प्राचीन चरित्रों में कृष्ण का चरित्र सबसे ज़्यादा विविधतापूर्ण है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं क्योंकि राम ने जिन मर्यादाओं की स्थापना की उसे कभी नहीं तोड़ा। कृष्ण मर्यादा स्थापित करते हैं और उसे तोड़ते भी हैं। एक बार नहीं, बार बार। इसलिए वो मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं। वे महाभारत के युद्ध में शस्त्र नहीं उठाने का प्रण करते हैं और हथियार उठा कर उसे तोड़ भी देते हैं। कृष्ण अपने अधिकारों के लिए बार बार युद्ध लड़ते हैं। कंस से भी, शिशुपाल से भी और महाभारत में केंद्रीय युद्ध रणनीतिकार तो हैं ही। वो योगी राज भी हैं और रास भी रचाते हैं। रामलीला की तरह, एक कृष्ण लीला में कृष्ण को समेटना आसान नहीं है। इसलिए इन सबको समेटती एक नृत्य नाटिका में इन्हें देखना एक अलग तरह का अनुभव है।
दिल्ली का श्रीराम भारतीय कला केंद्र पिछले पचास वर्षों से एक नृत्य नाटिका या डांस बैले में कृष्ण के चरित्रों की विविधता को समेटने का प्रयास कर रहा है। हर बार नए रूप रंग में। इस साल पचासवीं प्रस्तुति कई मायनों में विशिष्ट है। इस बार एल ई डी स्क्रीन और डिजिटल बैकड्रॉप के साथ हाथ से बने सेट, लाइव स्टेज डिज़ाइन, इन-हाउस हैंडक्राफ्टेड कॉस्ट्यूम और ज्वेलरी पर जोर दिखाई देती है। नए युवा कलाकारों के समावेश से प्रस्तुति ताजगी से भर गयी है। पारंपरिक शिल्प कौशल, लाइट डिज़ाइन और क्लासिकल डांस-म्यूजिक प्रस्तुति को भव्यता प्रदान करते हैं। 50वीं प्रस्तुति में हस्तशिल्प और पारंपरिक दृश्य भाषा पर विशेष फोकस भी दिखाई देता है। निर्देशक शोभा दीपक सिंह ने कास्ट्यूम डिज़ाइन में भी नया प्रयोग किया है।
ताज़ा ख़बरें

इस नृत्य नाटिका की अवधारणा या प्रारंभिक कल्पना 1975-76 में सुमित्रा चरत राम ने “कृष्ण अवतार” के रूप में किया था। शोभा दीपक सिंह पिछले कई सालों से उसमे नए रंग भरकर उसे सम सामयिक बना कर प्रस्तुत करने में महारत हासिल कर चुकी हैं। शशिधरन नायर ने कोरियोग्राफी में भारतीय शास्त्रीय व लोक नृत्य शैलियों जैसे मयूरभंज छऊ, कलारीपयट्टू, कथक आदि के फ्यूज़न से पूरी प्रस्तुति को जीवंत बनाये रखा है। मुख्य पात्र कृष्ण की भूमिका में राज कुमार शर्मा कृष्ण के अलग-अलग उम्र को अपने नृत्य भाव से जीवंत बना देते हैं। लेकिन इस बार चार साल की संस्कृति ने बाल कृष्ण की भूमिका में दर्शकों को अचंभित कर दिया। हर वर्ष जन्माष्टमी के आसपास कमानी ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में इसे कुछ न कुछ बदलाव के साथ पेश किया जाता है।
कृष्ण के जन्म से लेकर महाभारत के गीता उपदेश और मोक्ष तक की कथा में भक्ति शैली के संगीत का आनंद अलग ही होता है। ब्रज भाषा में सूरदास के सूर सागर के गीतों के साथ आधुनिक हिंदी कवि रामधारी सिंह दिनकर की रचना रश्मि रथी का प्रयोग कथा के प्रवाह को बनाये रखता है।
बाल कृष्ण की करुणा, तरुण कृष्ण के प्रेम, युवा कृष्ण की कर्तव्य निष्ठा और महाभारत के कृष्ण की दिव्यता को एक साथ मंच पर प्रस्तुत करना आसान नहीं है। लेकिन निर्देशक ने अनेक रूपकों के ज़रिए उसे समेटने की सफल कोशिश की है। मनुष्य के अवतार में राम को सम्पूर्ण नहीं माना जा सकता है। राम, मनुष्य के सिर्फ मर्यादित स्वरूप के प्रतीक हैं लेकिन कृष्ण एक सम्पूर्ण मनुष्य अवतार हैं। कृष्ण के चरित्र में मनुष्य की मनुष्य की शक्ति और कमजोरियां, प्रेम और संगीत, स्वाभिमान और समझौता सब कुछ है। और शोभा दीपक सिंह का “कृष्ण” मनुष्य जीवन के इन सभी रंगों से साक्षात्कार कराता है।