महज़ 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में 30 साल तक मुक़दमा झेलने वाले व्यक्ति को अदालत ने अब निर्दोष घोषित किया, लेकिन इंसाफ़ मिलने के अगले ही दिन उनकी मौत हो गई। न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल।
न्याय की एक मिसाल जो सिहरन पैदा कर दे! महज 20 रुपये की रिश्वत का आरोप। क़रीब 30 साल मुक़दमा झेला। अब अदालत से निर्दोष घोषित। लेकिन यह जीत सिर्फ एक पल की मेहमान साबित हुई। अगले ही दिन उनकी मौत हो गई। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की क्रूर सच्चाई का है!
यह असल कहानी गुजरात के एक पूर्व पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति की है। बाबूभाई प्रजापति उस समय अहमदाबाद के वेजलपुर इलाके में पुलिस कांस्टेबल थे। 1996 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने एक ट्रक ड्राइवर से 20 रुपये की रिश्वत ली। यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज हुआ।
1997 में उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई। 2002 में आरोप तय हुए। 2003 से गवाहों की सुनवाई शुरू हुई और 2004 में सेशन कोर्ट ने उन्हें 4 साल की सजा सुनाई। साथ में 3000 रुपये जुर्माना भी लगाया गया। तीन अन्य कांस्टेबलों के साथ यह केस चला।
बाबूभाई ने सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में अपील की। यह अपील 22 साल तक लंबित रही। आखिरकार 4 फरवरी 2026 को जस्टिस एस.वी. पिंटो ने फैसला सुनाया कि बाबूभाई और बाकी दो कांस्टेबल निर्दोष हैं। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे और अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका।
निर्दोष साबित होने के बाद क्या कहा?
फैसले के बाद बाबूभाई अपने वकील नितिन गांधी के ऑफिस गए। वह बहुत खुश थे। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने वकील से कहा, 'मेरी जिंदगी से कलंक हट गया। अब भगवान मुझे बुला ले, तो भी मुझे कोई दुख नहीं होगा।' वकील ने उन्हें बताया कि सरकारी नौकरी के फायदे, पेंशन आदि के लिए आवेदन करें। इसके बाद बाबूभाई घर लौट गए। अगले दिन सुबह वकील ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, तो पता चला कि दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। वह 64 साल के थे। मौत प्राकृतिक कारणों से हुई।
वकील ने क्या कहा?
एनडीटीवी के अनुसार वकील नितिन गांधी ने बताया, 'कल जब वे ऑफिस आए थे, बहुत खुश थे। उन्हें लगा कि आखिरकार न्याय मिल गया। मैंने कहा था कि सरकारी लाभ के लिए अप्लाई करें। अगले दिन फोन किया तो पता चला दिल का दौरा पड़ गया।' उन्होंने कहा कि बाबूभाई को थोड़ा और जीने का मौक़ा मिलता तो कितना अच्छा होता।यह केस क्यों अहम है?
यह मामला सिर्फ़ 20 रुपये का था, लेकिन इसमें 30 साल लग गए। भारतीय अदालतों में अपीलों की लंबी सुनवाई की वजह से निर्दोष लोग सालों तक सजा काटते हैं या जिंदगी बर्बाद होती है। बाबूभाई की मौत ने न्याय में देरी के मुद्दे को फिर से उजागर किया है। कई लोग कह रहे हैं कि ऐसे मामलों में तेज न्याय और मुआवजा मिलना चाहिए।
बाबूभाई प्रजापति की यह असल कहानी हॉलीवुड की शॉशैंक रिडेम्पशन फिल्म जैसी लगती है, जहां निर्दोष व्यक्ति लंबे समय बाद आजाद होता है। लेकिन असल जिंदगी में अंत दुखद रहा।