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ट्रंप दौरा: झुग्गी हटाओ, दीवार बनाकर ग़रीबी छुपाओ, क्या यही गुजरात मॉडल?

आख़िर प्रधानमंत्री मोदी का गुजरात मॉडल क्या है? ग़रीबी छुपाना? या ग़रीबी दूर नहीं कर ग़रीबों को ही हटा देना? ऐसा नहीं है तो अहमदाबाद में झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने के लिए लोगों को नोटिस क्यों दिया गया है? झुग्गी-झोपड़ियों के आसपास दीवार खड़ी क्यों की जा रही है? क्या यही वह गुजरात मॉडल है जिसे प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप को दिखाना चाहते हैं? ट्रंप क़रीब एक हफ़्ते बाद यानी 24 जनवरी को गुजरात के दौरे पर आने वाले हैं। उनकी यात्रा से पहले ऐसी तैयारियाँ क्या इसलिए की जा रही हैं जिससे ऐसी तसवीर पेश की जा सके जो प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका में 'हाउडी मोदी' के दौरान 'सब अच्छा है' कहकर दिखायी थी?

अहमदाबाद में दीवार खड़ी करने का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ है कि अब ताज़ा मामला झुग्गी-झोपड़ी को हटाने का आया है। यह झुग्गी-झोपड़ी उस मोटेरा स्टेडियम के पास है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी 24 फ़रवरी को ट्रंप का स्वागत करेंगे। यह स्टेडियम नया-नया ही बन रहा है और पास की ही झुग्गी-झोपड़ी को हटाने के लिए 45 परिवारों को अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ने सोमवार को नोटिस दिया है।  'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार इसमें क़रीब 200 लोग रहते हैं जो निर्माण कार्य में काम करने वाले कामगार के रूप में पंजीकृत हैं। रिपोर्ट के अनुसार उन परिवारों का कहना है कि वे वहाँ क़रीब दो दशक से रह रहे हैं और 'नमस्ते ट्रंप' कार्यक्रम के लिए उन्हें हटने के लिए कह दिया गया है।

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रिपोर्ट के अनुसार, 22 वर्ष से वहाँ रहने का दावा करते हुए 35 वर्षीय तेजा मेदा ने कहा, 'नोटिस देने आए एएमसी अधिकारियों ने हमें कहा कि जितनी जल्द हो सके जगह खाली कर दो। उन्होंने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति मोटेरा स्टेडियम आ रहे हैं और वे चाहते हैं कि हम यहाँ से चले जाएँ।' मेदा ने कहा कि यहाँ रहने वाले सभी 300 रुपये प्रति दिन की दिहाड़ी पाते हैं। हालाँकि, नोटिस में कहा गया है कि यह अवैध क़ब्ज़े वाली ज़मीन एएमसी की है और यह टाउन प्लानिंग का हिस्सा है। सात दिनों के अंदर उन्हें खाली कर देने को कह दिया गया है। नोटिस पर तारीख़ 11 फ़रवरी 2020 दर्ज है और इस हिसाब से मंगलवार को आख़िरी दिन है। हालाँकि लोगों का कहना है कि उन्हें यह नोटिस सोमवार को दिया गया है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, नोटिसों पर दस्तख़त करने वाले अधिकारी असिस्टेंट टीडीओ किशोर वरना ने कहा कि इसका डोनॉल्ड ट्रंप की यात्रा और मोटेरा स्टेडियम से कुछ लेनादेना नहीं है और ये झुग्गी-झोपड़ी वालों ने अवैध क़ब्ज़ा किया था।

अधिकारी जो भी सफ़ाई दें, लेकिन इनको हटाने के समय को लेकर संदेह तो होता ही है। संदेह इसलिए भी कि जिस रास्ते से ट्रंप का कारवाँ गुजरेगा उस रास्ते पर झुग्गी-झोपड़ियों के पास दीवार भी खड़ी की जा रही है। कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि ये झुग्गी-झोपड़ियाँ ट्रंप को नहीं दिखाई दें। कुछ ऐसा ही उस समय भी किया गया था जब चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग अहमदाबाद आए थे। उस समय झोपड़ियों को ढकने के लिए सड़क किनारे हरे रंग के कपड़े लगाए गए थे। 

तो इस पर सवाल उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों किया जा रहा है? वह भी उस प्रदेश में जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ‘गुजरात मॉडल’ का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते हैं?

प्रधामनमंत्री मोदी ख़ुद गुजरात में क़रीब 13 साल तक मुख्यमंत्री रहे थे। इसके बाद भी उनकी ही पार्टी की सरकार रही और उनके क़रीबी ही मुख्यमंत्री रहे। प्रधानमंत्री मोदी जहाँ कहीं भी गए गुजरात मॉडल का सपना दिखाया। पूरे देश में गुजरात मॉडल लाने की बात की। तो आख़िर इस गुजरात मॉडल में क्या था? कैसा विकास हुआ? 

गुजरात में इतनी ग़रीबी क्यों?

पिछले साल जुलाई में राज्य सरकार ने विधानसभा में बताया था कि गुजरात में 30 लाख 94 हज़ार परिवार ग़रीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। अब यदि एक परिवार में पाँच सदस्य भी मान लिए जाएँ तो गुजरात में क़रीब डेढ़ करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। गुजरात की आबादी क़रीब साढ़े छह करोड़ है। इस हिसाब से क़रीब 20 फ़ीसदी लोग ग़रीबी रेखा से नीचे हुए। 

कुपोषण के मामले में भी स्थिति ख़राब है। सितंबर 2012 में मोदी ने वॉल स्ट्रीट जनरल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि यहाँ कुपोषण इसलिए है क्योंकि गुजराती शाकाहारी होते हैं और मध्य वर्ग सेहत से ज़्यादा अपने लुक्स और वेट को लेकर चिंतित रहता है। मोदी के इस तर्क की तब कड़ी आलोचना भी हुई थी।

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मोदी के कार्यकाल में साक्षरता

दिलचस्प है कि साक्षरता के मामले में 2001 में गुजरात 16वें नंबर पर था और 2012 में और बुरी स्थिति हो गई। तब गुजरात में 79.31 फ़ीसदी लोग साक्षर थे और इसके साथ ही गुजरात साक्षरता के मामले में देश में 18वें नंबर पर था। उस दौरान मोदी ही राज्य के मुख्यमंत्री थे।

मोदी के नेतृत्व में गुजरात ने शिक्षा पर राज्य के जीडीपी का महज 3.3 प्रतिशत खर्च किया। ऐसोचैम के मुताबिक़ वर्ष 2007-08 से 2013-14 के बीच, यानी मोदी शासन के दौरान गुजरात में शिक्षा पर किया गया खर्च बीस राज्यों में न्यूनतम था। इस सूची में अपने जीडीपी की 11 फ़ीसदी राशि खर्च करके बिहार और असम पहले स्थान पर रहे थे।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आँकड़े के मुताबिक़ गुजरात में 2016 में दलितों के प्रति अपराध दर 32.5 थी जबकि राष्ट्रीय अपराध दर 20.4 थी। इन अपराधों के ख़िलाफ़ गुजरात में कार्रवाई दर 4.7 थी जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 27 फ़ीसदी रही।

अब जब ऐसी स्थिति होगी तो फिर गुजरात मॉडल के लिए क्या दीवार की ज़रूरत नहीं पड़ेगी? खैर, ट्रंप की यात्रा से पहले यह सब तब हो रहा है जब प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पिछले कार्यकाल में 100 स्मार्ट सिटी का शिगूफ़ा छोड़ा था।

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