Sugar Prices Ethanol Controversy- चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच मोदी सरकार की E20 इथेनॉल नीति और चीनी संकट पर बहस तेज हो गई है। इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल हुआ। इससे चीनी का उत्पादन कम हुआ। कारोबारियों ने चीनी के दाम आसमान पर पहुंचा दिए।
चीनी महंगी हुई तो सरकार ने फौरन आयात किया लेकिन अपनी इथेनॉल नीति पर विचार करने को तैयार नहीं
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों और घरेलू उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंता के बीच केंद्र सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दे दी है। सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश में चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं और त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है।
वाणिज्य मंत्रालय के अधीन DGFT (विदेश व्यापार महानिदेशालय) ने अधिसूचना जारी कर कच्ची चीनी के लिए 10 लाख मीट्रिक टन का Tariff Rate Quota (TRQ) मंजूर किया है। इसके तहत 31 अक्टूबर 2026 तक बिना आयात शुल्क के कच्ची चीनी मंगाई जा सकेगी। सामान्य तौर पर भारत चीनी के आयात पर करीब 100 प्रतिशत शुल्क लगाता है।
क्यों करनी पड़ी चीनी की इंपोर्ट?
सरकार का फैसला घरेलू बाजार में चीनी की तेजी से बढ़ती कीमतों के बीच आया है। टेलीग्राफ इंडिया के मुताबिक 18 अगस्त तक देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत 52.30 रुपये प्रति किलो पहुंच गई थी, जो एक साल पहले 46.34 रुपये प्रति किलो थी। यानी सालाना आधार पर करीब 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं चीनी की औसत एक्स-मिल कीमत करीब 5,400-5,500 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह करीब 3,900 रुपये थी।रॉयटर्स के अनुसार पिछले दो महीनों में घरेलू चीनी की कीमतों में करीब 40 प्रतिशत तक उछाल आया है। कम उत्पादन और घटते शुरुआती स्टॉक ने बाजार में आपूर्ति को प्रभावित किया है। यही वजह है कि करीब एक दशक बाद भारत को दोबारा चीनी आयात की ओर जाना पड़ रहा है।
इस फैसले का समय भी महत्वपूर्ण है। अगस्त से नवंबर के बीच भारत में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ती है। मिठाई और खाद्य उद्योग में मांग बढ़ने के साथ कीमतों पर और दबाव पड़ने की आशंका थी।
पोर्ट आधारित रिफाइनरियों को भी फायदा
सरकार ने सिर्फ नई खेप मंगाने की अनुमति नहीं दी है, बल्कि पोर्ट आधारित चीनी रिफाइनरियों को भी इस व्यवस्था में शामिल किया है। ये रिफाइनरियां आम तौर पर कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात करके उसे रिफाइन करती हैं और तैयार चीनी का निर्यात करती हैं। अब इन रिफाइनरियों को आयातित कच्ची चीनी से तैयार की गई चीनी को घरेलू बाजार में बेचने की अनुमति मिल सकेगी। रॉयटर्स के मुताबिक इससे करीब 3 लाख टन चीनी तत्काल घरेलू बाजार में उपलब्ध हो सकती है। हालांकि ब्राजील से आने वाली नई खेप को भारत पहुंचने में करीब दो महीने लग सकते हैं, इसलिए आयात का बड़ा असर अक्टूबर के आसपास दिखाई देने की संभावना है।चीनी मिलों और रिफाइनरों को 21 से 28 अगस्त के बीच इस शुल्क-मुक्त आयात कोटे के लिए आवेदन करना है। जो आयातक 15 अक्टूबर तक आयात पूरा करने की प्रतिबद्धता देंगे, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी।
सिर्फ आयात ही नहीं, चीनी स्टॉक पर भी सरकार की नजर
चीनी की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार ने एक और कदम उठाया है। 10 टन से ज्यादा चीनी की मासिक खपत करने वाले थोक उपभोक्ताओं को अब सीमित मात्रा में ही स्टॉक रखने की अनुमति होगी। उनका स्टॉक 15 दिनों की खपत से अधिक नहीं हो सकेगा। यह व्यवस्था सितंबर से नवंबर के बीच लागू करने का फैसला किया गया है।सरकार का मकसद साफ है- बड़े खरीदारों द्वारा जरूरत से ज्यादा चीनी जमा करने और बाजार में कृत्रिम कमी पैदा होने की संभावना को रोकना तथा त्योहारों के दौरान उपभोक्ताओं को महंगी चीनी से राहत देना।
चीनी की कमी के पीछे इथेनॉल भी एक कारण हैः यहीं से यह फैसला भारत की E20 इथेनॉल नीति से जुड़ जाता है और सरकार के सामने एक बड़ी नीति-दुविधा खड़ी होती दिखाई देती है। भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण यानी E20 का लक्ष्य हासिल करने के लिए इथेनॉल उत्पादन को तेजी से बढ़ावा दिया है। चीनी उद्योग में गन्ने के रस और अलग-अलग प्रकार के मोलासिस से इथेनॉल बनाने की क्षमता बढ़ी है।
समस्या यह है कि एक ही गन्ने से चीनी और इथेनॉल- दोनों का उत्पादन किया जा सकता है। यदि गन्ने या उससे निकलने वाले ऐसे उत्पादों को इथेनॉल बनाने में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है जिनसे चीनी उत्पादन भी हो सकता है, तो बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा कम हो सकती है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक चालू वर्ष में चीनी मिलों ने करीब 30 लाख मीट्रिक टन चीनी, यानी कुल उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत, इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा। सरकार अब अगले सीजन में गन्ने के रस और B-heavy molasses से इथेनॉल बनाने पर रोक या सीमा लगाने पर विचार कर रही है ताकि ज्यादा गन्ना चीनी उत्पादन के लिए इस्तेमाल हो सके।
सरकार की संभावित रणनीति यह है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने से निकलने वाले C-heavy molasses को प्राथमिकता दी जाए। यह वह उप-उत्पाद है जिसमें अधिकांश चीनी पहले ही निकाल ली जाती है। इससे चीनी उत्पादन को अपेक्षाकृत कम नुकसान होगा।
इथेनॉल पर विपक्ष आक्रामक
चीनी के आयात के फैसले के बाद E20 नीति को लेकर राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि गन्ने से इथेनॉल बने की नीति के कारण चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई और अब सरकार को विदेशी मुद्रा खर्च करके चीनी आयात करनी पड़ रही है।
केजरीवाल का तर्क है कि सरकार ने कच्चे तेल के आयात पर विदेशी मुद्रा बचाने के लिए गन्ने से इथेनॉल बनाने को बढ़ावा दिया, लेकिन अगर इसके कारण चीनी की कमी पैदा होती है और बाद में विदेश से चीनी खरीदनी पड़ती है, तो नीति के आर्थिक लाभ पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि इस आरोप को सीधे तौर पर स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। चीनी की मौजूदा महंगाई के पीछे कम उत्पादन, खराब बारिश, घटता शुरुआती स्टॉक और त्योहारी मांग जैसे कई कारण हैं। रॉयटर्स के अनुसार महाराष्ट्र और कर्नाटक में कम बारिश से अगले सीजन के गन्ने के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है।
इसलिए मौजूदा चीनी संकट को केवल इथेनॉल नीति का परिणाम बताना पूरी तस्वीर नहीं होगी। लेकिन यह भी तथ्य है कि लगभग 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल की ओर मोड़ा गया है और सरकार खुद अगले सीजन में गन्ने से इथेनॉल उत्पादन को सीमित करने के विकल्प पर विचार कर रही है।
क्या इससे चीनी के दाम तुरंत घटेंगे?
तुरंत राहत की संभावना सीमित है। आयातित चीनी का एक हिस्सा पहले से आयात की जा चुकी कच्ची चीनी को घरेलू बाजार में बेचने की अनुमति से जल्दी उपलब्ध हो सकता है, लेकिन ब्राजील जैसे देशों से नई खेप आने में करीब दो महीने लग सकते हैं। इसलिए आयात का बड़ा असर अक्टूबर के आसपास दिखाई देने की संभावना है। इसके अलावा त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने वाली है। इसलिए सरकार की कोशिश सिर्फ आयात तक सीमित नहीं है; स्टॉक सीमा और घरेलू बाजार की निगरानी भी इसी रणनीति का हिस्सा है।मोदी सरकार के सामने चुनौती क्या है
सरकार के सामने अब सवाल सिर्फ चीनी के दाम घटाने का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि भारत की इथेनॉल नीति और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? अगर गन्ने से इथेनॉल उत्पादन बढ़ता है तो चीनी की उपलब्धता पर दबाव पड़ सकता है। अगर गन्ने को चीनी उत्पादन के लिए प्राथमिकता दी जाती है तो E20 के लिए मक्का और चावल जैसे वैकल्पिक फीडस्टॉक पर निर्भरता बढ़ानी होगी।
इस लिहाज से 10 लाख टन चीनी का शुल्क-मुक्त आयात सिर्फ एक सामान्य बाजार हस्तक्षेप नहीं है। यह भारत की चीनी नीति, इथेनॉल नीति, खाद्य महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा—चारों के बीच पैदा हुए तनाव का संकेत भी है। आने वाले महीनों में सरकार का सबसे महत्वपूर्ण फैसला यह होगा कि वह नए गन्ना सीजन में चीनी को प्राथमिकता देती है या E20 के लिए गन्ने से इथेनॉल उत्पादन को मौजूदा स्तर पर बनाए रखती है।