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कोरोना: 1.8 लाख मरीज़ों में से सिर्फ़ 5600 बीमा के दावे, बाक़ी कैसे करा रहे इलाज?

कोरोना वायरस मरीज़ों की बीमा के बारे में जो आँकड़े आए हैं उससे सरकारी अस्पताल की दुरुस्त व्यवस्था से ज़्यादा स्वास्थ्य बीमा पर विश्वास करने वाले लोगों को झटका लग सकता है। देश भर में कोरोना वायरस के मरीज़ों के मामले जब 1 लाख 80 हज़ार से ज़्यादा हो गए, तब भी सिर्फ़ 5600 लोगों ने ही स्वास्थ्य बीमा के दावे किए। इसका मतलब साफ़ है कि बाक़ी के लोगों को अपनी जेब से ख़र्च करना पड़ा है या पड़ रहा है। जब ग़रीब लोगों के भूखों मरने की नौबत आ रही है तो कोरोना के इलाज के लिए रुपये वे कहाँ से लाएँगे?

अब यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि निजी अस्पताल के बिल भरने वालों की स्थिति कैसी हो जाती है। ऐसे में जब कोरोना संकट के कारण लोगों की नौकरियाँ चली गई हैं और आमदनी के दूसरे साधन भी बंद हैं तो इलाज कराने वालों पर कैसी आफत आन पड़ी होगी। यदि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहतर होतीं तो लोगों को निजी अस्पतालों पर निर्भर नहीं होना पड़ता। 

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स्वास्थ्य बीमा के दावों की रिपोर्ट तब आई जब कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या देश में 1 लाख 80 हज़ार के पार कर गई। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार बीमा कंपनियों द्वारा इकट्ठे किए गए आँकड़ों के अनुसार 5600 लोगों ने बीमा के निपटारे के लिए दावे किए हैं। यह रक़म क़रीब 70 करोड़ रुपये बैठती है। इस हिसाब से बीमा की पॉलिसी कराने वाले प्रति व्यक्ति को क़रीब 1 लाख 25 हज़ार रुपये मिलेंगे। अब 1.8 लाख संक्रमण के मामले आने के बाद जो 5600 दावे आए हैं वे सिर्फ़ 3.1 फ़ीसदी ही हैं। यानी बाक़ी लोगों के पास बीमा ही नहीं है।

ग़रीबों के लिए शुरू किए गए आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का सिर्फ़ 2132 कोरोना पॉजिटिव लोगों को फ़ायदा मिला है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि 5,600 दावों में कई राज्यों द्वारा जनरल इंश्योरेंस कंपनियों को शामिल करने की स्थिति में आयुष्मान भारत से संबंधित दावे भी शामिल हैं। 

'आयुष्मान भारत' 10 करोड़ से अधिक आर्थिक रूप से वंचित परिवारों को कवर करता है। सीजीएचएस योजना है जो सरकारी कर्मचारियों और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) योजना श्रमिकों को कवर करती हैं। बाक़ी लोगों का क्या होगा?

अब जो इन योजनाओं के तहत नहीं आते हैं और जिन्होंने बीमा नहीं कराया है उनको इलाज कराने में कैसी स्थिति से गुज़रना पड़ेगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह इसलिए कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई हुई है। कई बार आरोप यह लगाया जाता है कि इसी ख़राब स्वास्थ्य व्यवस्था का लाभ बीमा कंपनियाँ और निजी अस्पताल उठाते हैं। 

बहरहाल, देश में शायद ही कोई स्वास्थ्य से जुड़ा व्यक्ति हो जो यह कहे कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था भारत की 1.3 अरब लोगों की स्वास्थ्य ज़रूरतों को पूरा कर पाएगा। ऐसे में जब सामान्य दिनों में ही सरकारी अस्पतालों में लाइनें लगी रहती हैं तो कोरोना जैसी महामारी में क्या हाल होगा। 

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देश में फ़िलहाल कोरोना के मामले काफ़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं और यह संख्या 2 लाख के क़रीब पहुँच गई है। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि जून और जुलाई महीने में कोरोना के मामले उफान पर होंगे। तब क्या होगा जब गंभीर मरीज़ों के लिए आइसोलेशन वार्ड, आईसीयू और वेंटिलेटर की ज़रूरत बढ़ जाएगी। अभी भी लोग निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं और यह इलाज इतना महँगा है कि आम लोगों के बस की बात नहीं है। 

निजी अस्पतालों में कोरोना मरीज़ों के इलाज का ख़र्च अलग-अलग है। निजी अस्पताल में भर्ती होने वाले एक मरीज़ के लिए औसतन क़रीब 2 लाख रुपये का ख़र्च आ सकता है। स्थिति गंभीर होने पर यह ख़र्च काफ़ी ज़्यादा बढ़ सकता है। कई तो ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि क़रीब 6-7 लाख रुपये निजी अस्पताल जमा करवा रहे हैं और इसके बाद भी दवाइयों के ख़र्च अलग से। 

कोरोना वायरस इतना संक्रामक है कि यह पूरे के पूरे परिवार को चपेट में ले ले रहा है। यदि किसी परिवार में 4 या 6 लोग बीमार पड़ जाएँ तो क्या स्थिति होगी!

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