मुंबई की महत्वाकांक्षी धारावी पुनर्विकास परियोजना (Dharavi Redevelopment Project) के तहत धारावी के निवासियों को बसाने की योजना प्रशासनिक देरी और लालफीताशाही के जाल में फंसती नजर आ रही है। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, देवनार (Deonar) स्थित 99 साल पुराने डंपिंग ग्राउंड/लैंडफिल के एक हिस्से को साफ करने का काम मूल समयसीमा से 6 महीने से अधिक बीत जाने के बाद भी शुरू नहीं हो पाया है।
महाराष्ट्र सरकार ने अक्टूबर 2024 में देवनार में 124 एकड़ ज़मीन धारावी पुनर्विकास परियोजना के तहत विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास आवास (Rehabilitation Housing) के लिए आवंटित की थी। लैंडफिल की सफाई और बायो-माइनिंग प्रक्रिया शुरू करने के लिए कुल 7 वैधानिक मंजूरियों की आवश्यकता है, जिनमें से 5 मंजूरियां अभी भी लंबित हैं।
ठेकेदार कंपनी NECL (Nagarjuna Construction Company / NECL) का कहना है कि उसे प्रमुख स्वीकृतियों और प्रक्रियाओं के बारे में काफी देरी से सूचित किया गया, जिससे शुरुआती काम रुक गया। बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के अधिकारियों के अनुसार, यदि वर्तमान टेंडर को रद्द किया जाता है या दोबारा टेंडर मंगाए जाते हैं, तो पूरी प्रक्रिया में और भी अधिक देरी होगी।
देवनार मुंबई का सबसे पुराना और सबसे बड़ा कचरा डंपिंग साइट है। जब तक 124 एकड़ क्षेत्र में फैले पुराने कचरे की सफाई और भूमि का समतलीकरण (Land Cleanup) नहीं हो जाता, तब तक वहां बहुमंजिला पुनर्वास इमारतों का निर्माण शुरू नहीं किया जा सकता।
सफाई कार्य में हो रही इस लगातार देरी के कारण अडानी समूह (Adani Group) द्वारा संचालित धारावी पुनर्विकास प्रोजेक्ट के तहत पुनर्वासित होने वाले हजारों परिवारों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

अडानी धारावी प्रोजेक्ट पर विवाद क्यों है

अडानी समूह की धारावी पुनर्विकास परियोजना (Dharavi Redevelopment Project) को लेकर कई स्तरों पर विवाद और विरोध बना हुआ है। इसके पीछे मुख्य रूप से पुनर्वास, आजीविका, टेंडर प्रक्रिया और जमीन आवंटन से जुड़े मुद्दे हैं:
कट-ऑफ डेट का नियम: योजना के अनुसार केवल वही लोग मुफ्त घर पाने के पात्र हैं जो 1 जनवरी 2000 या उससे पहले से वहां रह रहे हैं। 2000 से 2011 के बीच बसे लोगों को शुल्क चुकाकर या किराए पर घर मिलेगा, जबकि 2011 के बाद के निवासियों पर बेघर होने का खतरा है।
धारावी से बाहर भेजने का विरोध: पात्र निवासियों को धारावी में ही घर देने का वादा है, लेकिन लाखों अपात्र परिवारों को देवनार (लैंडफिल साइट), कांजुरमार्ग या मुलुंड जैसी दूरदराज की जमीनों पर भेजने की योजना है, जिसका स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं।

स्थानीय कारोबार और आजीविका पर संकट

धारावी केवल एक रिहाइशी इलाका नहीं, बल्कि एक अनौपचारिक औद्योगिक हब (असंगठित अर्थव्यवस्था) है। यहां चमड़ा उद्योग, मिट्टी के बर्तन (कुम्हारवाड़ा), रीसाइक्लिंग, कपड़े और खाने-पीने के बड़े घरेलू कुटीर उद्योग चलते हैं। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि उन्हें बहुमंजिला इमारतों (High-rise flats) में शिफ्ट करने से उनका जमीनी काम और बड़े स्थान की जरूरत वाले उद्योग पूरी तरह ठप हो जाएंगे।

टेंडर प्रक्रिया और रियायतों पर राजनीतिक आरोप

विपक्षी दलों (शिवसेना-UBT, कांग्रेस) का आरोप है कि 2019 में जब 'सीलिंक टेक्नोलॉजीज' ने बोली जीती थी, तब उस टेंडर को रद्द कर दिया गया। बाद में टेंडर की शर्तों में बदलाव (जैसे रेलवे की जमीन जोड़ना) कर 2022 में अडानी समूह को टेंडर दिया गया। सरकार ने नियमों में बदलाव कर अन्य बिल्डरों के लिए अडानी समूह से अनिवार्य रूप से TDR खरीदना जरूरी कर दिया, जिससे अडानी को मुंबई के रियल एस्टेट मार्केट में एकाधिकार (Monopoly) और अनुचित लाभ मिलने का आरोप लगाया गया।

इस प्रोजेक्ट के नाम पर अडानी समूह को मुंबई की कई प्राइम लोकेशनों (जैसे देवनार लैंडफिल की 124 एकड़ जमीन, कुर्ला डेयरी की जमीन, साल्ट पैन लैंड आदि) में रियायती दरों पर बड़ी-बड़ी जमीनें आवंटित की गई हैं। विपक्ष इसे "जमीन हथियाने" (Land Grab) का प्रयास बताता है।

कार्यकर्ताओं और स्थानीय संघों का आरोप है कि पुनर्विकास की योजना बनाते समय धारावी में दशकों से रह रहे लोगों से सलाह-मशविरा नहीं किया गया और उन पर ऊपर से फैसले थोपे जा रहे हैं।
अडानी समूह और धारावी पुनर्विकास प्राधिकरण (DRP) का कहना है कि यह परियोजना धारावी के लाखों लोगों के जीवनस्तर को सुधारेगी, उन्हें साफ-सुथरे घर, पानी, गैस और सीवेज जैसी आधुनिक सुविधाएं देगी और पात्र व गैर-पात्र सभी निवासियों के लिए आवास की व्यवस्था की जाएगी।