इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ उनके 'भारतीय राज्य' (Indian State) वाले बयान को लेकर एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और इसे "प्रचार पाने के मकसद से दायर की गई मामूली याचिका" करार दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार की कार्रवाई या नीतियों की आलोचना भी ज़रुरी है। 
  • याचिकाकर्ता ने राहुल गांधी के इस बयान पर आपत्ति की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी 'लड़ाई एक राजनीतिक दल के साथ-साथ भारतीय राज्य से भी है'।
राहुल गांधी ने इस साल जनवरी में दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में अपने भाषण में इस तरह की टिप्पणी की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि राहुल गांधी ने भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने की कोशिश की और भारतीय राज्य के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की।
संभल की रहने वाली याचिकाकर्ता सिमरन गुप्ता का दावा था कि राहुल गांधी के बयान से देश की संप्रभुता और अखंडता पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए उनके खिलाफ देशद्रोह या संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को अपर्याप्त माना। 

अदालत का नज़रिया

जस्टिस विक्रम डी चौहान की अध्यक्षता वाली सिंगल बेंच ने टिप्पणी की, “संसदीय लोकतंत्र में, सरकार की कार्रवाई या नीतियों की आलोचना की न सिर्फ अनुमति है बल्कि आवश्यक भी है। इसलिए, आलोचना या वैचारिक मतभेद अपने आप में अपराध नहीं हो सकता।”
जस्टिस चौहान ने कहा, “नेता विपक्ष राहुल गांधी चुने हुए प्रतिनिधि और संसद सदस्य हैं। लोकतंत्र में, चुने हुए प्रतिनिधि नागरिकों और सरकार के बीच पुल का काम करते हैं। यह सिद्धांत लोकतंत्र की कल्पना पर आधारित है, जहाँ नागरिक अपनी आवाज़ चुने हुए जनप्रतिनिधियों को बताते हैं। चुने हुए जनप्रतिनिधि विभिन्न माध्यमों से अपनी चिंताओं को जता सकते हैं। इसके अलावा, ऐसे चुने हुए जनप्रतिनिधियों को भी बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का व्यक्तिगत अधिकार भी मिला हुआ है।”
याचिकाकर्चा सिमरन गुप्ता ने पहले संभल, चंदौसी स्थित सांसद/विधायक कोर्ट में और फिर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की कोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन दोनों अदालतों ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

नेता विपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ न सिर्फ यह याचिका, बल्कि इससे पहले उनके खिलाफ कई याचिकाएं अदालतों में लगाई गईं। लेकिन अदालत ने कई को खारिज कर दिया। जिसमें उनकी नागरिकता को भी मुद्दा बनाया गया। राहुल गांधी की आरएसएस और बीजेपी पर टिप्पणियां पूरे देश में चर्चा का विषय होती हैं।

हाईकोर्ट में राज्य की ओर से पेश होते हुए अतिरिक्त अटार्नी जनरल ने कहा कि दोनों निचली अदालतों ने कानून को सही संदर्भ में नहीं समझा। याचिकाकर्ता के वकील ने भी तर्क दिया कि राहुल गांधी के बयान से "एक अपराध का खुलासा हुआ और इस प्रकार, दोनों अदालतों ने आदेश पारित करने में कानून की गलती की।"
उनकी दलीलें सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की आपत्ति "भारतीय राज्य से लड़ने" जैसे शब्दों पर है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस अभिव्यक्ति से पहले भी दो शब्द हैं, जो एक स्वतंत्र संगठन और एक राजनीतिक दल भी है। ध्यान रहे कि राहुल गांधी ने कहा था कि उनकी लड़ाई आरएसएस और बीजेपी से तो है ही, भारत सरकार से भी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, "...अदालतों को, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। संविधान और उसके आदर्शों का हनन न हो, यह तय करना अदालतों का परम कर्तव्य है। अदालतों की कोशिश हमेशा मौलिक अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देना होना चाहिए, जिसमें बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी शामिल है। यह एक उदार संवैधानिक लोकतंत्र में नागरिक के सबसे प्रिय अधिकारों में से एक है। अदालतों को बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी को नियंत्रित या दबाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वास्तव में, अदालतों को संविधान और संवैधानिक मूल्यों, जिनमें बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी शामिल है, को कमजोर करने के किसी भी प्रयास को विफल करने के लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए।"
हाईकोर्ट के जस्टिस चौहान ने टिप्पणी की, “चुने हुए प्रतिनिधियों के संदर्भ में, स्वाभाविक रूप से, ‘संघर्ष’ शब्द का अर्थ किसी विरोधी या व्यक्ति की नीति, विचार या विचारधारा के विरुद्ध ज़ोरदार समर्थन से हो सकता है। जिसमें शारीरिक संघर्ष शामिल नहीं है। किसी चुने हुए प्रतिनिधि द्वारा किसी विशेष नीति या विचारधारा के विरुद्ध लड़ने की प्रतिबद्धता जताने और किसी व्यक्ति द्वारा विद्रोह भड़काने में अंतर हो सकता है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि नेता विपक्ष राहुल गांधी का भाषण एक कार्यक्रम या इंटरव्यू में दिया गया था और इसलिए, सामान्य परिस्थितियों में, जब तक अन्यथा सिद्ध न हो, यह चर्चा के दायरे में आएगा।”
अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा व्यापक है और बिना किसी ठोस आधार के किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ इस तरह की कानूनी कार्यवाही की मांग करना न्यायपालिका के समय की बर्बादी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर 25,000 रुपये की जुर्माना राशि जमा करने का निर्देश दिया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले से राहुल गांधी को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जनहित याचिकाओं या आपराधिक शिकायतों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध या व्यक्तिगत प्रचार के लिए नहीं किया जाना चाहिए।