केंद्रीय गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने सोमवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर दावा किया कि देशभर में मतदाता सूचियों से हटाए गए 13 करोड़ नामों में से करीब 3 करोड़ नाम बांग्लादेशी घुसपैठियों के थे। शाह ने कहा कि इन नामों को हटाए जाने से कांग्रेस नेता राहुल गांधी को परेशानी हो रही है। 
  • हालांकि राहुल गांधी समेत सभी विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के डेटा के हवाले से बार-बार कहा है कि 13 करोड़ लोगों के नाम एसआईआर के दौरान हटाये गये। 
  • अब अगर अमित शाह के आरोप को सही मान लिया जाये तो सवाल है कि 10 करोड़ मतदाता कौन हैं, किस धर्म या जाति के हैं जिनके नाम गायब हैं। 
  • दूसरी तरफ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि सवा करोड़ हिन्दू मतदाताओं के नाम एसआईआर के दौरान हटा दिये गये। 
  • इस तरह बीजेपी अब मान रही है कि एसआईआर में लोगों के नाम गलत ढंग से हटाये गये हैं।
हैदराबाद में आयोजित ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि मतदाता सूची से हटाए गए 13 करोड़ नामों में से 6.2 करोड़ से अधिक मतदाता दूसरी जगह चले गए थे, लगभग 3 करोड़ मतदाताओं की मौत हो चुकी थी और एक करोड़ से अधिक नाम दोहराव (डुप्लीकेट एंट्री) के थे। शाह ने दावा किया कि करीब 3 करोड़ ऐसे नाम भी थे, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे कभी अस्तित्व में ही नहीं थे।
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उन्होंने कहा, “तीन करोड़ वोट ऐसे थे, जो कभी अस्तित्व में ही नहीं थे। ये वोट बांग्लादेशी घुसपैठियों के थे। आप बताइए, क्या इन वोटों को काटा जाना चाहिए या नहीं?” अमित शाह ने आरोप लगाया कि इन कथित घुसपैठियों के नाम हटाए जाने से राहुल गांधी को पेट में दर्द हो रहा है। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी फर्जी मतदान के जरिए चुनाव जीतना चाहती है। हालांकि, अमित शाह ने अपने भाषण में जिन तीन करोड़ नामों को बांग्लादेशी घुसपैठियों का बताया, उनके संबंध में विस्तृत आंकड़े या पहचान संबंधी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए।

SIR के तहत 13 करोड़ नाम हटाए जाने पर विपक्ष के सवाल

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया चल रही है, वहां करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम जानबूझकर हटाए गए हैं। विपक्ष ने इस प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इसके जरिए चुनावी नतीजों को प्रभावित किया जा सकता है।
विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी हटाए जाने की आशंका है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी भी योग्य भारतीय नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित न किया जाए। दूसरी ओर, बीजेपी SIR को मतदाता सूची की सफाई और फर्जी मतदाताओं की पहचान करने की प्रक्रिया बता रही है।

बिहार से शुरू हुई थी SIR की प्रक्रिया

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का पहला चरण वर्ष 2025 में बिहार में आयोजित किया गया था। इसके बाद 2025 के अंतिम महीनों और 2026 की पहली छमाही में दूसरे चरण के तहत इस प्रक्रिया को 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया।
अब SIR का तीसरा चरण 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जारी है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान विपक्षी दलों, नागरिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक समूहों ने आशंका जताई है कि मतदाता सूची में संशोधन के नाम पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं।
इससे न केवल नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है, बल्कि चुनावी नतीजे भी प्रभावित हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल के चुनावी आंकड़ों को लेकर भी इस तरह के सवाल उठाए गए हैं। कुछ विश्लेषणों में दावा किया गया है कि कई सीटों पर SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी।

सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध माना, लेकिन नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं दिया

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को बरकरार रखा था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि SIR की प्रक्रिया का अर्थ यह नहीं है कि निर्वाचन आयोग को किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करने का अधिकार मिल गया है। अदालत की इस टिप्पणी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद कुछ राज्यों में संबंधित व्यक्तियों की नागरिकता और अन्य अधिकारों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

SIR के आधार पर राशन कार्ड और पासपोर्ट पर भी असर

रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी शासित कुछ राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद संबंधित लोगों के राशन कार्डों को लेकर भी कार्रवाई की गई है। कुछ मामलों में ऐसे लोगों के राशन कार्ड रद्द किए जाने या उन्हें राशन कार्ड देने से इनकार किए जाने की खबरें सामने आई हैं। इसके अलावा, कुछ मामलों में पुलिस ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का हवाला देते हुए लोगों के पासपोर्ट नवीनीकरण (Passport Renewal) की प्रक्रिया में भी बाधा डाली है। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया निर्वाचन आयोग को किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं देती।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन

SIR और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष का आंदोलन भी तेज हो गया है। 2 अक्टूबर से देशभर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं और पक्षपात के आरोप लगाए हैं। शनिवार को विपक्षी INDIA गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक ‘जनता का महाभियोग’ (Public Impeachment) आयोजित किया। विपक्ष का आरोप है कि निर्वाचन आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक व्यवस्था और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा के लिए गंभीर सवाल खड़े करती है। इस बीच अमित शाह का यह दावा कि मतदाता सूची से हटाए गए तीन करोड़ नाम बांग्लादेशी घुसपैठियों के थे, SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद को और तेज कर सकता है।