उत्तराखंड, गुजरात के बाद अब असम में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) पेश किया गया है। हालांकि बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में पूरे देश में लागू करने की घोषणा की थी। लेकिन अभी तक सिर्फ राज्यों के जरिए ही यह कोशिश सामने आई है।
असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा
असम सरकार ने सोमवार 25 मई को विधानसभा में “यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026 विधेयक” पेश किया। इस विधेयक का मकसद राज्य के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में एक समान नागरिक कानून लागू करना है। प्रस्तावित कानून के तहत बहुविवाह (Polygamy) और द्विविवाह (Bigamy) पर पूरी तरह रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। यदि कोई व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 82 के तहत सात साल तक की सजा हो सकती है।
सिर्फ राज्यों में यूसीसी क्यों लाया जा रहा
उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम तीसरा ऐसा राज्य बन गया है, जहां यूसीसी लागू किया जाएगा। उत्तराखंड और गुजरात में इसे लागू किया जा चुका है। हालांकि बीजेपी ने अब तक हर लोकसभा चुनाव के दौरान जारी होने वाले अपने घोषणापत्र में यूसीसी को राष्ट्रीय स्तर पर लाने का वाद किया है। लेकिन 12 वर्षों से केंद्र में बीजेपी सरकार होने के बावजूद यूसीसी नहीं लाया जा सका। अलबत्ता वो राज्यों के माध्यम से ला रही है। इसीलिए सवाल उठ रहे हैं कि क्या राज्यों में यूसीसी लाकर वो जनता के रुख की परीक्षा ले रही है।असम के यूसीसी की खास बातें
अनुसूचित जनजातियों को छूटः असम यूसीसी बिल में अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) को विशेष रूप से बाहर रखा गया है ताकि उन्हें संविधान के तहत प्राप्त सांस्कृतिक और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा की जा सके। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल के असम विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य के आदिवासी समुदाय से वादा किया था कि उन्हें प्रस्तावित यूसीसी से बाहर रखा जाएगा। सरकार का कहना है कि यह कानून विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह लेकर “पूर्ण समानता और जेंडर न्याय” सुनिश्चित करेगा।
विवाह और तलाक के नए नियम
विधेयक के अनुसार राज्य में केवल एक पत्नी या पति रखने की अनुमति होगी। विवाह के लिए दूल्हे की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और दुल्हन की 18 वर्ष तय की गई है। सरकार ने स्पष्ट किया कि धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने के लिए सभी समुदाय अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों से विवाह कर सकेंगे। इसमें वैदिक विवाह, अहोम चकलोंग, सप्तपदी, आशीर्वाद, निकाह (इस्लाम), होली यूनियन (ईसाई) और आनंद कारज (सिख) जैसी धार्मिक परंपराएं शामिल हैं।विवाह-तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्यः सभी विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। विवाह के 60 दिनों के भीतर दंपत्ति को सब-रजिस्ट्रार के पास विवाह ज्ञापन जमा करना होगा। तलाक के लिए क्रूरता, परित्याग और आपसी सहमति जैसे एक समान आधार तय किए गए हैं। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की प्रारंभिक अभिरक्षा सामान्यतः मां को दिए जाने का प्रावधान रखा गया है।
उत्तराधिकार और वसीयत
विधेयक में उत्तराधिकार के लिए भी समान और लैंगिक रूप से न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाई गई है। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मरता है तो उसकी संपत्ति में पति/पत्नी, बच्चों और माता-पिता को समान प्राथमिकता मिलेगी। वहीं कोई भी वयस्क और मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति लिखित और गवाहों की मौजूदगी में वसीयत बना सकेगा।लिव-इन रिलेशनशिप पर सख्त नियम
असम यूसीसी बिल में लिव-इन रिलेशनशिप के लिए भी पहली बार विस्तृत कानूनी प्रावधान किए गए हैं। किसी भी लिव-इन संबंध का एक महीने के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। इस संबंध से जन्म लेने वाले बच्चों को पूरी तरह वैध माना जाएगा। यदि किसी महिला को उसका साथी छोड़ देता है तो उसे अदालत के माध्यम से आर्थिक सहायता (Maintenance) मांगने का कानूनी अधिकार होगा। सरकार का कहना है कि यह कानून महिलाओं को सुरक्षा देने, धोखाधड़ी रोकने और सामाजिक जवाबदेही बढ़ाने के लिए लाया गया है।असम यूसीसी के कुछ अन्य सख्त प्रस्ताव
- बाल विवाह या बिना वैध सहमति के विवाह पर दो साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
- जबरदस्ती, धोखे या तथ्य छिपाकर विवाह कराने पर सात साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
- तलाक की वैध प्रक्रिया का उल्लंघन करने या गैरकानूनी तरीके से विवाह समाप्त करने पर तीन साल तक की सजा और जुर्माना लगाया जा सकता है।
- तलाकशुदा व्यक्ति पर दोबारा विवाह से पहले अवैध शर्तें थोपने पर तीन साल तक की जेल और एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
- प्रतिबंधित रिश्तों में विवाह करने पर, यदि वह किसी मान्य परंपरा से संरक्षित नहीं है, तो छह महीने तक की जेल और 50 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- विवाह या तलाक का 60 दिनों के भीतर पंजीकरण न कराने पर 10 हजार रुपये का दंड लगाया जाएगा।
- फर्जी दस्तावेज जमा करने पर तीन महीने तक की जेल या 25 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
- लिव-इन रिलेशनशिप का एक महीने में पंजीकरण न कराने पर तीन महीने तक की जेल या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
असम मुस्लिम विवाह कानून की स्थिति क्या रहेगी
इस विधेयक के लागू होने के बाद “असम मुस्लिम विवाह और तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम 2024” को समाप्त कर दिया जाएगा। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यूसीसी लागू होने से पहले हुए बहुविवाह को वैध माना जाएगा और उन्हें कानूनी सुरक्षा दी जाएगी। सरकार का दावा है कि यह कानून कानूनी समानता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाता है और असम को एक प्रगतिशील राज्य के रूप में स्थापित करेगा।अब उठ रहे बड़े राजनीतिक सवाल
असम में यूसीसी बिल आने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी कई सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब केंद्र सरकार और भाजपा वर्षों से पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा करती रही है, तो अब तक राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी कानून क्यों नहीं लाया गया? लोकसभा चुनावों के दौरान भी भाजपा ने यूसीसी को अपने प्रमुख चुनावी वादों में शामिल किया था। इसके बावजूद अब तक केंद्र सरकार ने संसद में राष्ट्रीय यूसीसी विधेयक पेश नहीं किया है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र सरकार संभवतः विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदायों की संभावित प्रतिक्रिया को देखते हुए सावधानी बरत रही है। आलोचकों का सवाल है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर विरोध की आशंका के कारण मोदी सरकार यूसीसी को राज्यों तक सीमित रख रही है? दूसरी ओर भाजपा और उसके समर्थकों का तर्क है कि यूसीसी को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है और राज्यों में इसकी सफलता के बाद राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ा जा सकता है।
असम के विपक्षी दलों ने इस बिल का विरोध किया और आरोप लगाया कि सरकार ने इसे लाने से पहले राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक समूहों से पर्याप्त चर्चा नहीं की। कांग्रेस नेता ज़ाकिर हुसैन सिकदार ने कहा कि यूसीसी सत्तारूढ़ भाजपा का “राजनीतिक एजेंडा” है। हाल के दिनों में कई मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने भी व्यापक परामर्श की मांग की थी।