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बार एसोसिएशन : हाई कोर्ट से खुद कोरोना मामले न ले सुप्रीम कोर्ट

क्या सुप्रीम कोर्ट कोई मामला ख़ुद ब खुद हाई कोर्ट से ले सकता है? संविधान में उसके क्या प्रावधान है? हाई कोर्ट का अधिकार क्षेत्र कहाँ तक सीमित है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने कोरोना से जुड़े दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित मामलों के स्वत: संज्ञान लेकर अपने अधीन लेने के सुप्रीम कोर्ट के कदम का विरोध किया है। 

एसोसिएशन ने कहा है कि पहले से तैयारी नहीं होने के कारण स्थानीय स्तर पर दिक्क़तें हो रही हैं, हाई कोर्ट उन्हें सुलझाने की कोशिशें कर रहे हैं, ऐसे में इन मामलों को उन हाई कोर्ट के पास ही रहने देना चाहिए।

एसोसिएशन ने कहा, इस स्थिति से निपटने के लिए हाई कोर्ट सबसे ठीक है, ऐसे में उचित है कि स्थानीय मामलों को हाई कोर्ट को ही सुलझाने देना चाहिए।

क्या कहना है बार एसोसिएशन का?

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने कई बार ज़ोर देकर कहा है कि संविधान की धारा 226 के तहत हाई कोर्ट को धारा 32 के तहत ही नहीं, उससे बाहर भी उसका अधिकार क्षेत्र है और वह काम कर सकती है। 

उसने यह भी कहा कि कोरोना से जु़ड़े कई मामले अलग-अलग हाई कोर्ट में हैं और ये हाई कोर्ट स्थानीय मुद्दों की जानकारी रखने के कारण उसे सुलझा रहे हैं। लिहाज़ा, ये मामले इन हाई कोर्टों के पास ही रहने चाहिए। 

केंद्र को दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार

बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने ऑक्सीजन आपूर्ति नहीं करने के एक मुद्दे पर बुधवार को एक आदेश में केंद्र सरकार की बहुत ही तीखी आलोचना की और उसे आदेश दिया कि वह हर हाल में ऑक्सीजन आपूर्ति सुनिश्चित करे।

मैक्स हॉस्पिटल समूह की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विपिन संघी और जस्टिस रेखा पल्ली के खंडपीठ ने कहा, 'हमें लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करनी है और हम आदेश देते हैं कि आम भीख मांगें, उधार लें या चोरी करें, जो करना हो करें लेकिन आपको ऑक्सीजन देना है। हम लोगों को मरते हुए नहीं देख सकते।' 

अदालत ने सरकार पर टिप्पणी करते हुए कहा, आप यह नहीं कह सकते कि आप इतना ऑक्सीजन इतने दिन के लिए दे सकते हैं, लोग मरते हैं तो मरें। यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है और एक सार्वभौम सरकार का यह जवाब नहीं हो सकता।

bar association opposes supreme court move to take high court cases - Satya Hindi

बंबई हाई कोर्ट ने भी केंद्र को लगाई लताड़

इसके एक दिन बाद गुरुवार को बंबई हाई कोर्ट के जस्टिस सुनील सुकरे व जस्टिस एस. एम. मोदक के खंडपीठ ने भी ऑक्सीजन आपूर्ति पर केंद्र सरकार को जम कर लताड़ा। बेंच ने कहा, हमें इस दुष्ट समाज का हिस्सा होने पर शर्म आ रही है, आपको शर्म क्यों नहीं आ रही है? आप महाराष्ट्र के असहाय रोगियों के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। आपके पास इस समस्या का क्या समाधान है?

हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि महाराष्ट्र को पहले की तरह ही रोज़ाना 110 मीट्रिक टन ऑक्सीजन दिया जाना चाहिए। 

अदालत ने स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय की 18 अप्रैल की उस चिट्ठी का हवाला दिया जिसमें केंद्र सरकार ने  महाराष्ट्र सरकार से कहा था कि भिलाई संयंत्र से उसे ऑक्सीजन की आपूर्ति 110 टन रोज़ाना से कम कर 60 टन कर दी जाएगी। 

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