जिन केंद्रीय मंत्री भगीरथ चौधरी ने अपने ही मंत्रालय से खीरा की खेती के लिए 99 लाख रुपये की सब्सिडी ले ली थी उनको अब सब्सिडी के वो रुपये लौटाने पड़े हैं। मंत्रालय की एक बागवानी योजना के तहत मिली इस सब्सिडी को वापस कर दिए जाने की जानकारी केंद्र सरकार ने मंगलवार को लोकसभा में दी। यह फ़ैसला हितों के टकराव का मामला आने और चौतरफ़ा दबाव बनने के बाद आया है। यह मामला आने के बाद सवाल पूछा जा रहा था कि सब्सिडी ज़रूरतमंद किसानों के लिए हैं या फिर मंत्रियों के लिये!

तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा में पूछा था कि क्या पिछले पांच वर्षों में किसी केंद्रीय मंत्री, सांसद या उनके परिवार के सदस्यों ने राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड यानी एनएचबी की योजनाओं के तहत सब्सिडी प्राप्त की है। इसके लिखित जवाब में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने कहा, 'श्री भगीरथ चौधरी ने सूचित किया है कि उन्होंने इस योजना के तहत संबंधित बैंक को सब्सिडी की राशि वापस कर दी है। संबंधित बैंक को निर्देश दिया गया है कि वह यह राशि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड को वापस करे।'

भगीरथ चौधरी आए थे विवादों में

क़रीब एक महीने पहले एक मीडिया पड़ताल में खुलासा हुआ था कि केंद्रीय मंत्री भगीरथ चौधरी ने अपने ही मंत्रालय के अधीन संचालित एक बागवानी योजना के तहत 99 लाख रुपये की सब्सिडी प्राप्त की थी। यह सब्सिडी उनके खीरे की व्यावसायिक खेती से जुड़ी परियोजना के लिए मंजूर की गई थी।

मामला राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव में मंत्री भगीरथ चौधरी के फार्म से जुड़ा है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार वहाँ लगे एक बोर्ड पर लिखा था कि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की ओर से इस परियोजना के लिए 99.60 लाख रुपये की सहायता दी गई है। हालाँकि बोर्ड पर यह नहीं लिखा था कि इस योजना का लाभ लेने वाले स्वयं केंद्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री हैं।

रिपोर्ट के अनुसार यह योजना 'मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर' के तहत संचालित होती है, जिसे राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड यानी एनएचबी लागू करता है। एनएचबी कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करता है।

किस योजना के तहत मिली थी सब्सिडी?

यह योजना बड़े पैमाने पर व्यावसायिक बागवानी को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है। इसके तहत परियोजना लागत का अधिकतम 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। इसके लिए एक परिवार को अधिकतम 1 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी मिल सकती है। योजना में शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर और कई प्रकार के फूलों की व्यावसायिक खेती को प्रोत्साहन दिया जाता है।

भगीरथ चौधरी की खीरे की परियोजना लगभग 16,592 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैली हुई बताई गई थी। यह साल 2025 में स्वीकृत 467 परियोजनाओं में शामिल थी।

आईएएस अधिकारी परिवार का केस

इसी दौरान एक अन्य रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि हाल ही में केंद्र सरकार में उच्च शिक्षा सचिव नियुक्त किए गए एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के परिवार के तीन सदस्यों ने भी पिछले कुछ वर्षों में बागवानी योजनाओं के तहत एक करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी प्राप्त की थी। हालाँकि सरकार ने इस मामले पर अलग से कोई टिप्पणी नहीं की है।

एक और सांसद का नाम भी आया

सरकार ने लोकसभा में यह भी बताया कि पिछले पांच वर्षों में राजस्थान के जालौर से बीजेपी सांसद लुंबाराम चौधरी ने भी राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त की है। हालाँकि सरकार ने यह साफ़ नहीं किया कि उन्हें कितनी राशि मिली।

हितों के टकराव पर क्या कहा?

अभिषेक बनर्जी ने सरकार से यह भी पूछा कि क्या ऐसी कोई नीति है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि मंत्री, सांसद या उनके परिवार के सदस्यों द्वारा दी गई सब्सिडी की अर्जियों में हितों के टकराव से बचा जाए। इस पर सरकार ने जवाब दिया कि 'राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की वर्तमान योजना-निर्देशिका में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों या उनके परिवारों के आवेदनों के संबंध में हितों के टकराव या स्वयं को प्रक्रिया से अलग रखने का कोई विशेष प्रावधान नहीं है।' यानी मौजूदा नियमों में ऐसी कोई अलग व्यवस्था नहीं है कि यदि कोई मंत्री या सांसद योजना का लाभ लेने के लिए आवेदन करता है तो उसके लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए।

विपक्ष ने उठाए थे सवाल

इस मामले के सामने आने के बाद विपक्ष ने सवाल उठाए थे कि क्या अपने ही मंत्रालय के अधीन चल रही योजना से किसी मंत्री का सब्सिडी लेना नैतिक रूप से उचित है। विपक्ष ने यह भी मांग की थी कि सरकार सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के लिए हितों के टकराव को रोकने वाली स्पष्ट नीति बनाए।
बहरहाल, भगीरथ चौधरी द्वारा 99 लाख रुपये की सब्सिडी वापस किए जाने के बाद तत्काल विवाद तो कुछ हद तक शांत हुआ है, लेकिन संसद में सरकार के इस जवाब ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है कि मंत्री द्वारा ली गई सब्सिडी क्यों लौटाई गई, क्या उन्होंने गड़बड़ी करके ये सब्सिडी ली थी? और यदि ऐसा है तो क्या इसे लौटा देने से इस गड़बड़ी के लिए कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

सरकार के इस जवाब से यह भी सवला उठता है कि क्या भविष्य में मंत्रियों, सांसदों और अन्य सार्वजनिक पदाधिकारियों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के संबंध में हितों के टकराव को रोकने के लिए अलग नियम बनाए जाएंगे या नहीं।