कैथोलिक चर्च ने प्रस्तावित FCRA यानी 'विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम संशोधन विधेयक, 2026' का खुला विरोध शुरू कर दिया है। ईसाई समुदाय की चिंता से मोदी सरकार और जनता को बताने के लिए कैथोलिक चर्च ने 28 जून 2026 को देशव्यापी 'राष्ट्रीय प्रार्थना दिवस' (National Day of Prayer) मनाने का आह्वान किया है। ईसाई समुदाय का इस तरह विरोध जताने का अपना तरीका है। इस विधेयक पर संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान विचार किए जाने की संभावना है। 

देशभर के सभी सूबा (dioceses), पारिश (parishes), धार्मिक संस्थानों और कैथोलिक समुदायों को सर्कुलर जारी किया गया है। सर्कुलर में चर्च के नेताओं ने इस प्रस्तावित कानून के कारण चर्च और ईसाई संगठनों द्वारा संचालित धर्मार्थ (charitable), शैक्षणिक, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सेवा गतिविधियों पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर चिंता जताई है।

शांतिपूर्ण प्रार्थना और ज्ञापन सौंपने की अपील

'कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया' (CBCI) के अध्यक्ष और हैदराबाद के आर्कबिशप, कार्डिनल एंथनी पूला ने सर्कुलर में लिखा:  "भारत में चर्च ने लगातार समाज, विशेष रूप से गरीबों और हाशिए पर मौजूद लोगों की सेवा की है, जो प्रेम, न्याय और करुणा के सुसमाचार (Gospel) मूल्यों की अभिव्यक्ति है।"

कार्डिनल पूला ने सभी बिशप, पुजारियों, धार्मिक और आम विश्वासियों से अपील की है कि वे अन्य ईसाई समुदायों के साथ मिलकर प्रार्थना करें। उन्होंने कहा कि 28 जून (रविवार) को होने वाली सामूहिक प्रार्थना (Masses) के दौरान देश, सार्वजनिक जिम्मेदारी संभालने वाले नेताओं और चर्च को अपनी सेवा मिशन को जारी रखने की स्वतंत्रता के लिए विशेष प्रार्थना की जाए। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय सांसदों और विधायकों के माध्यम से केंद्र सरकार को ज्ञापन (memorandum) सौंपने को भी कहा है, जिस पर समुदाय और शुभचिंतकों के हस्ताक्षर होंगे।

FCRA क्या है

इस भारतीय कानून को व्यक्तियों, संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा विदेशी धन या आतिथ्य सत्कार की स्वीकृति और इस्तेमाल को रेगुलेट करने के लिए बनाया गया है। इस कानून के तहत गृह मंत्रालय (MHA) यह सुनिश्चित करता है कि विदेशी अंशदान से भारत की आंतरिक सुरक्षा या राष्ट्रीय हितों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

क्या है विवाद और विरोध की वजह?

अल्पसंख्यक समूहों का मानना है कि इस विधेयक के प्रावधानों से शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण होगा, कार्यपालिका को मनमाने अधिकार मिलेंगे और अल्पसंख्यक संस्थानों पर हमले की आशंका बढ़ जाएगी। इससे पहले, सीबीसीआई के उप महासचिव मैथ्यू कोइक्कल ने भी इस विधेयक के प्रावधानों को "चिंताजनक" बताया था।
इस विधेयक को केंद्र सरकार ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया था। इसके विरोध में 2 अप्रैल को विपक्षी सांसदों ने संसद में "NGOs और संस्थानों को निशाना बनाना बंद करो" के बैनर के साथ विरोध प्रदर्शन भी किया था। दिल्ली के आर्कबिशप और सीबीसीआई के महासचिव अनिल जे.टी. कूटो द्वारा गृह मंत्री अमित शाह और सांसदों को भेजे गए ज्ञापन में कहा गया था कि पूजा स्थलों को सीमित सुरक्षा देने और शैक्षणिक व धर्मार्थ संस्थानों को सुरक्षा न देने से संगठनों के आंतरिक प्रबंधन में अनुचित दखल बढ़ेगा।

विधेयक पर सरकार और विपक्ष का रुख

तीखे विरोध के बाद फिलहाल इस बिल को रोक कर (on hold) रखा गया है। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने अल्पसंख्यक संगठनों को आश्वासन दिया है कि उनकी आशंकाएं निराधार हैं और यह बिल केवल राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए बनाया गया है, किसी धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी केरल में चुनाव प्रचार के दौरान ईसाई समुदाय को भरोसा दिलाया था कि उनकी सरकार उनके हितों के खिलाफ कोई काम नहीं करेगी।
दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी ने इस विधेयक को सुधार नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों, नागरिक समाज (civil society) और एनजीओ पर हमला करार दिया है। कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस विधेयक को वापस लेने की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि जिस तरह वक्फ संशोधन विधेयक ने मुस्लिमों में डर पैदा किया था, उसी तरह एफसीआरए बिल ईसाइयों के बीच डर का माहौल बना रहा है।