मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर इस मामले में आगे बढ़ने के लिए वैधानिक सहमति मांगी है। अधिवक्ता का आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए संवैधानिक सिद्धांतों का कथित तौर पर उल्लंघन हुआ है। इस बीच नेता विपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार बाद दोपहर 4 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर कड़ा बयान दिया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की विस्फोटक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के ऐसे फैसलों पर आपत्ति दर्ज की, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए थे। इनके बारे में विस्तार से सत्य हिन्दी पर पढ़ सकते हैं।

किन फैसलों और प्रक्रियाओं पर उठे सवाल?

ब्रजेश सिंह ने याचिका में कई मुद्दों का उल्लेख किया है। इनमें प्रमुख रूप से-
  • मतदाता पंजीकरण के Form 6 में बदलाव
  • मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया
  • चुनावी रोल के डेटाबेस तक पहुंच को सीमित करना
  • चुनावी डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण
  • विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान मतदाता नामों को हटाने और बहाल करने से संबंधित प्रक्रियाएं
याचिका में दावा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को “अनधिकृत” और “अवैध” बताया था। वकील का तर्क है कि यदि किसी बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में महत्वपूर्ण फैसले अन्य सदस्यों की जानकारी या सहमति के बिना लिए जाते हैं और बाद में उन्हें “फुल कमीशन” के फैसले के रूप में पेश किया जाता है, तो यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित संस्थागत व्यवस्था के सवाल खड़े करता है।
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टी.एन. शेषन मामले का हवाला

ब्रजेश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले T.N. Seshan v. Union of India का हवाला दिया है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में देखा था। अदालत ने यह स्पष्ट किया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त संस्था से ऊपर नहीं है। CEC को “primus inter pares”, यानी बराबरों में प्रथम, के रूप में देखा जाता है। अधिवक्ता का आरोप है कि यदि अन्य चुनाव आयुक्तों को दरकिनार कर फैसले लिए गए हैं तो यह उस न्यायिक व्यवस्था के विपरीत होगा, जिसके अनुसार बहु-सदस्यीय आयोग के फैसले पूरे आयोग के फैसले होते हैं, केवल उसके अध्यक्ष के नहीं।

अनूप बरनवाल फैसले का भी हवाला

पत्र में 2023 के Anoop Baranwal v. Union of India फैसले का भी उल्लेख किया गया है। अधिवक्ता ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया था। ब्रजेश सिंह का दावा है कि यदि चुनाव आयोग के अन्य सदस्यों को दरकिनार करके निर्णय लिए गए, तो इसे संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून की कथित जानबूझकर अवहेलना के रूप में देखा जा सकता है। अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होता है।

अटॉर्नी जनरल की मंजूरी क्यों जरूरी?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया भी है। Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 15(1)(b) के तहत सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए निर्धारित परिस्थितियों में अटॉर्नी जनरल की लिखित सहमति आवश्यक होती है। ब्रजेश सिंह ने अपने 24 सितंबर के पत्र में इसी प्रावधान के साथ धारा 2(c) और Rules to Regulate Proceedings for Contempt of the Supreme Court, 1975 के Rule 3 का हवाला दिया है।इसका मतलब यह है कि अभी CEC के खिलाफ कोई आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू नहीं हुई है। फिलहाल अटॉर्नी जनरल से यह अनुमति मांगी गई है। यदि सहमति मिलती है, तभी आगे सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर किए जाने का रास्ता खुलेगा।

प्रियंका गांधी का हमला, कहा- सीईसी पर देशद्रोह का मुकदमा चलाओ

उधर, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने SIR को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि अगर चुनावी प्रक्रिया से छेड़छाड़ और मतदाता सूची में नाम हटाने जैसे गैरकानूनी काम हुए हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। प्रियंका ने यहां तक कहा कि ऐसे मामले में ‘देशद्रोह’ के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
प्रियंका ने वायनाड में कहा- लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ करना राष्ट्र के खिलाफ गंभीर अपराध है। उनके मुताबिक अगर मतदाता सूची में हेरफेर या बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, तो इसे सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर किसी अधिकारी ने गैरकानूनी काम किया है तो उसे सामान्य आपराधिक कानून के तहत मुकदमे और सजा का सामना करना चाहिए। प्रियंका ने सवाल उठाया कि चुनाव आयुक्त को ऐसी स्थिति में कानूनी संरक्षण क्यों मिलना चाहिए। प्रियंका ने आरोप लगाया कि अगर CEC को इस तरह की गतिविधियों की जानकारी थी और उनके सहयोगियों ने भी उन्हें इस बारे में अवगत कराया, फिर भी उन्होंने इसे रोकने के बजाय होने दिया, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
प्रियंका गांधी ने मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का दावा करते हुए कहा कि करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाना, अगर ऐसा हुआ है, तो यह लोकतंत्र, संविधान और देश के खिलाफ आपराधिक कृत्य होगा। उन्होंने इसे चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर हमला बताया।

कांग्रेस ने CEC के इस्तीफे की मांग दोहराई

गोवा के 97 मतदाताओं की रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर हमला तेज कर दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि यदि ERO द्वारा योग्य पाए गए मतदाताओं को भी अंतिम सूची में शामिल नहीं किया जा सका, तो यह चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया के "thoroughly compromised and vitiated" होने का आरोप लगाया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की अपनी मांग दोहराई। कांग्रेस ने इससे पहले भी SIR और ECINet को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।