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चीन ने भारत को बातचीत में उलझा कर पैंगोंग त्सो-देपसांग पर कब्जा पक्का किया!

पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने साफ़ कह दिया है कि सीमांत इलाक़ों में वह जहाँ है, वही वास्तविक नियंत्रण रेखा है और वह वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करती हुई वहीं टिकी रहेगी। भारत की ओर से यही संकेत दिये जा रहे हैं कि भारत चीनी सैन्य तैनाती के बराबर ताक़त में अपनी सेना वहाँ तैनात कर वहीं टिका रहेगा।
रंजीत कुमार

पूर्वी लद्दाख के 5 सीमांत इलाक़ों में चीनी घुसपैठ के तीन महीने 5 अगस्त को पूरे होने वाले हैं, इसने जून 2017 में डोकलाम में 73 दिनों तक चली सैन्य तनातनी के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। पिछले तीन महीनों में चीनी सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व ने भारतीय सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को बातचीत में उलझा कर सीमांत इलाक़ों में अपना कब्जा पक्का कर लिया।

क्या कहना है पीएलए का?

पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने साफ़ कह दिया है कि सीमांत इलाक़ों में वह जहाँ है, वही वास्तविक नियंत्रण रेखा है और वह वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करती हुई वहीं टिकी रहेगी। भारत की ओर से यही संकेत दिये जा रहे हैं कि भारत चीनी सैन्य तैनाती के बराबर ताक़त में अपनी सेना वहाँ तैनात कर वहीं टिका रहेगा। यानी भारतीय सेना उन इलाक़ों में चीनी सेना के तैनाती वाली जगहों के आगे धरना दे कर बैठी रहेगी।

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चीनी सेना को पता है कि भारतीय सेना पैंगोंग त्सो, गोगरा और देपसांग के अतिक्रमण वाले इलाक़ों से उसे बेदख़ल करने के लिये कोई सीधी सैन्य कार्रवाई नहीं करने वाली है। यानी भारतीय सेना चीनी सेना पर हमले के लिये तैयार नहीं है।

क्या करेगी भारतीय सेना?

खुद भारत के आला सैन्य अधिकारी इस आशय के संकेत दे रहे हैं। भारत के इस रुख के मद्देनज़र आख़िर चीनी सेना क्यों कोई सैन्य दबाव महसूस करेगी? चीनी सेना के लिये तो यह अनुकूल स्थिति बनती है कि भले ही भारतीय सेना चीनी कब्जे वाले इलाक़े के आगे सैन्य शिविर बना कर बैठ जाए वह तो घुसपैठ के इलाक़े में बनी रहेगी।
बंजर, पहाड़ी और बर्फीले इलाक़े में दो डिवीज़न सेना यानी क़रीब 40 हज़ार सैनिकों को तैनात रखना कोई खेल नहीं है। शून्य से 20 डिग्री नीचे तापमान पर हज़ारों सैनिकों को तैनात रखने पर अरबों रुपये ख़र्च होंगे।

दुविधा में भारत

इसीलिये भारत और चीन के सैन्य कमांडरों की 2 अगस्त को हुई बातचीत के बाद भारतीय सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व माथा पीट रहे हैं। चीन के इस अड़ियल रुख का किस तरह जवाब दिया जाए, इस पर फ़ैसला लेना अत्यधिक दुविधाजनक हो गया है।
हर बार क़रीब 14-15  घंटे तक चलने वाली बातचीत में चीन की ओर से उम्मीदें दिखाई जाती हैं, लेकिन इन बैठकों में हुई सहमति को अपने अनुकूल मोड़ कर चीन अपनी जिद पर अड़ जाता है।

इसके अलावा सीमा मसले पर वर्किंग मैकेनिज्म फ़ॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन बॉर्डर एफेयर्स (डब्लूएमसीसी)  की भी अब तक 5 दौर की बैठक हो चुकी है। दोनों विदेश मंत्रालयों के आला अधिकारियों के लिये आपसी सलाह-मशविरा के ज़रिये विवादों को दूर करने की यह प्रक्रिया अब तक कारगर रही है, लेकिन ताज़ा विवाद में इसके नतीज़े भारत के अनुकूल नहीं निकले हैं।

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वर्किंग मैकेनिज़्म नाकाम?

24 जुलाई को वर्किंग मैकेनिज़्म की बैठक के बाद दोनों पक्षों ने सहमति जाहिर की थी कि  गत 5 जुलाई को दोनों देशों के सीमा मसले पर विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत में जो सहमति बनी थी, उसे लागू की जानी चाहिये। 5 जुलाई को सीमा मसले पर बात के लिये दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के विशेष प्रतिनिधियों (अजीत डोभाल और वांग यी) की दो घंटे से अधिक लंबी बातचीत चली थी, जिसमें दोनों ओर से कमोबेश यही कहा गया था कि दोनों सेनाएँ वास्तविक नियंत्रण रेखा तक पीछे लौट जाएंगी।
लेकिन इसके बाद चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा की पहचान बदल कर अपने अनुकूल कर ली और अब वह वहाँ से हटने का नाम नहीं ले रहा।

क्या कहा चीन के राजदूत ने?

24 जुलाई की बैठक में दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के आला अधिकारियों ने तय किया था कि जल्द ही दोनों देशों के क्षेत्रीय सैन्य कमांडरों की बैठक होगी।
30 जुलाई को जिस तरह चीन के राजदूत सुन वेई तुंग ने कहा कि पैंगोंग त्सो झील का इलाक़ा चीन का है, उसके बाद सैन्य कमांडरों की बातचीत का कोई अर्थ नहीं रह गया था।

पाँचवीं बैठक में क्या हुआ?

शनिवार की शाम को चीनी पक्ष से संदेश आया कि वह 2 अगस्त को पाँचवें दौर की बातचीत करना चाहता है। काफी झिझक के बाद भारतीय पक्ष तैयार हुआ। इस बैठक में चीन के सैन्य कमांडर साउथ शिनजियांग डिस्ट्रिक्ट के मेजर जनरल ल्यु लिन और लेह स्थित 14 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह ने भाग लिया। 

करीब दस घंटे तक चली इस बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला। इसलिये इस बैठक के बाद भारतीय पक्ष ने आधिकारिक या ग़ैर आधिकारिक तौर पर बयान नहीं जारी किया। इस बैठक के नतीजों पर  विचार करने के लिये चाइना स्टडी ग्रुप की बैठक में चर्चा का प्रस्ताव है।
चाइना स्टडी ग्रुप की बैठक में तय होगा कि चीन के अड़ियल रुख के मद्देनज़र भारत का अगला कदम क्या हो। इस ग्रुप की अगुवाई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल करते हैं।

कुल नतीजा?

अब तक की रिपोर्टों के मुताबिक़, चीन हॉट स्प्रिंग और गलवान घाटी से अपने सैनिक पीछे हटाकर वास्तविक नियंत्रण रेखा तक ले गया है। लेकिन गोगरा, पैंगोंग त्सो झील और देपसांग में चीनी सेना जहाँ है, वहाँ से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
चीनी सेना कहती है कि अभी वह जहाँ तक है, वहीं वास्तविक नियंत्रण रेखा है। इसलिये वह वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करते हुए वहाँ टिकी रहेगी, पीछे नहीं हटेगी।

पैंगोंग त्सो?

चीनी सेना कहती है कि समझौता के लिये उसने बीच का रास्ता तलाशने का प्रस्ताव दिया था। चीन के मुताबिक़, जिस तरह उसकी सेना हॉट स्प्रिंग और गलवान घाटी से पीछे चली गई है, वह चीनी सेना द्वारा भारत को दी गई बड़ी रियायतेें थीं। इसलिये अब वह पैंगोंग त्सो झील के फिंगर चार के इलाक़ो से पीछे नहीं हटेगी।
चीन ने दो कदम आगे बढ़ कर एक कदम पीछे लौटने की अपनी रणनीति बड़ी कामयाबी से लागू कर भारत से कहा है कि उसकी सेना तो पीछे लौट गई है। साफ़ है, चीनी सेना के समक्ष भारतीय सेना विवश महसूस कर रही है।
चीन की सेना गलवान घाटी में पेट्रोल प्वाइंट-14  और हॉट स्प्रिंग में पेट्रोल प्वाइंट-15 तक लौट कर अपना वादा पूरा निभाने की बात कर रही है, लेकिन वह गोगरा पोस्ट में पेट्रोल प्वाइंट-17 –ए और पैंगोंग त्सो झील के फिंगर-4 तक के भारतीय इलाक़ों से पीछे हटने को तैयार नहीं है।   

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रंजीत कुमार
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