कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सौरव दास और आशुतोष रांका ने न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। दोनों नेताओं ने तत्काल रात में सुनवाई और रिहाई की मांग की। अभिजीत दिपके के मंगलवार को दिये गये बयान से आंदोलन चर्चा में है।
सीजेपी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाए जाने के खिलाफ पार्टी ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दोनों नेताओं की ओर से हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की गई है। उनके वकील ने अदालत से रात में ही सुनवाई करने का अनुरोध किया, क्योंकि दशहरा अवकाश के चलते हाईकोर्ट इस सप्ताह बंद है।
यह मामला जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी और दोनों नेताओं की लगातार बढ़ती हिरासत से जुड़ा है। इसी बीच सीजेपी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दिपके ने एक वीडियो संदेश में कहा है कि आंदोलन के प्रमुख फैसले सौरव दास और आशुतोष रांका लेते थे और वह उनके निर्देशों का पालन करते थे।
हिरासत दो दिन और बढ़ाने का मामला क्या है?
सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था। सीजेपी के अनुसार, दोनों नेताओं को पहले 10 अक्टूबर को दिल्ली एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया और फिर 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के प्रयास के दौरान दोबारा हिरासत में लिया गया। आरोप है कि वे बंद गेट पार करके उस स्थान में दाखिल हुए, जिसे प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया जा चुका था। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए नारे लगाए थे।दोनों नेताओं को पहले पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत समाप्त होने पर विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) ने इसे दो दिन और बढ़ा दिया। इस तरह उनकी हिरासत की अवधि सात दिन हो गई। सीजेपी ने इस आदेश को चुनौती दी है।
हाईकोर्ट में याचिका, रात में सुनवाई की मांग
सीजेपी की कानूनी टीम ने 20 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती दी। पार्टी ने मुख्य न्यायाधीश से मामले की तत्काल सुनवाई करने और दोनों नेताओं की रिहाई का निर्देश देने की अपील की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दोनों नेताओं को लगातार हिरासत में रखना मनमाना प्रशासनिक कदम है और इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है। पार्टी की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया पर कहा कि सौरव और आशुतोष को एक मिनट भी जेल में नहीं रहना चाहिए और राजनीतिक खेल के कारण उनकी स्वतंत्रता नहीं छीनी जानी चाहिए। उन्होंने तत्काल न्याय की मांग की।जमानतदारों के दस्तावेज खारिज करने पर भी सवाल
सीजेपी ने अपनी याचिका में हिरासत बढ़ाने के साथ-साथ जमानतदारों से जुड़े घटनाक्रम पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी के मुताबिक, उसके वकीलों ने 16 और 19 अक्टूबर को बैंक से सत्यापित जमानतदारों के दस्तावेज और फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें (FDR) जमा की थीं। लेकिन विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने कथित तौर पर तस्वीरों में अंतर और अन्य आधारों पर इन्हें स्वीकार नहीं किया। पार्टी का दावा है कि वैध दस्तावेजों के साथ दो अतिरिक्त जमानतदार भी उपलब्ध थे, लेकिन उन पर विचार नहीं किया गया। याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के Aldanish Rein बनाम State of NCT of Delhi मामले के फैसले का भी हवाला दिया गया है। सीजेपी का तर्क है कि जमानतदारों के सत्यापन की प्रक्रिया लंबित होने पर भी व्यक्तिगत मुचलके पर रिहाई पर विचार किया जाना चाहिए।पार्टी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135(3) के तहत हिरासत बढ़ाने के आदेश को भी चुनौती दी है। उसका आरोप है कि आदेश में पुलिस की अर्जियों पर निर्भर किया गया, जबकि किसी नए अपराध, एफआईआर या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आसन्न खतरे का पर्याप्त आधार नहीं बताया गया।
मजिस्ट्रेट ने क्या कहा था?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 अक्टूबर को नए विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट रितु राज के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इससे पहले मामले की सुनवाई कर रहे मजिस्ट्रेट ने धमकी भरा संदेश मिलने के बाद खुद को सुनवाई से अलग कर लिया था। उस संदेश के मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी। नए मजिस्ट्रेट ने आदेश में कहा कि दोनों नेताओं ने कथित तौर पर 11 अक्टूबर को दिए गए मुचलकों की शर्तों का जानबूझकर उल्लंघन किया और उसके बाद शांति भंग करने की स्थिति पैदा हुई। आदेश में यह भी कहा गया कि भविष्य में ऐसा नहीं करने का उनका आश्वासन भरोसा पैदा नहीं करता। मजिस्ट्रेट ने प्रतिबंधित या अधिसूचना से हटाए गए स्थलों पर बार-बार प्रदर्शन बुलाने और कानून के प्रति सम्मान की कमी का भी उल्लेख किया। दूसरी ओर, सीजेपी की कानूनी टीम ने इन आधारों को अस्पष्ट और मनमाना बताया है। पार्टी का कहना है कि दोनों नेताओं को लगातार हिरासत में रखने का पर्याप्त औचित्य नहीं है।अभिजीत दिपके ने कहा- सौरव और आशुतोष ही लेते थे फैसले
इस कानूनी लड़ाई के बीच सीजेपी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दिपके का वीडियो संदेश भी चर्चा में है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, दशहरे पर जारी भावुक संदेश में दिपके ने सौरव दास और आशुतोष रांका को आंदोलन के वास्तविक निर्णयकर्ता बताया। दिपके ने कहा कि वह दोनों के निर्देशों का पालन करते थे और उन्होंने आंदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने जेल में बंद दोनों नेताओं को अपना भाई बताया और कहा कि उनकी अनुपस्थिति उन्हें खल रही है। दिपके ने यह भी बताया कि तीनों का एक अलग व्हाट्सऐप समूह था, जहां वे मीम साझा करते थे। उन्होंने कहा कि आज भी वह उस समूह को खोलते हैं, ताकि दोनों की मौजूदगी महसूस कर सकें।
दिपके ने फ्रांस में हुए प्रदर्शनों, हिंसा और आगजनी से सीजेपी के आंदोलन की तुलना किए जाने को भी खारिज किया। उनका तर्क था कि सौरव दास और आशुतोष रांका ने जेल जाने के बावजूद अहिंसक प्रतिरोध का रास्ता अपनाया। उन्होंने दोनों नेताओं के रवैये की तुलना महात्मा गांधी के सत्याग्रह से करते हुए कहा कि वे गुस्से और नफरत के बजाय शांति और करुणा के साथ जेल गए। यह दिपके का अपना आकलन है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन
सीजेपी और उससे जुड़े प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। आंदोलन में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। पार्टी ने चुनावी जवाबदेही और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े मुद्दों को अपने आंदोलन का हिस्सा बताया है। जंतर-मंतर पर प्रवेश और प्रदर्शन के बाद पुलिस ने कार्रवाई की। इसके बाद दोनों नेताओं की हिरासत, जमानतदारों के दस्तावेजों की स्वीकृति और हिरासत बढ़ाने के आदेश को लेकर विवाद खड़ा हो गया। अब सीजेपी ने इस मामले में हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है।