Greater Noida executive magistrate suspended: सीजेपी विरोध प्रदर्शन मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि छात्र अक्षत त्रिपाठी को 5 लाख रुपये का बॉन्ड नोटिस जारी करने वाले ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है।
दिल्ली में सीजेपी का प्रदर्शन । File Photo
ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट को आज गुरुवार को निलंबित कर दिया गया। मजिस्ट्रेट साहब ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित छात्र प्रदर्शन के लिए छात्रों में प्रचार करने वाले गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को ₹5 लाख के निजी मुचलके का नोटिस जारी किया था। यह जानकारी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गुरुवार 10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में दी।
मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब छात्र अक्षत त्रिपाठी ने कार्यकारी मजिस्ट्रेट के नोटिस को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता पी.वी. दिनेश ने याचिका का उल्लेख करते हुए अदालत से मामले को सुनवाई के लिए लेने और अधिकारियों को कड़ा संदेश देने की मांग की।
छात्र से मांगा गया था ₹5 लाख का बॉन्ड
कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने 4 सितंबर 2026 को अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किया था। नोटिस में उनसे छह महीने के लिए ₹5 लाख का निजी बॉन्ड और ₹5-5 लाख की दो जमानतें देने को कहा गया था। यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 135 के तहत शुरू की गई थी।
पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया था कि त्रिपाठी यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच कथित तौर पर ‘‘सरकार विरोधी और भ्रामक बातें’’ फैला रहे थे और उन्हें CJP के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी कि इससे तनाव पैदा हो सकता है तथा छात्रों के बीच लड़ाई-झगड़े और शांति भंग की स्थिति पैदा हो सकती है।सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही लगाई थी कार्रवाई पर रोक
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को NEET-UG 2026 से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया था। अदालत ने संबंधित FIRs को रद्द करने के साथ छात्रों के खिलाफ भविष्य में coercive action पर रोक लगाई थी। अक्षत त्रिपाठी की याचिका में इसी आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत थी। याचिका में यह भी कहा गया कि त्रिपाठी पर न तो हिंसा करने का आरोप है, न सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का और न ही उनके खिलाफ कोई ऐसी आपराधिक गतिविधि बताई गई है जिससे तत्काल शांति भंग होने की आशंका साबित होती हो।नोटिस के खिलाफ छात्र ने क्या कहा?
अक्षत त्रिपाठी की याचिका में कहा गया कि नोटिस में उनके खिलाफ किसी खास तारीख, समय, बयान या किसी प्रत्यक्ष हिंसक कृत्य का उल्लेख नहीं किया गया था। याचिका के मुताबिक आरोपों के समर्थन में कोई सामग्री भी उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। याचिका में यह भी आपत्ति उठाई गई कि 4 सितंबर को नोटिस जारी करके अगले ही दिन यानी 5 सितंबर को पेश होने के लिए कहा गया। छात्र के मुताबिक इतने कम समय में वकील से सलाह लेने, आरोपों को समझने और ₹5-5 लाख की दो जमानतों की व्यवस्था करना व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल था।मौलिक अधिकारों का भी हवाला
त्रिपाठी ने अपनी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि छात्रों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना अपने आप में अपराध नहीं है और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण सभा के अधिकार के दायरे में आता है। याचिका में यह भी कहा गया कि ₹5 लाख का निजी बॉन्ड और इतनी ही राशि के दो जमानतदार मांगना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर असर डालता है। इसके अलावा, जवाब देने के लिए सिर्फ एक दिन दिया जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।CJI ने जताई थी कड़ी नाराजगी
इससे पहले बुधवार को जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था, तब CJI सूर्यकांत ने कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने सवाल किया था कि जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ coercive action नहीं करने का निर्देश दिया है तो कोई मजिस्ट्रेट उस आदेश के बावजूद ऐसा नोटिस कैसे जारी कर सकता है। अदालत ने संबंधित नोटिस को रिकॉर्ड पर लाने को कहा था और संकेत दिया था कि संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा। इसी पृष्ठभूमि में गुरुवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस जारी करने वाले अधिकारी को निलंबित कर दिया गया है।