सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ़ किया कि राज्य सरकारें जंतर मंतर प्रोटेस्ट से जुड़े मामले वापस ले सकती हैं, लेकिन यह राहत उन लोगों को नहीं मिलेगी जिनके नाम पहले गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल रहे हैं। सीजेपी ने इसे युवाओं की एक और जीत बताया है।
जंतर मंतर प्रोटेस्ट एफ़आईआर वापसी पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण
जंतर-मंतर प्रोटेस्टरों के ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर वापस लिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्टीकरण दिया है और कहा है कि उसके पिछले आदेश में इस्तेमाल किए गए 'आपराधिक पृष्ठभूमि' शब्द का मतलब केवल हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपी लोगों से है। ऐसे मामलों को छोड़कर राज्य सरकारें कानून के अनुसार छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने या बंद करने के लिए स्वतंत्र हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण के बाद आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने कहा है कि 'यह युवाओं के लिए एक और जीत है!' इसने फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अब केंद्र सरकार और बीजेपी-एनडीए शासित राज्यों को 25 जुलाई को छात्रों से किए गए वादे को तुरंत लागू करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दूर की भ्रम की स्थिति
28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा था कि दिल्ली और अन्य राज्यों में दर्ज एफआईआर की जांच जारी रह सकती है, लेकिन प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालाँकि अदालत ने यह भी कहा था कि यह राहत 'आपराधिक पृष्ठभूमि' वाले लोगों को नहीं मिलेगी। इसके बाद इस पर स्थिति साफ़ नहीं थी कि क्या किसी सामान्य मुक़दमें का सामना कर रहे छात्र को भी यह राहत नहीं मिलेगी।इस आदेश के बाद कुछ याचिकाकर्ताओं ने अदालत से कहा कि इससे यह भ्रम पैदा हो गया है कि जिन छात्रों के खिलाफ सामान्य एफआईआर दर्ज हैं, उनके मामले भी वापस नहीं लिए जा सकेंगे। सोमवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने साफ़ किया कि 'आपराधिक पृष्ठभूमि' से उनका आशय केवल गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपियों से था।
केंद्र ने भी कोर्ट की व्याख्या से सहमति जताई
सुनवाई के दौरान केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ने भी अदालत के पिछले आदेश का यही अर्थ समझा था। इस स्पष्टीकरण के बाद अब राज्यों के सामने छात्रों के खिलाफ दर्ज सामान्य मामलों को वापस लेने का रास्ता साफ माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट फ़िलहाल 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई और कथित अत्याचार से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इनमें प्रदर्शनकारी छात्रों की याचिकाएं, घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की याचिकाएं, और कुछ पत्रकारों पर कथित हमलों से जुड़े मामले शामिल हैं।
अदालत पहले इस पूरे मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी बनाने की संभावना भी जता चुकी है और केंद्र व दिल्ली सरकार से जवाब मांगा था। सोमवार को केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा।
केंद्र ने कोर्ट को क्या बताया?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि पुलिस की जांच में पाया गया है कि जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल पर 2738 ऐसे लोग भी पहुंचे थे जिनके खिलाफ हत्या, बलात्कार और बाल यौन शोषण जैसे गंभीर मामलों के केस दर्ज हैं। हालाँकि इस दावे पर अदालत ने अभी कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है।
CJP ने फैसले को बताया युवाओं की बड़ी जीत
कॉकरोच जनता पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अब सरकार के आश्वासन को लेकर पैदा हुई सभी शंकाएं दूर कर दी हैं। उन्होंने इस फ़ैसले को युवाओं के लिए एक और बड़ी जीत क़रार दिया है।
उन्होंने कहा, 'अब जब सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ कर दी है, तो हमें उम्मीद है कि भारत सरकार और सभी बीजेपी-एनडीए शासित राज्य 25 जुलाई को देश के युवाओं से किए गए वादे को तुरंत लागू करेंगे।'
बाद में एक बयान जारी कर सौरव दास ने कहा कि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकारें छात्रों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर वापस ले सकती हैं और केवल हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर मामलों के आरोपी ही इस राहत से बाहर रहेंगे।
उन्होंने कहा कि आंदोलन के पहले दिन से ही सीजेपी ने छात्रों को कानूनी सहायता, चिकित्सा सहायता और हर संभव सहयोग दिया है और अब सरकार को भी अपना वादा निभाना चाहिए।
रुचिका मामले में भी कानूनी मदद का भरोसा
सीजेपी की प्रवक्ता रत्ना सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत भी दिया है कि ज़रूरत पड़ने पर वह संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत एफआईआर रद्द करने का अधिकार भी इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने बताया कि पार्टी प्रदर्शनकारी रुचिका के परिवार के संपर्क में है और जिन महिला प्रदर्शनकारियों ने उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं, उन्हें कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त तय की है। तब तक केंद्र और दिल्ली सरकार को अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा। अदालत के ताज़ा स्पष्टीकरण के बाद अब यह देखना अहम होगा कि विभिन्न राज्य सरकारें छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने के संबंध में क्या कदम उठाती हैं।