लोकसभा में मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी संवैधानिक संशोधन विधेयक शुक्रवार शाम को भारी मतों से पराजित हो गया। यह 2014 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद किसी सरकारी विधेयक की पहली हार है और 2011 के बाद लोकसभा में किसी संवैधानिक संशोधन विधेयक की पहली असफलता है। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी, लेकिन इसे केवल 298 मतों के पक्ष में और 230 मतों के खिलाफ मिले। कुल 528 सदस्यों ने वोटिंग में भाग लिया। इस नाकामी के बाद सरकार ने साथ में पेश किए गए दो अन्य विधेयकों को भी वापस ले लिया। अब सभी की नज़रें मोदी सरकार के अगले कदम पर लगी हुई हैं। कांग्रेस महासचिव और सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सरकार पर बड़ा हमला बोला है।
सरकार ने शनिवार को कैबिनेट बैठक बुलाई है, जिसमें अगले कदमों पर विचार होगा। अगर महिला आरक्षण को जल्द लागू करना है तो नए विकल्प लाने होंगे, जैसे वर्तमान 543 लोकसभा सीटों में से एक-तिहाई सीटों पर सीधे आरक्षण देना, वो भी बिना पूरे परिसीमन के।विशेषज्ञों का मानना है कि मूल 2023 कानून अभी भी लागू है, लेकिन बिना नए परिसीमन के उसे अमल में नहीं लाया जा सकता। यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका है।
विपक्ष इस सफलता को लोकतंत्र की जीत बता रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने कहा कि हम महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं, लेकिन पुरानी 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के जरिए नहीं। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर देश के चुनावी नक्शे को बदलने की कोशिश कर रही थी। विपक्ष का एक स्वर यह है कि अगर सरकार सच्चे मन से 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करना चाहती है तो वह बिना किसी शर्त के मूल 2023 के कानून को तुरंत लागू करे, जिसके लिए वे पूरा समर्थन देंगे।

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मोदी सरकार की नीयत का भेद खुला

मोदी सरकार इसे बार बार महिला आरक्षण विधेयक के नाम से बता रही थी। लेकिन इसे 131 संविधान संशोधन विधेयक के नाम से लाया गया और इसके साथ दो बिल जोड़े गए थे। ये बिल थे महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक। विपक्ष कह रहा था कि उन्हें महिला आरक्षण बिल तो मंजूर है लेकिन इसी से जुड़ा परिसीमन विधेयक पूरे विपक्ष को नामंजूर था। सरकार का ज़ोर महिला आरक्षण बिल पर था। अब वो विपक्ष के खिलाफ प्रचार भी यही कर रही है कि विपक्ष ने महिला आरक्षण विधेयक पास नहीं होने दिया। जब सरकार का संविधान संशोधन बिल लोकसभा में वोटिंग के दौरान पिट गया तो सरकार ने दो बिल भी वापस ले लिए गए। इसी से सरकार की असलियत भी सामने आ गई। ये विधेयक हैं- परिसीमन विधेयक 2026ः 2011 की जनगणना के आधार पर नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने का प्रावधान।
संघ राज्य क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक 2026- दिल्ली, पुदुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे संघ राज्य क्षेत्रों (जिनमें विधानसभा भी है) से संबंधित। ये दोनों विधेयक मुख्य विधेयक की नाकामी के बाद वापस ले लिए गए।

विपक्ष का विरोध क्यों?

विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन किया, लेकिन 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर जल्दबाजी में परिसीमन का विरोध किया। उनका कहना है:
  • इसमें ओबीसी की गिनती नहीं है।
  • दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय हो सकता है।
  • यह महिलाओं के आरक्षण का बिल नहीं, बल्कि भारत के चुनावी नक्शे को बदलने की कोशिश है।
  • पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए भी समय सही नहीं।

प्रियंका गांधी की सरकार को चुनौती

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी शनिवार को सरकार को महिला आरक्षण बिल पर सीधी चुनौती दी। प्रियंका ने कहा- “सरकार सोमवार को ही पुराना महिला विधेयक लाए। वही विधेयक जिसे 2023 में सभी दलों ने पारित किया था। सोमवार को संसद बुलाइए, विधेयक लाइए और देखिए कौन महिला-विरोधी है। हम सब आपको वोट देंगे और आपका समर्थन करेंगे।” उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के मतदाताओं को गुमराह करने का आरोप लगाया, जहां इस महीने के अंत में मतदान होने वाला है। बीजेपी विपक्षी दलों को “महिला-विरोधी” बताकर ऐसा करने की कोशिश कर रही है। जबकि तमिलनाडु की सत्ताधारी डीएमके ने तो लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में आरक्षण देने के लिए एक विधेयक भी पेश किया है। बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि अगर 50% आरक्षण 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन से नहीं जुड़ा है, तो वह उसका भी समर्थन करती है।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने शनिवार को इस मुद्दे पर मीडिया को संबोधित किया। उन्होंने कहा- हमने लोकतंत्र की रक्षा की है। हमने परिसीमन को लेकर मोदी सरकार की साजिश को नाकाम कर दिया है। मोदी सरकार ने महिला आरक्षण कानून पर तीन साल तक कुछ नहीं किया और अभी दो दिन पहले ही एक नोटिफिकेशन जारी किया है, इसलिए उसे लागू करना चाहिए। हम पूरी मज़बूती से महिला आरक्षण के समर्थन में खड़े हैं। पूरा विपक्ष एकमत है कि पहले वाला महिला आरक्षण बिल लागू होना चाहिए। लेकिन मोदी सरकार ने जिस तरह से इसे पेश किया और लोकतंत्र के खिलाफ जैसी साज़िश रची, हम उसका कभी भी समर्थन नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “हम कभी भी महिला आरक्षण को पुरानी जनगणना पर आधारित परिसीमन से नहीं जोड़ सकते। यह हमारे देश में लोकतंत्र की बड़ी जीत है।”
प्रियंका ने कहा- गृह मंत्री और प्रधानमंत्री ने अपने-अपने भाषणों में कहा कि अगर विपक्ष इस मुद्दे पर सहमत नहीं होगा तो न कभी चुनाव जीत पाएगा, न ही सत्ता में आ पाएगा। इन बातों से ही साफ़ हो गया कि सरकार की मंशा क्या थी। मेरा मानना है कि सरकार द्वारा जो साजिश रची गई, उसका उद्देश्य सत्ता हासिल करना है। इसके लिए सरकार ने महिलाओं का इस्तेमाल किया। सरकार चाहती थी कि 
महिला आरक्षण के नाम पर विपक्ष यह बिल पारित करवा दे, ताकि उन्हें मनमाने तरीके से परिसीमन की आजादी मिल जाए, जिससे मोदी सरकार को जातिगत जनगणना का सहारा न लेना पड़े। मोदी सरकार का मानना था कि अगर बिल पारित होगा तो उनकी जीत होगी और बिल पारित नहीं हुआ तो विपक्ष को महिला विरोधी बता देंगे। बीजेपी ऐसा कर खुद को महिलाओं का मसीहा साबित करना चाहती थी।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, “यह महिला आरक्षण बिल नहीं, बल्कि भारत के चुनावी नक्शे को बदलने की कोशिश थी। अगर सरकार 2023 का महिला आरक्षण बिल लागू करना चाहती है तो विपक्ष 100% समर्थन करेगा।” समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि विपक्ष सरकार पर भरोसा नहीं करता। दरअसल, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव ने ही इस बिल को एससी/एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया। उनकी मांग थी कि उन्हें इसमें शामिल किए बिना यह विधेयक स्वीकार नहीं है। अखिलेश ने कोटे में कोटे की मांग की।

फजीहत के बाद अमित शाह क्या बोले

हार के बाद अमित शाह ने एक्स पर लिखा, “कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए जरूरी संवैधानिक संशोधन बिल पास नहीं होने दिया। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि नारी शक्ति का यह अपमान यहीं नहीं रुकेगा, यह दूर तक जाएगा।” इसके बाद बीजेपी ने विपक्षी दलों खासतौर पर कांग्रेस के खिलाफ भारत बंद का आह्वान किया। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक भारत बंद का कहीं कोई असर नहीं दिखाई दिया।