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दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों को सबसे ज़्यादा निशाना बनाएगा कोरोना?

यह सच है कि कोरोना वायरस का कोई धर्म, जाँत-पाँत, नस्ल, रंग नहीं है, इसलिए वह निरपेक्ष भाव से जो मिल जाता है उसे ही धर-दबोचता है, लेकिन यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि कुछ ख़ास लोगों को वह अपना शिकार ज़्यादा बना रहा है।
हाल में आए आँकड़े इशारा करते हैं कि भारत में भी कुछ ख़ास वर्गों के लोग ही कोरोना की चपेट में ज़्यादा आएँगे। 

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सबसे ज़्यादा असर किस पर?

भारत में अभी तक हुई मौतों का कोई विवरण नहीं आया है और न ही इस आधार पर कोई अध्ययन हुआ है। वैसे भी अभी हम कोरोना संक्रमण के बीच वाले चरण में हैं और यह अभी शहरों तथा कस्बों तक ही सीमित है।
लेकिन कोरोना से मरने वालों में सबसे ज़्यादा दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक होंगे। अल्पसंख्यकों में ख़ास तौर पर मुसलमान होंगे।
पहले हम यह देखते है कि अमेरिका जो कि इस समय सबसे संक्रमित देश है, वहाँ किन समुदायों के लोग ज़्यादा मर रहे हैं। अमेरिका से कुछ आँकड़े सामने आए हैं और उनके आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले गए हैं।

नतीजे बताते हैं कि अमेरिका में कुल मरने वालों में अश्वेत लोगों का अनुपात सबसे अधिक है। इसके बाद हिस्पैनी और लैटिन मूल के लोग आते हैं। गोरों की संख्या इनके मुक़ाबले सबसे कम है, जबकि आबादी सबसे अधिक है।

अमेरिका की डेमोग्रैफ़ी

अमेरिका की आबादी में गोरों की तादाद कुल 72.4 फ़ीसदी है, जबकि काले 12.6 फ़ीसदी हैं। इसके अलावा हिस्पैनिक और लैटिन अमेरिकी हैं जिनकी तादाद 16.3 फ़ीसदी है। 

हमारे पास पूरे अमेरिका में संक्रमित लोगों के आँकड़े नहीं आए हैं। जो आँकड़े उपलब्ध हैं, उनके आधार पर एक ट्रेंड साफ़ दिखता है और वह यह कि सबसे ज्यादा हमले कालों पर हुए हैं। 

शिकागो

शिकागो में काले 30 फ़ीसदी से थोड़ा कम हैं, लेकिन कुल संक्रमित लोगों में से आधी संख्या उनकी है। लेकिन इससे भी ज़्यादा हिलाने वाली बात यह है कि मरने वालों में 72 फ़ीसदी काले हैं। यानी आबादी 30 फ़ीसदी से कम और मृतकों की संख्या 72 फ़ीसदी। 

इलिनॉय

इसी तरह इलिनॉय राज्य में कालों की संख्या केवल 15 फ़ीसदी है, मगर कोरोना से मरने वालों में 43 प्रतिशत काले हैं। संक्रमित लोगों में भी वे 28 फ़ीसदी हैं।

मिशिगन

इसी तरह मिशिगन राज्य में 14 फ़ीसदी होने के बावजूद कोरोना से मरे लोगों में 40 फ़ीसदी काले हैं। संक्रमित लोगों में भी वे 30 फ़ीसदी हैं। 

कारण काली चमड़ी नहीं

अमेरिका के इन तीन राज्यों के आँकड़े स्पष्ट तौर पर बताते हैं कि कोरोना के शिकार काले लोग बन रहे हैं। लेकिन ऐसा मत मान लीजिएगा कि कोरोना वायरस को काली चमड़ी वाले लोग पसंद हैं, इसलिए वह उन्हीं पर हमला कर रहा है।
हालाँकि शुरू में यही भ्रम फैला था कि कोरोना का असर काले लोगों पर नहीं होगा, क्योंकि उनकी प्रतिरोधी क्षमता गोरों से अधिक है। मगर आँकड़ों से ज़ाहिर है कि यह सच नहीं था। 

सचाई यह है कि काले लोग बेहद ग़रीब हैं। ग़रीब होने की वज़ह से पौष्टिक भोजन और अच्छी ज़िंदगी से महरूम हैं। इन वज़हों से डायबिटीज़, मोटापा, बीपी और दिल के रोगों से ग्रस्त हैं।
स्वास्थ्य सेवाएं उनकी पहुँच से बाहर हैं इसलिए इलाज़ होता नहीं है। ऐसे में उनके बीच कोरोना संक्रमण तेज़ी से फैलता है और मौत भी जल्दी हो जाती है। 

आर्थिक विषमता

गोरों और कालों के बीच आर्थिक विषमता बहुत ज़्यादा है। कालों की तुलना में गोरों के पास 20 गुना ज़्यादा संपत्ति है। यह आर्थिक विषमता हर क्षेत्र में देखी जा सकती है। कालों को कम वेतन मिलता है, उन्हें नौकरियों पर कम रखा जाता है, उनके साथ हर स्तर पर भेदभाव किया जाता है। 

भारत में क्या हाल है?

अब इन परिस्थितियों को आप भारत पर लागू करके देखिए। भारत में दलित और आदिवासियों की संख्या 27 फ़ीसदी है, मगर उनके पास कुल संपत्ति केवल 11 फ़ीसदी है, जबकि ऊँची जातियाँ क़रीब 23 फ़ीसदी होते हुए भी 41 फ़ीसदी संपत्ति की मालिक बनी बैठी हैं। 

अगर यही विषमता हम धार्मिक आधार पर देखें तो पाएँगे वहाँ भी यही स्थिति है।
हिंदुओं की ऊँची और पिछड़ी जातियों के लोगों की संख्या करीब 58 फ़ीसदी है, पर वे 72 फ़ीसदी संपत्ति की मालिक हैं। मुसलमानों की आबादी 12 फ़ीसदी है, उनके पास कुल 8 फ़ीसदी संपत्ति ही है।
अगर मुसलमानों में भी जातियों के हिसाब से यह फर्क देखा जाएगा तो वहाँ भी भारी अंतर मिलेगा। कहने का मतलब यह है कि यह विषमता भारत में भी रंग दिखाएगी।
कोरोना दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को सबसे ज़्यादा निशाना बनाएगा, क्योंकि यही सबसे ग़रीब तबके हैं और ज़ाहिर है कि शारीरिक रूप से सबसे कमज़ोर भी।
इन्हें समय पर ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं मिलेंगी, उनके साथ भेदभाव होगा और उन्हें बचाने के लिए कहीं कोई खड़ा नहीं होगा। ऐसे में जो आँकड़े आएँगे वे शिकागो, इलिनॉय और मिशिगन जैसे ही होंगे। 

कोरोना ने अमेरिका को विश्व के सामने पूरी तरह से नंगा कर दिया है। अमेरिकी अधिकारी और नेता संक्रमित कालों की संख्या देकर शर्मसार हो रहे हैं। अब शर्मसार होने की बारी हमारी है।    

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मुकेश कुमार
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