दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को 2020 के दिल्ली दंगा साजिश मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की ताज़ा जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) समीर बाजपेयी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट जनवरी 2026 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बंधा हुआ है और उसके विपरीत कोई राहत नहीं दे सकता। 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं पहले ही खारिज कर दी थीं। इसलिए निचली अदालत के पास उस आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अदालत ने कहा, "यह अदालत माननीय सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी 2026 के निर्णय का पालन करने के लिए बाध्य है, जिसमें दोनों आवेदकों की याचिकाएं खारिज की गई थीं।"

कब दोबारा जमानत मांग सकते हैं?

अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी तय किया था कि उमर खालिद और शरजील इमाम दोबारा जमानत की मांग तभी कर सकते हैं, जब: अभियोजन पक्ष के सभी संरक्षित (Protected) गवाहों की गवाही पूरी हो जाए, या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तारीख से एक वर्ष पूरा हो जाए।  इन दोनों में जो भी पहले हो। अदालत ने कहा कि जब तक इन शर्तों में से कोई पूरी नहीं होती, तब तक ट्रायल कोर्ट जमानत याचिका पर विचार नहीं कर सकता। अपने आदेश में अदालत ने कहा, "ये आवेदन विचारणीय (Maintainable) ही नहीं हैं और इसलिए इन्हें खारिज किया जाता है।"

छह महीने बाद फिर दाखिल की थी जमानत याचिका

उमर खालिद और शरजील इमाम ने हाल ही में सत्र अदालत में नई जमानत याचिकाएं दाखिल की थीं। उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनवरी 2026 में जमानत खारिज किए जाने के बाद छह महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन मुकदमे में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है। याचिका में कहा गया कि अब भी आरोप तय करने (Arguments on Charge) की बहस पूरी नहीं हुई है और दोनों लगभग छह वर्षों से जेल में बंद हैं।

उमर खालिद की ओर से क्या दलील दी गई?

उमर खालिद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने अदालत में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अंद्राबी मामले के फैसले के बाद, जिसमें खालिद और इमाम को जमानत न देने के आधार पर सवाल उठाए गए थे, उमर खालिद को जमानत मिलने का अधिकार बनता है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक वर्ष तक या संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने तक नई जमानत याचिका दाखिल न करने संबंधी रोक (Embargo) इस मामले में लागू नहीं होती।

शरजील इमाम की ओर से क्या कहा गया?

शरजील इमाम की ओर से अधिवक्ता तालीब मुस्तफा ने दलील दी कि किसी आरोपी को एक वर्ष तक जमानत याचिका दाखिल करने से रोकने जैसी शर्त वैध है या नहीं, इस प्रश्न पर स्वयं सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी पीठ विचार करने वाली है। उन्होंने कहा कि इसी मामले के कुछ अन्य आरोपियों को बड़ी पीठ के समक्ष लंबित इस मुद्दे का लाभ भी मिला है।

दिल्ली पुलिस का पक्ष

दिल्ली पुलिस की ओर से अदालत में कहा गया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ कोई अलग स्पष्टता नहीं देती, तब तक जनवरी 2026 का फैसला और उसमें दी गई सभी शर्तें पूरी तरह बाध्यकारी हैं। पुलिस की ओर से कहा गया कि यदि आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कोई आपत्ति थी या स्पष्टीकरण चाहिए था, तो उन्हें सीधे सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना चाहिए था। ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अलग जाकर कोई राहत नहीं दे सकता।