हाल ही में शुरू हुए दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे (Delhi-Dehradun Expressway) का एक हिस्सा उत्तर प्रदेश के शामली के पास भारी बारिश के बाद धंस गया। सड़क धंसने और उसमें बड़े-बड़े गड्ढे होने के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए, जिसके बाद यात्रियों की सुरक्षा और इस बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठने लगे। हालांकि, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने तत्परता दिखाते हुए क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत का काम पूरा कर लिया है। इससे पहले इसी तरह गंगा एक्सप्रेसवे और सोहना एक्सप्रेसवे के धंसने की घटनाएं भी सामने आई थीं। अभी तक इन घटनाओं को लेकर किसी तरह की कार्रवाई सामने नहीं आई है।

सुबह गश्त के दौरान चला पता, NHAI ने दी सफाई

अधिकारियों के मुताबिक, बुधवार सुबह करीब 6:30 बजे एक्सप्रेसवे के किलोमीटर 55 (गोगवान जलालपुर गांव, शामली) पर रूट पेट्रोलिंग टीम ने सड़क धंसने की इस घटना को नोटिस किया। रातभर हुई मूसलाधार बारिश के चलते यह हादसा हुआ था।
NHAI ने बयान जारी कर बताया कि यह समस्या स्थानीय स्तर पर पानी जमा होने (जलभराव) के कारण हुई। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि एक्सप्रेसवे से बारिश का पानी निकालने के लिए वहां एक कलवर्ट (पुलिया) बनाया गया था, लेकिन स्थानीय निवासियों के विरोध के कारण जल निकासी प्रणाली (ड्रेनेज सिस्टम) को आपस में जोड़ा नहीं जा सका। NHAI के अनुसार, स्थानीय लोग इस पुलिया के रास्ते का उपयोग वाहनों को पार कराने के लिए कर रहे थे, जिससे जल निकासी पूरी तरह ठप हो गई और पानी के दबाव के कारण सड़क धंस गई। इसके अलावा, जमीन से जुड़े एक मध्यस्थता विवाद (arbitration dispute) के चलते उस स्थान पर स्थायी ढलान सुरक्षा और ड्रेनेज का काम भी रुका हुआ था।
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मामले की गंभीरता को देखते हुए NHAI ने प्राथमिकता के आधार पर सड़क को दुरुस्त कर दिया है। इसके साथ ही, ड्रेनेज की समस्या से निपटने के लिए लगभग 1.5 किलोमीटर लंबा एक अंतरिम समानांतर नाला (interim parallel drain) बनाने का काम शुरू कर दिया है। जब तक मुख्य पुलिया पूरी तरह चालू नहीं हो जाती, तब तक पानी को सुरक्षित रूप से किलोमीटर 56+500 पर बने एंट्री/एग्जिट पॉइंट तक पहुंचाने के लिए ड्रेनेज के ढलान को फिर से डिजाइन किया जा रहा है।

विपक्ष ने साधा निशाना, लगाया भ्रष्टाचार का आरोप

इस घटना को लेकर राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भारी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि उद्घाटन के महज दो महीने के भीतर ही इतने बड़े एक्सप्रेसवे पर इतने बड़े गड्ढे होना और सड़क का धंसना खराब निर्माण गुणवत्ता को दर्शाता है। विपक्ष ने दावा किया कि देश भर में कई अन्य सरकारी प्रोजेक्ट्स से भी इसी तरह की खामियों की खबरें आ रही हैं।

बुनियादी ढांचे के विकास में गुणवत्ता और जवाबदेही का संकट

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और सोहना एलिवेटेड कॉरिडोर जैसे महाप्रोजेक्ट्स भारतीय कनेक्टिविटी के भविष्य के तौर पर पेश किए गए थे। लेकिन उद्घाटन के कुछ ही समय बाद, या निर्माण के दौरान ही, सड़कों का धंसना और बड़े-बड़े गड्ढे होना यह साफ करता है कि देश के सबसे महंगे प्रोजेक्ट्स भी गंभीर संरचनात्मक कमियों से जूझ रहे हैं। जनता को गति और सुरक्षा का सपना दिखाकर जब हजारों करोड़ रुपये की लागत वाली सड़कें पहली ही मूसलाधार बारिश को झेलने में नाकाम साबित होती हैं, तो यह सीधे तौर पर हमारी इंजीनियरिंग ऑडिट, सॉइल टेस्टिंग और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता (Construction Quality) पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
दूसरा और सबसे गंभीर पहलू इस विशाल वित्तीय लागत से जुड़ा है। इन तीनों प्रोजेक्ट्स को मिलाकर देश के खजाने से लगभग ₹50,000 करोड़ से ज्यादा की भारी-भरकम राशि खर्च की गई है, जिसमें देश के करदाताओं (Taxpayers) का गाढ़े पसीने का पैसा शामिल है। ₹1,466 करोड़ की लागत वाले सोहना एक्सप्रेसवे से लेकर ₹37,000 करोड़ से अधिक की लागत वाले विशालकाय गंगा एक्सप्रेसवे तक—लागत जितनी बड़ी है, लापरवाही का स्तर भी उतना ही हैरान करने वाला है। इतने बड़े बजट के बावजूद अगर ड्रेनेज सिस्टम की कमियों या तकनीकी खामियों के कारण सड़कें धंस रही हैं, तो यह दर्शाता है कि प्रोजेक्ट के नियोजन (Planning) और जमीनी क्रियान्वयन के बीच एक बहुत बड़ी खाई है, जिसे केवल 'रिकॉर्ड समय में काम पूरा करने' की होड़ में नजरअंदाज कर दिया गया।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं के बाद भी प्रशासनिक स्तर पर कोई सख्त जवाबदेही (Accountability) तय नहीं हो पा रही है। हर हादसे के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) या संबंधित एजेंसियां स्थानीय बाधाओं, मौसम या भूमि विवादों का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती हैं। ठेकेदारों, इंजीनियरों और गुणवत्ता निरीक्षकों (Quality Auditors) के खिलाफ कोई ऐसी दंडात्मक या नजीर बनने वाली कार्रवाई देखने को नहीं मिलती, जो भविष्य के लिए चेतावनी बने। जब तक इतनी बड़ी लागत और जन सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाली लापरवाहियों के लिए जिम्मेदार शीर्ष अधिकारियों और निजी कंपनियों की जवाबदेही तय कर उन पर कठोर वित्तीय व कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक देश के बहुप्रचारित एक्सप्रेसवे पहली ही बारिश में इसी तरह अपनी साख गंवाते रहेंगे।