दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के दो मतदान केंद्रों पर किए गए सार्वजनिक ऑडिट में 100 से अधिक मतदाताओं को कथित तौर पर गलत तरीके से ‘अनुपस्थित’, ‘स्थानांतरित’ या ‘मृत’ चिह्नित पाया गया। यह मामला मतदाता सूची की शुद्धता, सत्यापन प्रक्रिया और पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार से जुड़ी चिंताओं को सामने लाता है।

SIR क्या है और विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को ठीक करना और उसमें दर्ज नामों की पुष्टि करना है। इस प्रक्रिया में मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए लोगों और अन्य अपात्र प्रविष्टियों की पहचान की जा सकती है। लेकिन यदि किसी जीवित, पात्र और उसी पते पर रहने वाले मतदाता को गलत तरीके से इन श्रेणियों में दर्ज कर दिया जाए, तो उसका नाम मतदाता सूची से हट जाता है।
दिल्ली के दो बूथों पर सार्वजनिक ऑडिट में सामने आई कथित गड़बड़ियां इसी चिंता को गंभीर बनाती हैं। मतदाता को मृत, अनुपस्थित या स्थानांतरित दर्ज करने से पहले सही जानकारी और उचित सत्यापन आवश्यक है। किसी गलत एंट्री के कारण पात्र मतदाता का नाम हटना चुनावी प्रक्रिया में उसकी भागीदारी को प्रभावित कर सकता है।
ताज़ा ख़बरें

ओखला में जनसुनवाई, 258 घरों का सात दिन तक हुआ ऑडिट

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला दिल्ली की ओखला विधानसभा सीट के मतदान केंद्र संख्या 61 और 65 से जुड़ा है। जनसुनवाई 18 अक्टूबर 2026 को बटला हाउस इलाके में आयोजित की गई। जन सरोकार, मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS), वोटर अधिकार मंच और नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन (NFIW) जैसे नागरिक संगठनों ने इसका आयोजन किया था। सात दिनों तक 258 घरों की जांच की गई। इस दौरान कम से कम 100 मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि वाली श्रेणी में गलत तरीके से दर्ज किए जाने का मामला सामने आया।
जनसुनवाई में 150 से अधिक मतदाताओं ने अपने मामले दर्ज कराए। सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता नयनतारा रॉय और सुमिता हजारिका तथा पारदर्शिता के क्षेत्र में काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी का पैनल मौजूद था। यह सुनवाई मुख्य रूप से जी और के ब्लॉक के मतदाताओं के लिए थी, लेकिन सूचना फैलने के बाद दूसरे मतदान केंद्रों के लोग भी अपनी शिकायतें लेकर पहुंचे।

पांच दशक से एक ही पते पर रह रहे पूर्व प्रोफेसर को बताया ‘लापता’- इस मामले में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के 74 वर्षीय रिटायर्ड मैकेनिकल इंजीनियरिंग प्रोफेसर फैयाज अहमद का उदाहरण सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक, वह पांच दशक से अधिक समय से एक ही पते पर रह रहे हैं, लेकिन उन्हें मतदाता सूची में ‘अनुपस्थित’ या ‘पता नहीं चल सका’ की श्रेणी में डाल दिया गया। उनकी 62 वर्षीय पत्नी अंजुम आरा को स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित बताया गया।

फैयाज अहमद के बेटे बाबू सरदार खान ने बताया कि उन्होंने अपने माता-पिता के गणना प्रपत्र (Enumeration Form) बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को जमा कराए थे। इसके बावजूद ड्राफ्ट सूची में केवल उनका अपना नाम दिखाई दिया। माता-पिता के नाम शामिल कराने के लिए उन्हें नए मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म-6 लेना पड़ा।
फैयाज अहमद ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या किसी एक व्यक्ति या संस्था को नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटाने का ऐसा अधिकार होना चाहिए? उन्होंने बताया कि 1970 के दशक से लगभग हर चुनाव में मतदान करते आए हैं।

30 साल से एक ही पते पर रह रहे व्यक्ति को भी बताया स्थानांतरित

जनसुनवाई में नईमुद्दीन नाम के 48 वर्षीय व्यक्ति ने भी अपनी शिकायत रखी। उनका कहना था कि वह पिछले 30 वर्षों से एक ही पते पर रह रहे हैं, फिर भी उन्हें स्थायी रूप से स्थानांतरित दर्ज कर दिया गया। उन्होंने बताया कि वह BLO के पास गए थे, जहां उनकी तस्वीरें ली गईं और एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर भी कराए गए। नईमुद्दीन ने अपने पुराने ड्राइविंग लाइसेंस और शस्त्र लाइसेंस का हवाला देते हुए सवाल किया कि जब उनके पास वर्षों पुराने दस्तावेज हैं और वह लगातार उसी पते पर रह रहे हैं, तो उन्हें नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उन्होंने यह भी शिकायत की कि उन्हें इस बारे में निर्वाचन आयोग की ओर से स्पष्ट जानकारी नहीं मिली और सामाजिक कार्यकर्ताओं से पता चला कि उनके नाम को लेकर समस्या है।

निर्वाचन आयोग के विशेष शिविरों की जानकारी भी लोगों को नहीं

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय ने 20 सितंबर से हर वीकएंड पर मतदान केंद्रों पर विशेष शिविर आयोजित किए थे। इनका घोषित उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी पात्र मतदाता सूची से बाहर न रह जाए। इसी सप्ताह अधिकारियों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरी प्रविष्टि (ASDD) श्रेणी के मामलों का घर-घर जाकर दोबारा सत्यापन करने और पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने के निर्देश भी दिए गए।

हालांकि, जनसुनवाई में पहुंचे करीब 20 लोगों ने द हिंदू को बताया कि उन्हें इन विशेष शिविरों की जानकारी नहीं थी। कुछ लोगों को यह भी नहीं मालूम था कि उनके क्षेत्र का BLO कौन है। कुछ ने कहा कि BLO ने उनसे संपर्क नहीं किया था।

आयोजकों के मुताबिक, संबंधित BLO, निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO), जिला मजिस्ट्रेट और निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को भी जनसुनवाई के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। इससे शिकायतकर्ताओं और संबंधित अधिकारियों के बीच सीधे संवाद का अवसर नहीं मिल पाया।

ओखला में 67 हजार से अधिक नाम नोटिस सूची में

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, SIR के बाद प्रकाशित ओखला की मसौदा मतदाता सूची में 1.85 लाख से अधिक मतदाता थे। इनमें 67 हजार से अधिक नाम नोटिस सूची में रखे गए थे, जबकि लगभग 1.6 लाख प्रविष्टियां ASDD सूची में दर्ज थीं। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की विधानसभा सीटों में ओखला में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की दर दूसरी सबसे अधिक थी। ये आंकड़े मतदाता सूची के पुनरीक्षण और अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज प्रविष्टियों से संबंधित हैं। 

पुराने मतदाता को फिर से नया पंजीकरण क्यों कराना पड़ रहा है?

जनसुनवाई में तनवीर अनवर ने बताया कि जब वह अपने भाई के लिए गणना प्रपत्र लेने गए, तो BLO ने उन्हें बताया कि उनके भाई का फॉर्म उपलब्ध नहीं है और उनका नाम मतदाता सूची में नहीं है। हालांकि, मोहम्मद फरीद अनवर का नाम ASDD सूची में मौजूद था, जिसमें संकेत दिया गया था कि उनका गणना प्रपत्र एकत्र नहीं किया जा सका।
इस मामले में भी परिवार को आगे की प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता नहीं थी। जनसुनवाई में कम से कम 110 लोगों ने फॉर्म-6 और अपने या अपने परिजनों के पुराने SIR रिकॉर्ड की जानकारी मांगने वाला घोषणा-पत्र लिया। आयोजकों ने बताया कि उन्होंने ऑनलाइन उपलब्ध प्रपत्रों की प्रतियां लोगों को दीं और उन्हें उन मतदान केंद्रों तक जाने का सुझाव दिया, जहां BLO मौजूद थे। संगठन स्वयं आवेदन जमा करने के लिए अधिकृत नहीं थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, 30 अक्टूबर तक फॉर्म-6 के जरिए प्राप्त आवेदनों पर 4 दिसंबर को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची के लिए विचार किया जाना है।

एक अन्य मामला: जीवित व्यक्ति को मृत दिखाया गया

जनसुनवाई में ओखला गांव के 37 वर्षीय रवि का मामला भी सामने आया। उनकी पत्नी अनीता को मतदाता पहचान पत्र पर दर्ज EPIC नंबर के जरिए पता चला कि रवि को मृत दिखाया गया है। हैरानी की बात यह थी कि उनका रिकॉर्ड एक अलग EPIC नंबर के साथ मसौदा मतदाता सूची में मौजूद था।
रवि ने बताया कि उन्हें 2023 में मतदाता पहचान पत्र जारी किया गया था और वह उसी पते पर रह रहे हैं। उनका सवाल था कि एक ही पते पर मतदाता पहचान संख्या बदल जाने की जानकारी उन्हें कैसे मिल सकती थी, जबकि उनके पास उपलब्ध दस्तावेजों में पुरानी जानकारी दर्ज थी।

SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल

ओखला की जनसुनवाई में सामने आए मामलों से यह सवाल उठता है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान किसी व्यक्ति को अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत घोषित करने के लिए सत्यापन की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है। यदि एक ही पते पर वर्षों से रह रहे लोगों को भी गलत श्रेणियों में डाल दिया जाता है, तो केवल तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर रहने के बजाय शिकायतों की स्वतंत्र जांच और रिकॉर्ड की दोबारा पुष्टि जरूरी हो जाती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि मसौदा मतदाता सूची से नाम गायब होने का अर्थ हर मामले में अंतिम रूप से मतदान का अधिकार समाप्त हो जाना नहीं है। पात्र मतदाताओं को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना नाम शामिल कराने या रिकॉर्ड ठीक कराने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि वर्षों से मतदाता रहे नागरिकों को अपनी पहचान और मतदान के पुराने रिकॉर्ड के बावजूद अनावश्यक रूप से नए सिरे से पंजीकरण की परेशानी न उठानी पड़े।
मुख्य सवाल यही है: SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, लेकिन यदि इस प्रक्रिया में वास्तविक और पात्र मतदाता ही गलत तरीके से बाहर हो जाएं, तो इस गलती की जिम्मेदारी कौन तय करेगा और चुनाव से पहले उनके नाम बहाल करने की गारंटी कौन देगा?